"तुम सेे प्यार हम को हो चुका है" हमारा दिल तुम्हीं में खो चुका है कि तुम सेे प्यार हम को हो चुका है न है मालूम दिल को क्या हुआ है तुम्हारी सोच में डूबा हुआ है तुम्हें ही याद करता जा रहा है तुम्हें ही ख़्वाब में भी पा रहा है जहाँ देखूँ तुम्हें तुम तो वही हो तुम्हीं तुम बस मुझे अब दिख रही हो तुम्हारे इश्क़ में जबसे पडा़ हूँ नहीं मालूम क्या से क्या हुआ हूँ तुम्हीं मंजिल तुम्हीं हो रास्ता अब तुम्हीं से हो गया है वास्ता अब तुम्हारे बिन नहीं कुछ भी यहाँ मैं तुम्हारे साथ हूँ सारा जहाँ मैं तुम्हें अपना ख़ुदा भी मानता हूँ तुम्हें अपना पता भी मानता हूँ हमारा दिल ख़ुशी से खिल गया है कि जबसे तुम मिले सब मिल गया है
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मैं सपनों में ऑक्सीजन प्लांट इंस्टॉल कर रहा हूँ और हर मरने वाले के साथ मर रहा हूँ मैं अपने लफ़्ज़ों के जरिए तुम्हें साँसों के सिलेंडर भेजूँगा जो तुम्हें इस जंग में हारने नहीं देंगे और तुम्हारी देखभाल करने वालों के हाथों को काँपने नहीं देंगे ऑक्सीजन स्टॉक ख़त्म होने की ख़बरें गर्दिश भी करें तो क्या मैं तुम्हारे लिए अपनी नज़्मों से वेंटीलेटर बनाऊँगा अस्पतालों के बिस्तर भर भी जाएँ कुछ लोग तुम सेे बिछड़ भी जाएँ तो हौसला मत हारना क्यूँँकि रात चाहे जितनी मर्ज़ी काली हो गुज़र जाने के लिए होती है रंग उतर जाने के लिए होते हैं और ज़ख़्म भर जाने के होते हैं
Tehzeeb Hafi
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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इक ख़त मुझे लिखना है दिल्ली में बसे दिल को इक दिन मुझे चखना है खाजा तेरी नगरी का खुसरो तेरी चौखट से इक शब मुझे पीनी है शीरीनी सुख़नवाली ख़ुशबू ए वतन वाली ग़ालिब तेरे मरकद को इक शे'र सुनाना है इक सांवली रंगत को चुपके से बताना है मैं दिल भी हूँ दिल्ली भी उर्दू भी हूँ हिन्दी भी इक ख़त मुझे लिखना है मुमकिन है कभी लिक्खूँ मुमकिन है अभी लिक्खूँ
Ali Zaryoun
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"तुम हो" तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो मैं होश में बाहोश में मिरे जिस्म का तुम ख़ून हो तुम सर्द हो बरसात भी मिरी गर्मियों की तुम जून हो तुम ग़ज़ल हो हो तुम शा'इरी मिरी लिखी नज़्म की धुन हो मिरी हँसी भी तुम मिरी ख़ुशी भी तुम मिरे इस हयात की मम्नून हो तुम धूप हो मिरी छाँव भी तुम सियाह रात का मून हो तुम सिन हो तुम काफ़ भी तुम वाओ के बा'द की नून हो तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो
ZafarAli Memon
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"नज़्म" इक बरस और कट गया 'शारिक़' रोज़ साँसों की जंग लड़ते हुए सब को अपने ख़िलाफ़ करते हुए यार को भूलने से डरते हुए और सब से बड़ा कमाल है ये साँसें लेने से दिल नहीं भरता अब भी मरने को जी नहीं करता
Shariq Kaifi
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“सभी से क़ीमती है वो” कहो उस सेे उसी को बस उसी को प्यार करता हूँ अभी भी बस उसी को गीत में गुलज़ार करता हूँ मुझे कुछ भी सिवा उस के यहाँ दिखता नहीं है अब उसे यूँँ छोड़ना प्यारे सरल इतना नहीं है अब मुहब्ब़त कर रहा हूँ तो निभा के भी दिखाऊँगा उसे मैं चाहता हूँ यार पाके भी दिखाऊँगा उसे ही याद करता हूँ मिरी हालत यही है अब उसे मैं भूल जाऊँ यार ये मुमकिन नहीं है अब कि उस की चाह में बर्बाद होना ठीक जानू मैं मिलेगा चैन तब मुझ को उसे अपना बना लूँ मैं जो ख़ुशियों से भरे थे यार वो दिन रात देखे हैं हज़ारों ख़्वाब बस मैं ने उसी के साथ देखे हैं हमारी आशिक़ी है वो हमारी ज़ि़ंदगी है वो मुझे वो चाहिए है बस सभी से क़ीमती है वो
Kaviraj " Madhukar"
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" करेंगे बस तुम्हें ही प्यार हम तो " तुम्हीं पे जान हम मरते रहेगें तुम्हीं से बात बस करते रहेगें रखेगें हम तुम्हें अपना बना कर हक़ीक़त याकि फिर सपना बना कर कभी भी हम न होंगे दूर तुम सेे करेंगे प्यार भी भरपूर तुम सेे तुम्हारा नाम ही ये दिल पुकारे कि रहना साथ तुम हर पल हमारे हमारी आशिक़ी तुम बन चुकी हो हमारी बन्दगी तुम बन चुकी हो तुम्हीं में हर ख़ुशी अब दिख रही है तुम्हीं में ज़िन्दगी अब दिख रही है तुम्हीं पे मर मिटे हैं यार हम तो करेंगे बस तुम्हें ही प्यार हम तो
Kaviraj " Madhukar"
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"सच्चा प्रेम" हम तो उस मोहन के कायल जिस पर सब गोपी मरती थीं जिस को वो अपना कहती थीं जिस को बाँहो में भरती थीं लेकिन उस मोहन को देखो उस मोहन के मन को देखो बस इक की चाहत करता था या'नी राधे पे मरता था या'नी राधे पे मरता था
Kaviraj " Madhukar"
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"सच में तुम बेहद अच्छी हो" सब सेे प्यारी तुम लगती हो बस मुझ में ही गुम लगती हो वैसे ये दुनिया जँचती है पर दुनियाँ में तुम जँचती हो सच में तुम बेहद अच्छी हो इतनी अच्छी पूछो ही मत जैसे कोई चाँद सितारा जैसे माँ का बच्चा प्यारा जैसे रौशन रस्ता लगता वैसा रौशन तेरा दिल है शायद मेरी तू मंज़िल है तुझ को खोजा हर पल मैं ने हर इक घर में, हर दरवाज़े लेकिन तुम मेरे दिल में हो मेरी आँखों में रहती हो पर मैं ठहरा पागल लड़का सच को तो मैं अब हूँ समझा और कहीं तू होती कैसे मेरे ही दिल में बसती हो सच में तुम बेहद अच्छी हो
Kaviraj " Madhukar"
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"महबूब से गुहार" भरोसा मैं तिरा करता रहूँ तुझे ही बस यहाँ अपना कहूँ कि आओ भी मिरे अब पास तुम बनाओ भी मुझे अब ख़ास तुम मुझे जीना तिरे ही साथ है तुझी से तो मिरे दिन रात है मुझे तेरा सहारा चाहिए कि कश्ती को किनारा चाहिए सुनो भी बात को मेरी सनम तुझे ही चाहता अपनी क़सम यहाँ कोई मुझे भाता नहीं तिरे बिन अब रहा जाता नहीं
Kaviraj " Madhukar"
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