शराब-ख़ाना है बज़्म-ए-हस्ती हर एक है महव-ए-ऐश-ओ-मस्ती मआल-बीनी ओ मय-परस्ती अरे ये ज़िल्लत अरे ये पस्ती शिआर-ए-रिंदाना कर पिए जा अगर कोई तुझ को टोकता है शराब पीने से रोकता है समझ इसे होश में नहीं है ख़िरद के आग़ोश में नहीं है तू इस से झगड़ा न कर पिए जा ख़याल-ए-रोज़-ए-हिसाब कैसा सवाब कैसा अज़ाब कैसा बहिश्त ओ दोज़ख़ के ये फ़साने ख़ुदा की बातें ख़ुदा ही जाने फ़ुज़ूल सोचा न कर पिए जा नहीं जहाँ में मुदाम रहना तो किस लिए तिश्ना-काम रहना उठा उठा हाँ उठा सुबू को तमाम दुनिया की हाव हूँ को ग़रीक़-ए-पैमाना कर पिए जा किसी से तकरार क्या ज़रूरत फ़ुज़ूल इसरार क्या ज़रूरत कोई पिए तो उसे पिला दे अगर न माने तो मुस्कुरा दे मलाल-ए-असला न कर पिए जा तुझे समझते हैं अहल-ए-दुनिया ख़राब ख़स्ता ज़लील रुस्वा नहीं अयाँ उन पे हाल तेरा कोई नहीं हम-ख़याल तेरा किसी की परवा न कर पिए जा ये तुझ पर आवाज़े कसने वाले तमाम हैं मेरे देखे भाले नहीं मज़ाक़ उन को मय-कशी का ये ख़ून पीते हैं आदमी का तू उन का शिकवा न कर पिए जा
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बड़े नाज़ से आज उभरा है सूरज हिमाला के ऊँचे कलस जगमगाए पहाड़ों के चश्मों को सोना बनाया नए बिल नए ज़ोर इन को सिखाए लिबास-ए-ज़री आबशारों ने पाया नशेबी ज़मीनों पे छींटे उड़ाए घने ऊँचे ऊँचे दरख़्तों का मंज़र ये हैं आज सब आब-ए-ज़र में नहाए मगर इन दरख़्तों के साए में ऐ दिल हज़ारों बरस के ये ठिठुरे से पौदे हज़ारों बरस के ये सिमटे से पौदे ये हैं आज भी सर्द बेहाल बे-दम ये हैं आज भी अपने सर को झुकाए अरे ओ नई शान के मेरे सूरज तिरी आब में और भी ताब आए तिरे पास ऐसी भी कोई किरन है जो ऐसे दरख़्तों में भी राह पाए जो ठहरे हुओं को जो सिमटे हुओं को हरारत भी बख़्शे गले भी लगाए बड़े नाज़ से आज उभरा है सूरज हिमाला के ऊँचे कलस जगमगाए फ़ज़ाओं में होने लगी बारिश-ए-ज़र कोई नाज़नीं जैसे अफ़्शाँ छुड़ाए दमकने लगे यूँँ ख़लाओं के ज़र्रे कि तारों की दुनिया को भी रश्क आए हमारे उक़ाबों ने अंगड़ाइयाँ लीं सुनहरी हवाओं में पर फड़फड़ाए फ़ुज़ूँ-तर हुआ नश्शा-ए-कामरानी तजस्सुस की आँखों में डोरे से आए क़दम चूमने बर्क़-ओ-बाद आब-ओ-आतिश ब-सद-शौक़ दौड़े ब-सद-इज्ज़ आए मगर बर्क़ ओ आतिश के साए में ऐ दिल ये सदियों के ख़ुद-रफ़्ता नाशाद ताइर ये सदियों के पर-बस्ता बर्बाद ताइर ये हैं आज भी मुज़्महिल दिल-गिरफ़्ता ये हैं आज भी अपने सर को छुपाए अरे ओ नई शान के मेरे सूरज तिरी आब में और भी ताब आए तिरे पास ऐसी भी कोई किरन है उन्हें पंजा-ए-तेज़ से जो बचाए इन्हें जो नए बाल-ओ-पर आ के बख़्शे इन्हें जो नए सिर से उड़ना सिखाए
