दीप से दीप जलाएँ साथी हर आँगन उजयारा कर लें हर ज़र्रा मह-पारा कर लें मेरे सीने तेरे सपने तेरे सुख-दुख मेरे अपने हर आशा को पाएँ साथी दीप से दीप जलाएँ साथी हर आँगन उजयारा कर लें हर ज़र्रा मह-पारा कर लें ये घर अपना वो घर अपना हीरा अपना कंकर अपना मिल-जुल साथ निभाएँ साथी दीप से दीप जलाएँ साथी हर आँगन उजयारा कर लें हर ज़र्रा मह-पारा कर लें भाई भाई बन के रहना साथ ही मरना साथ ही जीना मन से मन मिल जाएँ साथी दीप से दीप जलाएँ साथी हर आँगन उजयारा कर लें हर ज़र्रा मह-पारा कर लें जो साथी भी छूट गया हो बिन-कारन ही रूठ गया हो उस को भी मनवाएँ साथी दीप से दीप जलाएँ साथी हर आँगन उजयारा कर लें हर ज़र्रा मह-पारा कर लें
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"चलो बचपन उगाते हैं" चलो भली आदत बनाते हैं चलो ख़ुद को सिखाते हैं चलो बचपन उगाते हैं तजुर्बे ज़र्द से लगने लगे हैं कवर उन पर चढ़ाते हैं... चलो बचपन उगाते हैं... चलो सींचें वो बीता कल जुगत से चलो खेलें वही सब खेल कल के चलो उन गर्मियों की कुल्फ़ियों को फिर मनाते हैं चलो बचपन उगाते हैं के चुटकी एक ले कर मुस्कुराहट की मिलाते हैं समय की आँच पर यादों की हांडी फिर चढ़ाते हैं मिलाते हैं वो इक छोटा सा चम्मच बचपने का चलो मिल कर के फिर से वो ही नादानी पकाते हैं सुनहरा एक और सिक्का सुब्ह की धूप का चलका चलो शीशे के टुकड़े से, उसे घर भर घुमाते हैं या वो छोटा सा साबुन का गुबारा फूँक से हल्का अंगूठे और उँगली को मिलाकर फिर फुलाते हैं या डब्बे से चुरा कर गुड़ के लड्डू जेब में रख कर यारों को दिखा कर खाके सब को फिर जलाते हैं चलो बचपन उगाते हैं किसी के दस के गिनते ही..कहीं कोने में छुप कर के कभी चुपके से उस की पीठ पर धप्पा जमाते हैं चलो बचपन उगाते हैं
Saurabh Mehta 'Alfaaz'
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ग़लत-फ़हमी भले दिनों की बात है भला सा एक शहर था ग़मों के उस दयार में फ़लक से उतरी अप्सरा थी शक्ल से बहार वो गुलाब जैसे गाल थे थी चाल उस की नदियों सी कि रेशमी से बाल थे अदब था उस में इस-क़दर कि शर्म भी हया करे वो आए सज के सामने तो चाँद भी गिला करे वो जिस दिशा भी चल पड़े हज़ार भॅंवरे हम-सफ़र कि हर रक़ीब लड़ पड़े वो देख ले पलट के गर ग़मों के उस दयार से ग़मों ने फिर विदा लिया कि दिल-कशी सी छा गई यूँँ इश्क़ ने असर किया ये उन दिनों की बात है मैं बे-ख़बर था इश्क़ से वो दोस्तों की दास्ताँ मज़ाक़ थी मेरे लिए मगर मेरे नसीब में थीं बद-दुआएँ इश्क़ की सो एक रोज़ यूँँ हुआ कि रू-ब-रू वो मिल गई भली सी इक वो शाम थी गुज़र रहा था मोड़ से न जाने क्या सितम हुआ कि आ गई वो सामने नज़र से यूँँ नज़र लड़ी कि वक़्त जैसे खो गया मैं क्या बताऊँ हाल-ए-दिल कि इल्म-ए-इश्क़ हो गया गली में उस की रात-दिन यही बस एक