कितनी अच्छी प्यारी बाजी प्यारी प्यारी प्यारी बाजी अच्छे अच्छे गीत सुनाए प्यारे प्यारे गीत सुनाए एक था राजा एक थी रानी रोज़ कहे दिलचस्प कहानी बूझे है दिलचस्प पहेली अच्छी दोस्त है प्यारी सहेली कितने क़िस्से याद हैं उस को ख़ूब लतीफ़े याद हैं उस को मुझ को ख़ूब हँसाए बाजी रोऊँ तो बहलाए बाजी कितनी अच्छी प्यारी बाजी प्यारी प्यारी प्यारी बाजी गुड़िया का जब ब्याह रचाए सब बच्चों को साथ खिलाए बाग़ में जा कर झूला झूले मौज में आ कर डाली छू ली खेले मिल-जुल आँख-मिचोली बोले सब से प्यार की बोली खेले पर स्कूल से पहले रुक जाए हर भूल से पहले पढ़ने में होशियार है बाजी खेल में भी तय्यार है बाजी कितनी अच्छी प्यारी बाजी प्यारी प्यारी प्यारी बाजी मुखड़ा उस का भोला-भाला दाँत उस के मोती की माला हँस दे तो फुल-झड़ियाँ छूटे बात करें खुल जाए बूटे प्यारी प्यारी बातें उस की रहबर सारी बातें उस की सब को अच्छी बात बताए सब को सच्ची बात सिखाए सच्ची चाह जताए बाजी सीधी राह दिखाए बाजी कितनी अच्छी प्यारी बाजी प्यारी प्यारी प्यारी बाजी
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"तुम से बे-पनाह मोहब्बत" मेरे नूर-ए-नज़र आ भी जा तू नज़र कब सुनाएगा मुझ को तू अच्छी ख़बर तेरा आशिक़ बेचारा परेशान है तुझ से नाराज़ है और हैरान है क़ासिद-ए-मोतबर ले जा मेरी ख़बर तेरी नज़रों से मिलती हैं ख़ामोशियाँ दिल में क्यूँ रखता है इतनी सरगोशियाँ खोल दे अब ज़बाँ ऐ मेरे हम सफ़र मेरे दिल की तमन्ना यहीं हैं सनम मैं रहूँ साथिया बन के सातों जनम बात हो जाए सच तू जो कह दे अगर टूट कर मेरा दिल ये बिखर जाएगा तू न होगा तो ''दानिश'' ये मर जाएगा सूख जाएगा ये ज़िंदगी का शजर
Danish Balliavi
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"सच में तुम बेहद अच्छी हो" सब सेे प्यारी तुम लगती हो बस मुझ में ही गुम लगती हो वैसे ये दुनिया जँचती है पर दुनियाँ में तुम जँचती हो सच में तुम बेहद अच्छी हो इतनी अच्छी पूछो ही मत जैसे कोई चाँद सितारा जैसे माँ का बच्चा प्यारा जैसे रौशन रस्ता लगता वैसा रौशन तेरा दिल है शायद मेरी तू मंज़िल है तुझ को खोजा हर पल मैं ने हर इक घर में, हर दरवाज़े लेकिन तुम मेरे दिल में हो मेरी आँखों में रहती हो पर मैं ठहरा पागल लड़का सच को तो मैं अब हूँ समझा और कहीं तू होती कैसे मेरे ही दिल में बसती हो सच में तुम बेहद अच्छी हो
Kaviraj " Madhukar"
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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है
Sohaib Mugheera Siddiqi