Moin Ahsan Jazbi
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मिरी सदा है गुल-ए-शम्-ए-शाम-ए-आज़ादी सुना रहा हूँ दिलों को पयाम आज़ादी लहू वतन के शहीदों का रंग लाया है उछल रहा है ज़माने में नाम-ए-आज़ादी मुझे बक़ा की ज़रूरत नहीं कि फ़ानी हूँ मिरी फ़ना से है पैदा दवाम-ए-आज़ादी जो राज करते हैं जम्हूरियत के पर्दे में उन्हें भी है सर-ओ-सौदा-ए-ख़ाम-ए-आज़ादी बनाएँगे नई दुनिया किसान और मज़दूर यही सजाएँगे दीवान-ए-आम-ए-आज़ादी फ़ज़ा में जलते दिलों से धुआँ सा उठता है अरे ये सुब्ह-ए-ग़ुलामी ये शाम-ए-आज़ादी ये महर-ओ-माह ये तारे ये बाम हफ़्त-अफ़्लाक बहुत बुलंद है इन से मक़ाम-ए-आज़ादी फ़ज़ा-ए-शाम-ओ-सहर में शफ़क़ झलकती है कि जाम में है मय-ए-लाला-फ़ाम-ए-आज़ादी स्याह-ख़ाना-ए-दुनिया की ज़ुल्मतें हैं दो-रंग निहाँ है सुब्ह-ए-असीरी में शाम-ए-आज़ादी सुकूँ का नाम न ले है वो क़ैद-ए-बे-मीआद है पय-ब-पय हरकत में क़याम-ए-आज़ादी ये कारवान हैं पसमाँदगान-ए-मंज़िल के कि रहरवों में यही हैं इमाम-ए-आज़ादी दिलों में अहल-ए-ज़मीं के है नीव उस की मगर क़ुसूर-ए-ख़ुल्द से ऊँचा है बाम-ए-आज़ादी वहाँ भी ख़ाक-नशीनों ने झंडे गाड़ दिए मिला न अहल-ए-दुवल को मक़ाम-ए-आज़ादी हमारे ज़ोर से ज़ंजीर-ए-तीरगी टूटी हमारा सोज़ है माह-ए-तमाम-ए-आज़ादी तरन्नुम-ए-सहरी दे रहा है जो छुप कर हरीफ़-ए-सुब्ह-ए-वतन है ये शाम-ए-आज़ादी हमारे सीने में शो'ले भड़क रहे हैं 'फ़िराक़' हमारी साँस से रौशन है नाम-ए-आज़ादी
Firaq Gorakhpuri
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"और मुलाक़ात हो गई" अरे माँ बाबा आप आ गए,और बताएँ कैसे हो मैं जन्नत में ख़ुश थी तब से , आप बताएँ कैसे हो बताओ ना दुनिया कैसी है , क्या जन्नत के जैसी है क्या वहाँ भी नदियाँ झूले है, या आज भी जहन्नुम जैसी है बोलो ना आप चुप क्यूँँ हो, क्या मुझ में ऐसी बुरी बात मिली पैदा होने से पहले ही मार दिया, क्यूँँ क़त्ल की मुझे सौग़ात मिली क्यूँँ काटा-पीटा टुकड़े किया, और कचरे में फेंक दिया पर शुक्र है उस ख़ुदा का, मुझे लेने एक फ़रिश्ता भेज दिया अब आप को जन्नत कैसे ले जाऊँ, वो जहाँ का ख़ालिक़ बवाल करता है किस जुर्म में मेरा क़त्ल हुआ , ऐसा मुझ से सवाल करता है जाओ ना उसे जवाब दो, फिर हम जन्नत साथ चले वहाँ झुला झूलेंगे सब मिल कर, करते हुए चलो बात चले शुक्र है इस जहाँ में तो, मेरी आपसे बात हो गई मैं ने अपने क़ातिल को देखना चाहा , और मुलाक़ात हो गई
Mohammad Talib Ansari
