nazmKuch Alfaaz

"सच में तुम बेहद अच्छी हो" सब सेे प्यारी तुम लगती हो बस मुझ में ही गुम लगती हो वैसे ये दुनिया जँचती है पर दुनियाँ में तुम जँचती हो सच में तुम बेहद अच्छी हो इतनी अच्छी पूछो ही मत जैसे कोई चाँद सितारा जैसे माँ का बच्चा प्यारा जैसे रौशन रस्ता लगता वैसा रौशन तेरा दिल है शायद मेरी तू मंज़िल है तुझ को खोजा हर पल मैं ने हर इक घर में, हर दरवाज़े लेकिन तुम मेरे दिल में हो मेरी आँखों में रहती हो पर मैं ठहरा पागल लड़का सच को तो मैं अब हूँ समझा और कहीं तू होती कैसे मेरे ही दिल में बसती हो सच में तुम बेहद अच्छी हो

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

Faiz Ahmad Faiz

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क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!

Raghav Ramkaran

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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं

Tehzeeb Hafi

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" करेंगे बस तुम्हें ही प्यार हम तो " तुम्हीं पे जान हम मरते रहेगें तुम्हीं से बात बस करते रहेगें रखेगें हम तुम्हें अपना बना कर हक़ीक़त याकि फिर सपना बना कर कभी भी हम न होंगे दूर तुम सेे करेंगे प्यार भी भरपूर तुम सेे तुम्हारा नाम ही ये दिल पुकारे कि रहना साथ तुम हर पल हमारे हमारी आशिक़ी तुम बन चुकी हो हमारी बन्दगी तुम बन चुकी हो तुम्हीं में हर ख़ुशी अब दिख रही है तुम्हीं में ज़िन्दगी अब दिख रही है तुम्हीं पे मर मिटे हैं यार हम तो करेंगे बस तुम्हें ही प्यार हम तो

Kaviraj " Madhukar"

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“सभी से क़ीमती है वो” कहो उस सेे उसी को बस उसी को प्यार करता हूँ अभी भी बस उसी को गीत में गुलज़ार करता हूँ मुझे कुछ भी सिवा उस के यहाँ दिखता नहीं है अब उसे यूँँ छोड़ना प्यारे सरल इतना नहीं है अब मुहब्ब़त कर रहा हूँ तो निभा के भी दिखाऊँगा उसे मैं चाहता हूँ यार पाके भी दिखाऊँगा उसे ही याद करता हूँ मिरी हालत यही है अब उसे मैं भूल जाऊँ यार ये मुमकिन नहीं है अब कि उस की चाह में बर्बाद होना ठीक जानू मैं मिलेगा चैन तब मुझ को उसे अपना बना लूँ मैं जो ख़ुशियों से भरे थे यार वो दिन रात देखे हैं हज़ारों ख़्वाब बस मैं ने उसी के साथ देखे हैं हमारी आशिक़ी है वो हमारी ज़ि़ंदगी है वो मुझे वो चाहिए है बस सभी से क़ीमती है वो

Kaviraj " Madhukar"

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"सच्चा प्रेम" हम तो उस मोहन के कायल जिस पर सब गोपी मरती थीं जिस को वो अपना कहती थीं जिस को बाँहो में भरती थीं लेकिन उस मोहन को देखो उस मोहन के मन को देखो बस इक की चाहत करता था या'नी राधे पे मरता था या'नी राधे पे मरता था

Kaviraj " Madhukar"

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"तुम सेे प्यार हम को हो चुका है" हमारा दिल तुम्हीं में खो चुका है कि तुम सेे प्यार हम को हो चुका है न है मालूम दिल को क्या हुआ है तुम्हारी सोच में डूबा हुआ है तुम्हें ही याद करता जा रहा है तुम्हें ही ख़्वाब में भी पा रहा है जहाँ देखूँ तुम्हें तुम तो वही हो तुम्हीं तुम बस मुझे अब दिख रही हो तुम्हारे इश्क़ में जबसे पडा़ हूँ नहीं मालूम क्या से क्या हुआ हूँ तुम्हीं मंजिल तुम्हीं हो रास्ता अब तुम्हीं से हो गया है वास्ता अब तुम्हारे बिन नहीं कुछ भी यहाँ मैं तुम्हारे साथ हूँ सारा जहाँ मैं तुम्हें अपना ख़ुदा भी मानता हूँ तुम्हें अपना पता भी मानता हूँ हमारा दिल ख़ुशी से खिल गया है कि जबसे तुम मिले सब मिल गया है

Kaviraj " Madhukar"

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"महबूब से गुहार" भरोसा मैं तिरा करता रहूँ तुझे ही बस यहाँ अपना कहूँ कि आओ भी मिरे अब पास तुम बनाओ भी मुझे अब ख़ास तुम मुझे जीना तिरे ही साथ है तुझी से तो मिरे दिन रात है मुझे तेरा सहारा चाहिए कि कश्ती को किनारा चाहिए सुनो भी बात को मेरी सनम तुझे ही चाहता अपनी क़सम यहाँ कोई मुझे भाता नहीं तिरे बिन अब रहा जाता नहीं

Kaviraj " Madhukar"

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