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मैं रात उठूँ और अपने सारे पुराने यारों को फ़ोन कर के उन्हें जगाऊँ उन्हें जगाऊँ उन्हें बताऊँ कि यार तुम सब बदल गए हो बहुत ही आगे निकल गए हो जो राहें तुम ने चुनी हुई हैं वो कितनी तन्हा हैं कितनी ख़ाली जो रातें तुम ने पसंद की हैं वो सख़्त काली हैं सख़्त काली ज़रा सा माज़ी बईद देखो हम ऐसी दुनिया में जी रहे थे जहाँ पे हम से अगर हमारा कोई भी जिगरी ख़फ़ा हुआ तो हम उस का ग़ुस्सा ख़ुद अपने ऊपर निकालते थे हँसी की बातें, अजीब क़िस्से, अजीब सस्ते से जोक कह के किसी भी हालत, किसी भी क़ीमत पे उस ख़फ़ा को हँसा रहे थे और आज आलम है ऐसा हम सब ख़फ़ा ख़फ़ा हैं जुदा जुदा हैं हमारी लाइफ़ में कोई लड़की हमारी लाइफ़ बनी हुई है हमारी आँखों पे प्यार नामक सफ़ेद पट्टी बंधी हुई है तुम्हारी लाइफ़ को किस तरह तुम बिता रहे हो किसी हसीना की उलझी ज़ुल्फ़ें सँवारते हो उसी की नख़रे उठा रहे हो, रुला रहे हो, मना रहे हो ये बातें अपने मैं दोस्तों को सुनाना चाहूँ तो फ़ोन उठाऊँ जो फ़ोन उठाऊँ तो कॉन्टैक्ट को खँगाल बैठूँ मगर तअज्जुब के मेरी उँगली मेरी बग़ावत में आ खड़ी है किसी हसीना के एक नंबर को कॉल करने पे जा अड़ी है सो मैं किसी यार, दोस्त को फिर पुरानी यादें दिलाऊँ कैसे किसी का नंबर लगाऊँ कैसे मैं ख़ुद सभी को भुला चुका हूँ मैं कॉल आख़िर मिलाऊँ कैसे ??
Shadab Javed
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"उजड़ते बसते घर" बहुत तूफ़ान हैं मेरी जान, न घर बना इस ख़ुश्क साहिल पे सुनो! ये घर नहीं बस रेत का छोटा घरौंदा है, न जाने कितने तूफ़ानों ने कितनी बार रौंदा है बहुत टूटा है और फिर टूट कर बनता बिगड़ता है, ये मेरी हसरतों को चैन देकर फिर उजड़ता है उजड़कर चल पड़ा ये फिर किसी उजड़े से साहिल पे तो क्या? तूफ़ान हैं मेरी जान पर! तू घर बना इसी ख़ुश्क साहिल पे
Anmol Mishra
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आया है त्यौहार क्रिसमस बाँटे सब को प्यार क्रिसमस मैं लाया हूँ प्यारे तोहफ़े देखो कितने सारे तोहफ़े गुड़िया कैसी आली लाया गुड्डा दाढ़ी वाला लाया जिस के पास हों पैसे ले लो जी चाहे तो वैसे ले लो तोहफ़े पा कर सब बोलेंगे आए यूँँ हर बार क्रिसमस बाँटे सब को प्यार क्रिसमस रंगीले ग़ुब्बारे ले लो गोया चाँद सितारे ले लो चलती फिरती मोटर ले लो ढोल बजाता बंदर ले लो देखो आ कर ख़ूब तमाशा आओ जाने आओ 'पाशा' अगले साल मैं फिर आउँगा जब आएगा यार क्रिसमस बाँटे सब को प्यार क्रिसमस
Haidar Bayabani
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"क्रिसमस" आया है त्यौहार क्रिसमस बाँटे सब को प्यार क्रिसमस मैं लाया हूँ प्यारे तोहफ़े देखो कितने सारे तोहफ़े गुड़िया कैसी आली लाया गुड्डा दाढ़ी वाला लाया जिस के पास हों पैसे ले लो जी चाहे तो वैसे ले लो तोहफ़े पा कर सब बोलेंगे आए यूँँ हर बार क्रिसमस बाँटे सब को प्यार क्रिसमस रंगीले ग़ुब्बारे ले लो गोया चाँद सितारे ले लो चलती फिरती मोटर ले लो ढोल बजाता बंदर ले लो देखो आ कर ख़ूब तमाशा आओ जाने आओ 'पाशा' अगले साल मैं फिर आउँगा जब आएगा यार क्रिसमस बाँटे सब को प्यार क्रिसमस
Haidar Bayabani
