nazmKuch Alfaaz

मोहब्बत उस रोज़ तुम फिर दिखी काले कुर्ते पर लाल दुपट्टा किसी गुलाब सा था बड़ी ख़ुश थी तुम सच कहूँ तुम्हें देखना ख़्वाब सा था जितना सुना था तुम्हारे बारे कहानियाँ सब सच्ची लगती है अरे पागल मुस्कुराया करो तुम पर अच्छी लगती है उम्मीद नहीं थी मेरे दिए झुमके पहनोगी अरे एक मुलाक़ात के लिए क्या इतना सजोगी तुम्हारा काजल अलग कहानी बयाँ करता है हर बार तो एक जैसा होता है चलो कुछ नया करते हैं तुम्हारी ज़ुल्फ़ों में काएनात क़ैद है इन्हें खोल क्यूँँ नहीं देती मोहब्बत है अगर तो बोल क्यूँँ नहीं देती

Related Nazm

उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

475 likes

''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

295 likes

"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

216 likes

"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

180 likes

वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया

Faiz Ahmad Faiz

160 likes

More from Nikhil Tiwari 'Nazeel'

ख़्वाब ये ख़्वाब हैं जो आँखों आँखों में पल जाते हैं ये ख़्वाब हैं जो शाम से ढल जाते हैं ये ख़्वाब हैं जो ज़मीं से लगते हैं ये ख़्वाब हैं जो यक़ीं से लगते हैं ये ख़्वाब हैं जो कभी आसमाँ जिताते हैं ये ख़्वाब हैं जो कभी मिट्टी में मिलाते हैं ये ख़्वाब हैं जो हमें जीना सिखाते हैं ये ख़्वाब हैं दरिया में सफ़ीना भी बन जाते हैं ये ख़्वाब हैं जो कि मेहनतों से चलते हैं ये ख़्वाब हैं जो ख़ुदा की रहमतों पर पलते हैं ये ख़्वाब हैं जिन के लिए लड़ना पड़ता है ये ख़्वाब हैं,रातों रातों जागना पड़ता है ये ख़्वाब हैं जो मयख़ाने चलाते हैं ये ख़्वाब हैं जो पैमाने बताते हैं ये ख़्वाब हैं जो कभी महँगे हो जाते हैं ये ख़्वाब हैं जो कभी कौड़ियों में बिक जाते हैं ये ख़्वाब हैं माँ के चेहरे पर ख़ुशियाँ ले कर आते हैं ये ख़्वाब हैं हम कौन हैं हमें बताते हैं ये ख़्वाब हैं के शौक़ नवाबी हैं ये ख़्वाब हैं जो हाज़िर जवाबी हैं ये ख़्वाब हैं जो तेरे मेरे हिस्से आते हैं ये ख़्वाब हैं बन कर कहानी क़िस्से आते हैं

Nikhil Tiwari 'Nazeel'

1 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Nikhil Tiwari 'Nazeel'.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Nikhil Tiwari 'Nazeel''s nazm.