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मोहब्बत उस रोज़ तुम फिर दिखी काले कुर्ते पर लाल दुपट्टा किसी गुलाब सा था बड़ी ख़ुश थी तुम सच कहूँ तुम्हें देखना ख़्वाब सा था जितना सुना था तुम्हारे बारे कहानियाँ सब सच्ची लगती है अरे पागल मुस्कुराया करो तुम पर अच्छी लगती है उम्मीद नहीं थी मेरे दिए झुमके पहनोगी अरे एक मुलाक़ात के लिए क्या इतना सजोगी तुम्हारा काजल अलग कहानी बयाँ करता है हर बार तो एक जैसा होता है चलो कुछ नया करते हैं तुम्हारी ज़ुल्फ़ों में काएनात क़ैद है इन्हें खोल क्यूँँ नहीं देती मोहब्बत है अगर तो बोल क्यूँँ नहीं देती
Nikhil Tiwari 'Nazeel'
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नज़्म:-'शाहज़ादी' बहुत नादान थी लड़की मुझे अपना समझती थी मुझी पे जाँ लुटाती थी बहुत बातें बनाती थी मुझे क़िस्से सुनाती थी और उस में शाहज़ादी थी जिसे इक शाहज़ादे से मोहब्बत थी.! वो कहती थी, कि मैं भी शाहज़ादी हूँ मुझे भी शाहज़ादा ही मिलेगा ना.! जो मुझ पे जाँ लुटाएगा मुझे अपना बनाएगा.. मैं कहता था, कि मैं हूँ आम सा लड़का मोहब्बत का तो मतलब भी मुझे अब तक नहीं मालूम.! तुम्हें देखूं तो लगता है, मोहब्बत चीज़ है कोई,जो तुम जैसी हसीं होंगी.. मैं तुम सेे बात करता हूँ तो लगता है, मोहब्बत है कोई लड़की जो यूँ ही बोलती होगी.. तुम्हारे साथ होता हूँ तो लगता है, मोहब्बत है यहीं पे पास में मेरे.. सो यूँ समझो, मेरी ख़ातिर मोहब्बत तुम. मोहब्बत का हो मतलब तुम. वो कहती थी, चलो झूठे बहुत बातें बनाते हो नहीं हो इतने भोले तुम मुझे जितना दिखाते हो कहा मैं ने, अरे पगली मुझे छोड़ो चलो जाओ कहीं से ढूंढ़ के लाओ है कोई शाहज़ादा तो कि तुम तो शाहज़ादी हो तुम्हें तो शाहज़ादा ही मिलेगा ना.! दिखा आँखें कहा उस ने कि हाँ हाँ ले ही आऊंगी तुम्हें मैं फिर दिखाऊंगी. दिखाया तो नहीं लेकिन वो ख़ुद में खो गई शायद या कोई मिल गया उस को वो अब बातें बनाना भूल जाती थी मुझे क़िस्से सुनाना भूल जाती थी फिर इक दिन फोन कर बोली कहा था ना, कि मैं तो शाहज़ादी हूँ.! तो देखो ढूंढ़ लाई मैं तुम्हारे ही तरह बातें नहीं बिल्कुल बनाता है मुझे वो शाहज़ादी ही बुलाता है मुझे अपना बताता है बहुत पैसे कमाता है वो कहता है उसे मुझ सेे मोहब्बत है जो मैं ने बोलना चाहा, कहा उस ने कि रहने दो,ये बातें तुम न समझोगे कि तुम हो आम से लड़के, सो तुम सेे दूर जाना है उसे अपना बनाना है मुझे घर भी बसाना है.. मैं उस को अलविदा कहता दुआ भी दे ही देता ना.! बहुत जल्दी में थी शायद सो उस ने कुछ भी सुनना ठीक ना समझा, बिना बोले ही उस का फोन कट गया शायद...!! बहुत नादान थी लड़की__....