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बेलों पर टॉफ़ी खिल जाए चाय कॉफ़ी नल से आए बिस्कुट डाली डाली झूले बच्चा बच्चा जिस को छू ले बगिया होगी कितनी प्यारी लड्डू हों जब क्यारी क्यारी बूँदें टपके बूँदीं बन कर बर्फ़ी फैले घर की छत पर हलवे का बादल घर आए ऐसा काश कभी हो जाए पेड़ों पर पेड़े लग जाएँ जब चाहें हम तोड़ के खाएँ हर जानिब सोहन हलवा हो बालूशाही का जल्वा हो झरना ख़ैर का बहता जाए ख़ूब जलेबी तैरती आए बेरी पर जब मारें पत्थर खील बताशे टपकें दिन भर बच्चा खाए बूढ़ा खाए ऐसा काश कभी हो जाए क़ुलफ़ी का मीनार खड़ा हो हर तारे में केक जुड़ा हो निकलें जब सड़कों पर घर से मोती-चूर के लड्डू बरसे मीठे दूध की बरसातें हों पेठे की सब सौग़ातें हों फ़ालूदे से हौज़ भरा हो लस्सी का दरिया बहता हो बारिश आ कर रस बरसाए ऐसा काश कभी हो जाए नफ़रत हो कड़वी बोली से उल्फ़त हो हर हम-जोली से शीरीं कर दें दुनिया सारी प्यार से भर दें दुनिया सारी दुनिया में हर काम हो शीरीं अव्वल आख़िर नाम हो शीरीं सब से 'हैदर' बोलो मीठा मीठा खा कर बोलो मीठा शीरीनी होंटों पर छाए ऐसा काश अभी हो जाए
Haidar Bayabani
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दीप से दीप जलाएँ साथी हर आँगन उजयारा कर लें हर ज़र्रा मह-पारा कर लें मेरे सीने तेरे सपने तेरे सुख-दुख मेरे अपने हर आशा को पाएँ साथी दीप से दीप जलाएँ साथी हर आँगन उजयारा कर लें हर ज़र्रा मह-पारा कर लें ये घर अपना वो घर अपना हीरा अपना कंकर अपना मिल-जुल साथ निभाएँ साथी दीप से दीप जलाएँ साथी हर आँगन उजयारा कर लें हर ज़र्रा मह-पारा कर लें भाई भाई बन के रहना साथ ही मरना साथ ही जीना मन से मन मिल जाएँ साथी दीप से दीप जलाएँ साथी हर आँगन उजयारा कर लें हर ज़र्रा मह-पारा कर लें जो साथी भी छूट गया हो बिन-कारन ही रूठ गया हो उस को भी मनवाएँ साथी दीप से दीप जलाएँ साथी हर आँगन उजयारा कर लें हर ज़र्रा मह-पारा कर लें
Haidar Bayabani
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जनवरी का महीना जो आ कर गया फिर नए साल की इब्तिदाई कर गया फ़रवरी कर रहा है जुदा सर्दियाँ हम उतारेंगे अब ऊन की वर्दियाँ मार्च है साल का तीसरा माह-ए-नौ सब को करता है तल्क़ीन अब ख़ुश रहो माह अप्रैल में इम्तिहाँ आएँगे रात-दिन पढ़ के हम पास हो जाएँगे लो मई आ गया बंद मकतब हुए गर्मियों से परेशान हम सब हुए जून बारिश की लाए ख़बर दोस्तो है फ़लक की तरफ़ हर नज़र दोस्तो है जुलाई के आने के अब सिलसिले खुल गए सारे स्कूल मकतब खुले साल में जब भी माह-ए-अगस्त आ चला अपनी आज़ादियों का बढ़ा क़ाफ़िला जब भी माह-ए-सितंबर जनाब आएगा खेतियों पर ग़ज़ब का शबाब आएगा लाए ख़ुश-हालियाँ देखना अक्टूबर खेत खलियान को हो रही है नज़र कितना पुर-कैफ़ मौसम नवम्बर में है मोतियों जैसी शबनम नवम्बर में है साल रुख़्सत हुआ लो दिसम्बर चला हो शुरूअ' अब नए साल का सिलसिला
Haidar Bayabani
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