काम था कि उस के आशिक़ों में फिर मेरा भी एक नाम था पलट के उस को देखूँ मैं तो खुल के मुस्कुराए वो मैं भाने लग गया उसे मुझे भी रास आए वो ख़ुदा ने यूँँ ग़ज़ब किया कि बात होने लग गई मैं शे'र कहने लग गया वो ख़्वाब बोने लग गई मगर हुआ ये इल्म फिर कि हम थे इख़्तिलाफ़ में मैं इश्क़ के ख़ुमार में वो इश्क़ के ख़िलाफ़ में थी उस को चश्म-ए-दोस्ती मैं इश्क़ का नशा लिए तो कोशिशें शुरू हुईं कि रिश्ता ये बचा रहे मगर है सच ये बात भी कि कब तलक फ़िज़ूल में यूँँ इश्क़ के दरख़्त पे ये दोस्ती के गुल खिलें सो एक रोज़ क्या हुआ कि बात इस-क़दर हुई मैं इश्क़ पे अड़ा रहा कि दोस्ती बिखर गई मैं इश्क़ का दलाल था वो दोस्ती को रब कहे हर इक मेरी दलील को वो जिस्म की तलब कहे ये इश्क़-विश्क़ जाल है कि मुझ को इनसे बख़्श दो अगर क़ुबूल हो तुम्हें तो दोस्ती के ख़त लिखो है इश्क़ की तलब तुम्हें मैं हूँ अलग मिज़ाज की न शौक़ कुछ तबाही का मैं लड़की काम-काज की मैं दोस्ती निभाऊँगी ख़ुदा की है क़सम मुझे मगर जो ज़िद हो इश्क़ की तो भूल जाओ तुम मुझे न उस के दिल में इश्क़ था न मेरे दिल में दोस्ती मैं मोड़ पर खड़ा रहा वो छोड़ कर चली गई थी आँख नम अगर मेरी उसे भी कुछ मलाल था मिलेंगे फिर कभी न हम ये उस को भी ख़याल था सो यूँँ हुआ कि फिर हमें नसीब ने जुदा किया वो दोस्त के बिना रही मैं इश्क़ के बिना जिया वो क्या ख़बर कहाँ गई कि कुछ पता नहीं चला मैं उस की याद में मगर हज़ार शब जगा रहा मैं अपने ग़म की दास्ताँ सुनाता ही चला गया सुख़न थे जो फ़िराक़ के वो गाता ही चला गया ये आजकल की बात है हज़ार ग़म हैं सहने को क़लम अगर उठाऊँ तो न कुछ बचा है कहने को न क़ाफ़िए बचे हैं कुछ न कुछ रदीफ़ें रह गईं थीं ग़ज़लें जो भी पास में वो आँसुओं में बह गईं है बहर की समझ कहाँ जो नज़्म कोई कह सकूँ है शा'इरी कि बेबसी मैं क्या कहूँ मैं क्या लिखूँ सो अब कुछ ऐसा हाल है कि कोई चारा-गर नहीं भला हूँ या बुरा हूँ मैं किसी को कुछ ख़बर नहीं न अब किसी से इश्क़ है न है किसी से दोस्ती है उस की शक्ल ज़ेहन में पता नहीं कभी-कभी
Rehaan
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"बाबा" तेरे कमरे से जो आती थी हमेशा बाबा वो आवाज़ पुकारती नहीं मुझ को बाबा तेरे काँधों पर बैठ कर जो देखे थे कभी वो मेले लगते हैं अब सूने विरान बाबा ये ज़माने की निगाहें सौदागर है वहशी है ये नोच खाएगी जिस्मों को हमारे बाबा तू घर में हमारे माली-ए-गुलशन था हम तो तेरे आँगन की कली थे बाबा तेरे काँधों पर आख़िरी वक़्त रोना था हमें तेरे साए में इस घर से विदा होना था बाबा तेरी ही निशानी है तुझ सा दिखता भी है भाई भी कब बेटियों सा समझता है बाबा तू जो गया माँ के चेहरे की रंगत भी ले गया वो भी उदास है बहुत कम बोलती है बाबा दिल से अब बस यही दुआ निकलती है हमें तुम मुस्कुराते मिलो जन्नत में बाबा