Ankit Maurya
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इमारत और शौकत और सरमाए की तस्वीरें ये ऐवानात सब हैं हाल ही की ताज़ा तामीरें इधर कुछ फ़ासले पर चंद घर थे काश्त-कारों के जहाँ अब कार-ख़ाने बन गए सरमाया-दारों के मवेशी हो गए नीलाम क्यूँँ ये कोई क्या जाने कचेहरी जाने साहूकार जाने या ख़ुदा जाने ज़मीं-दारों को जा कर देख ले जो भी कोई चाहे नए भट्टों में ईंटें थापते फिरते हैं हलवाहे यहाँ अपने पुराने गाँव का अब क्या रहा बाक़ी यही तकिया यही इक मैं यही इक झोंपड़ा बाक़ी अज़ीमुश्शान बस्ती है ये नौ-आबाद वीराना यहाँ हम अजनबी दोनों हैं मैं और मेरा काशाना
Hafeez Jalandhari
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देख बुआ मिरी गोटे की चुनरी आ हा जी गुल-नारी चुनरी रंग रंगीली प्यारी चुनरी मलमल की इक तारी चुनरी नाज़ुक नाज़ुक सारी चुनरी देख बुआ मिरी गोटे की चुनरी अम्मी के कुछ जी में आया गोटे का इक थान मंगाया चुनरी पर सारा चिपकाया हर कोने पर फूल बनाया देख बुआ मिरी गोटे की चुनरी लचका है हाथों में लचकता गोटा है कुंदन सा दमकता रौशनी में कैसा है चमकता हाथ लगाने से है मसकता देख बुआ मिरी गोटे की चुनरी इस को ख़राब होने न दूँगी बैठूँगी तो सँभाल रखूँगी घर में जा कर रख छोड़ूँगी और तेहवार के दिन ओढ़ूँगी देख बुआ मिरी गोटे की चुनरी
Hafeez Jalandhari
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ऐ देखने वालो इस हुस्न को देखो इस राज़ को समझो ये नक़्श-ए-ख़याली ये फ़िक्रत-ए-आली ये पैकर-ए-तनवीर ये कृष्ण की तस्वीर मअ'नी है कि सूरत सनअ'त है कि फ़ितरत ज़ाहिर है कि मस्तूर नज़दीक है या दूर ये नार है या नूर दुनिया से निराला ये बाँसुरी वाला गोकुल का ग्वाला है सेहर कि ए'जाज़ खुलता ही नहीं राज़ क्या शान है वल्लाह क्या आन है वल्लाह हैरान हूँ क्या है इक शान-ए-ख़ुदा है बुत-ख़ाने के अंदर ख़ुद हुस्न का बुत-गर बुत बन गया आ कर वो तुर्फ़ा नज़्ज़ारे याद आ गए सारे जमुना के किनारे सब्ज़े का लहकना फूलों का महकना घनघोर घटाएँ सरमस्त हवाएँ मासूम उमंगें उल्फ़त की तरंगें वो गोपियों के साथ हाथों में दिए हाथ रक़्साँ हुआ ब्रिजनाथ बंसी में जो लय है नश्शा है न मय है कुछ और ही शय है इक रूह है रक़्साँ इक कैफ़ है लर्ज़ां एक अक़्ल है मय-नोश इक होश है मदहोश इक ख़ंदा है सय्याल इक गिर्या है ख़ुश-हाल इक इश्क़ है मग़रूर इक हुस्न है मजबूर इक सेहर है मसहूर दरबार में तन्हा लाचार है कृष्णा आ श्याम इधर आ सब अहल-ए-ख़ुसूमत हैं दर पए इज़्ज़त ये राज दुलारे बुज़दिल हुए सारे पर्दा न हो ताराज बेकस की रहे लाज आ जा मेरे काले भारत के उजाले दामन में छुपा ले वो हो गई अन-बन वो गर्म हुआ रन ग़ालिब है दुर्योधन वो आ गए जगदीश वो मिट गई तशवीश अर्जुन को बुलाया उपदेश सुनाया ग़म-ज़ाद का ग़म क्या उस्ताद का ग़म क्या लो हो गई तदबीर लो बन गई तक़दीर लो चल गई शमशीर सीरत है अदू-सोज़ सूरत नज़र-अफ़रोज़ दिल कैफ़ियत-अंदोज़ ग़ुस्से में जो आ जाए बिजली ही गिरा जाए और लुत्फ़ पर आए तो घर भी लुटा जाए परियों में है गुलफ़ाम राधा के लिए श्याम बलराम का भय्या मथुरा का बसय्या बिंद्रा में कन्हैय्या बन हो गए वीराँ बर्बाद गुलिस्ताँ सखियाँ हैं परेशाँ जमुना का किनारा सुनसान है सारा तूफ़ान हैं ख़ामोश मौजों में नहीं जोश लौ तुझ से लगी है हसरत ही यही है ऐ हिन्द के राजा इक बार फिर आ जा दुख दर्द मिटा जा अब्र और हवा से बुलबुल की सदास फूलों की ज़िया से जादू-असरी गुम शोरीदा-सरी गुम हाँ तेरी जुदाई मथुरा को न भाई तू आए तो शान आए तू आए तो जान आए आना न अकेले हों साथ वो मेले सखियों के झमेले
Hafeez Jalandhari
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लहद में सो रही है आज बे-शक मुश्त-ए-ख़ाक उस की मगर गर्म-ए-अमल है जागती है जान-ए-पाक उस की वो इक फ़ानी बशर था मैं ये बावर कर नहीं सकता बशर इक़बाल हो जाए तो हरगिज़ मर नहीं सकता ब-ज़ेर-ए-साया-ए-दीवार-ए-मस्जिद है जो आसूदा ये ख़ाकी जिस्म है सत्तर बरस का राह पैमूदा ये ख़ाकी जिस्म भी उस का बहुत ही बेश-क़ीमत था जिसे हम-जल्वा समझे थे वो पर्दा भी ग़नीमत था उसे हम नापते थे ले के आँखों ही का पैमाना ग़ज़ल-ख़्वाँ उस को जाना हम ने शाइ'र उस को गर्दाना फ़क़त सूरत ही देखी उस के मअ'नी हम नहीं समझे न देखा रंग-ए-तस्वीर आइने को दिल-नशीं समझे हमें ज़ोफ़-ए-बसारत से कहाँ थी ताब-ए-नज़्ज़ारा सिखाए उस के पर्दे ने हमें आदाब-ए-नज़ारा ये नग़्मा क्या है ज़ेर-ए-पर्दा-हा-ए-साज़ कम समझे रहे सब गोश-बर-आवाज़ लेकिन राज़ कम समझे शिकस्त-ए-पैकर-ए-महसूस ने तोड़ा हिजाब आख़िर तुलू-ए-सुब्ह-ए-महशर बन के चमका आफ़्ताब आख़िर मुक़य्यद अब नहीं 'इक़बाल' अपने जिस्म-ए-फ़ानी में नहीं वो बंद हाइल आज दरिया की रवानी में वजूद-ए-मर्ग की क़ाएल नहीं थी ज़िंदगी उस की त आला अल्लाह अब देखे कोई पाइंदगी उस की जिसे हम मुर्दा समझे ज़िंदा तर पाइंदा तर निकला मह ओ ख़ुर्शीद से ज़र्रे का दिल ताबिंदा तर निकला अभी अंदाज़ा हो सकता नहीं उस की बुलंदी का अभी दुनिया की आँखों पर है पर्दा फ़िरक़ा-बंदी का मगर मेरी निगाहों में हैं चेहरे उन जवानों के जिन्हें 'इक़बाल' ने बख़्शे हैं बाज़ू क़हर-मानों के
Hafeez Jalandhari
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(1) गर्म-जोशी अब सूरज सर पर आ धमकेगा ठंडा लोहा चमकेगा और धूप जवाँ हो जाएगी सठियाए हुए फ़र्ज़ानों पर अब ज़ीस्त गिराँ हो जाएगी हर अस्ल अयाँ हो जाएगी अब ख़ूब हँसेगा दीवाना अब आग बगूले नाचेंगे सब लंगड़े लूले नाचेंगे गिर्दाब-ए-बला बन जाएँगे रौंदी हुई मिट्टी के ज़र्रे तूफ़ान-ब-पा बन जाएँगे सहरा दरिया बन जाएँगे अब ख़ूब हँसेगा दीवाना अब सुस्ती जाल बिछाएगी अब धोंस न चलने पाएगी मज़दूरों और किसानों पर अब सूखा ख़ून निचोड़ने वाले रोएँगे नुक़्सानों पर इन खेतों इन खलियानों पर अब ख़ूब हँसेगा दीवाना अब पीली धात की बीमारी फैला न सकेंगे ब्योपारी लोहे का लोहा मानेंगे सोने की गहरी कानों में सो जाना बेहतर जानेंगे दर दर की ख़ाक न छानेंगे अब ख़ूब हँसेगा दीवाना अब ख़ून के सागर खोलेंगे इंसान के जौहर खोलेंगे चढ़ जाएगी तप सहराओं को उट्ठेगी उमड कर लाल आँधी पी जाएगी दरियाओं को बाँधेगा तुंद हवाओं को अब ख़ूब हँसेगा दीवाना हर ज़ुल्फ़ से बिच्छू लपकेंगे आँखों से शरारे टपकेंगे सय्यादों हुस्न-शिकारों पर ग़ुस्से का पसीना फूटेगा मोती बन कर रुख़्सारों पर इस धूप में चाँद सितारों पर अब ख़ूब हँसेगा दीवाना अब दूध न देंगी भैंसें गाएँ उफ़ उफ़ करने लगेंगी माएँ बच्चे मम मम चीख़ेंगे और ऊँघने वाले निखटू शौहर ''अक़ल-ए-मुजस्सम'' चीख़ेंगे सब दरहम-बरहम चीख़ेंगे अब ख़ूब हँसेगा दीवाना अब ख़ानक़हों की मुर्दा उदासी रोज़-ए-अज़ल की भूकी प्यासी झूमेगी मय-ख़ानों पर अब साक़ी मुग़चे पीर-ए-मुग़ाँ बेचेंगे वाज़ दुकानों पर इन ज़हर भरे पैमानों पर अब ख़ूब हँसेगा दीवाना ज़ोर-आवरी से कमज़ोरों की अब जेब कटेगी चोरों की और मंडी साहू-कारों की अब भूकी ''हू-हक़'' सैर करेगी मंडियों और बाज़ारों की गत देख के दुनिया-दारों की अब ख़ूब हँसेगा दीवाना जीना दिल गुर्दा ढूँडेगा हर ज़िंदा ''मुर्दा'' ढूँडेगा कोई कोना-खदरा तह-ख़ाना अब हर जंगल में मंगल होगा हर बस्ती में वीराना इक नारा लगा कर मस्ताना अब ख़ूब हँसेगा दीवाना (2) सर्द-मेहरी अब जाड़ा झँडे गाड़ेगा और फ़ील-ए-फ़लक चिंघाड़ेगा अब बादल शोर मचाएँगे अब भूत फ़लक पर चढ़ दौड़ेंगे धरती को दहलाएँगे हँसने के मज़े अब आएँगे अब ख़ूब हँसेगा दीवाना ऐवान करेंगे भाएँ भाएँ फूँस की झोंपड़ियों में हवाएँ साएँ साएँ गूँजेंगी इस गूँज में भूके नंगों की सुनसान सदाएँ गूँजेंगी वीरान सराएँ गूँजेंगी अब ख़ूब हँसेगा दीवाना अब बिजली के कोड़ों से हवा शमशीर-ब-कफ़ ज़ंजीर-ब-पा लोहे के रथों को हाँकेगी एक एक धुएँ के महमिल से सद हुस्न की मलिका झाँकेगी अब आग अंगारे फाँकेगी अब ख़ूब हँसेगा दीवाना अब ठंडी आहों के परनाले पाले आफ़त के पर काले कंदे तोले बरसेंगे अब आहन ठंडा पड़ जाएगा आहन के गोले बरसेंगे हर सर पर ओले बरसेंगे अब ख़ूब हँसेगा दीवाना तख़रीब की तोपें छूटेंगी तामीर की कलियाँ फूटेंगी हर गोरिस्तान-ए-शाही में बाला-ए-हवा ज़ेर-ए-दरिया ग़ुल होगा मुर्ग़ ओ माही में इस नौ-आबाद तबाही में अब ख़ूब हँसेगा दीवाना अब नागिन ब़ाँबी गरमाएगी साँप की लाली लहराएगी काले आतिश-दानों में दानाइयाँ केंचुली बदलेंगी शहरों के बंदी-ख़ानों में और दूर खुले मैदानों में अब ख़ूब हँसेगा दीवाना भुस ख़ाली पेट में भर न सकेगा कोई तिजारत कर न सकेगा सुकड़ी सुकड़ी खालों की अब मंढ भी जाए तो बज न सकेगी नौबत पैसे वालों की बेकारी पर दल्लालों की अब ख़ूब हँसेगा दीवाना अब दाल न जागीरों की गलेगी आग मगर दिन रात जलेगी चमड़े के तन्नूरों में अब काल पड़ेगा ग़ल्ले का ब्योपारियों बे-मक़दूरों में और पेट भरे मज़दूरों में अब ख़ूब हँसेगा दीवाना अब गाढ़ा पसीना बुनने वाले ओढ़े फिरेंगे शाल दो-शाले मुफ़्त न झूलें झूलेंगी फूले हुए गाल अब पचकेंगे पिचकी हुई तोंदें फूलेंगी सब अक़्लें चौकड़ी भूलेंगी अब ख़ूब हँसेगा दीवाना
Hafeez Jalandhari
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