ALI ZUHRI
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सावन आया उन के घर, मेरे भी घर उन के आंगन में मँडरायीं खूब घटायें काली काली, उन के ऑँगन के गमलों में विखर गई सुंदर हरियाली, नूतन किसलय फूट पडे हैं झूम रही है डाली डाली, कुछ भी हो उन के आँगन की सुन्दरता है बहुत निराली। उन के घर कोने कोने में उमडा है ख़ुशियों का सागर..। सावन आया............ मेरे घर की बूढी छत ने अपनी जर्जरता दिखलाई, कमरे में पानी भर आया आँगन में पसरी है काई, छोटू बिट्टू मुन्नू मिट्ठू ने अपनी कश्ती तैराई, वो भी ख़ुश हैं मैं भी ख़ुश हूँ सावन तुझ को लाख बधाई। उन का सावन भी सुंदर है मेरा सावन उन सेे सुन्दर। सावन आया उन के घर, मेरे भी घर
Gyan Prakash Akul
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"तशवीश" मुझ को ये डर है कि शायद ये सब कुछ सच हो जाएगा आज का दिन निकला है जैसे यूँँॅं कल का भी निकल जाएगा फिर धीरे-धीरे क्या होगा मेरी सालों की मेहनत पर ये क़िस्मत पानी फेरेगी मैं अल्हड़-पन से निकलूॅंगा और ज़िम्मेदारी घेरेगी कॉलेज ख़त्म हो जाएगा फिर नौकरी करूँॅंगा मैं और दस पंद्रह हज़ार के ख़ातिर दिन और रात मरूॅंगा मैं दिन दफ़्तर में जाएगा और रात ख़यालों में जाएगी फिर इस सोच में दिन निकलेंगे अपनी बारी आएगी मगर नहीं आएगी इक इतवार ज़रूर आएगा छह दिन बा'द कहीं जा कर के एक महीने की तनख़्वाह इक हफ़्ते में ख़त्म फिर दूर-दूर तक नहीं दिखेंगे नाज़ ग़ज़ल और नज़्म शौक़ दबाता जाऊॅंगा फ़र्ज़ निभाता जाऊॅंगा फिर धीरे-धीरे क्या होगा शादी की बातें होंगी दिन दफ़्तर में जाएगा साथ किसी के रातें होंगी जो शाख-ए-उम्मीद पकड़ के बैठा हूँ ये भी इक दिन जल जाएगी फिर धीरे-धीरे क्या होगा नाज़ जवानी ढल जाएगी मुझ को कुछ करना था मुझ को कुछ बनना था मगर नहीं कर पाया मैं बाक़ी सब तो कर लेंगे कुछ अपना ही रह जाएगा ये दुनिया घूमने का सपना सपना ही रह जाएगा फिर हर रोज़ पशेमाँ हो के मैं बीती बातें सोचूॅंगा और ख़ुद को कोसूॅंगा ये भी किया जा सकता था वो भी किया जा सकता था यूँँॅं ज़िन्दगी गुज़ार दी है खुल के जिया जा सकता था और फिर अपनी नज़्म पढूॅंगा उम्र निकलती जाएगी मौत का ख़ौफ़ रहेगा फिर धीरे-धीरे क्या होगा इक दिन इन सब से तंग आके मैं शायद ख़ुद-कुशी करूँॅंगा शे'र लिखा होगा दीवार-ओ-दर पर एक बहुत अच्छा सा लगता है हर रोज़ यही इक ऐसा दिन भी आएगा मुझ को ये डर है कि शायद ये सब कुछ सच हो जाएगा
Naaz ishq
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आया है त्यौहार क्रिसमस बाँटे सब को प्यार क्रिसमस मैं लाया हूँ प्यारे तोहफ़े देखो कितने सारे तोहफ़े गुड़िया कैसी आली लाया गुड्डा दाढ़ी वाला लाया जिस के पास हों पैसे ले लो जी चाहे तो वैसे ले लो तोहफ़े पा कर सब बोलेंगे आए यूँँ हर बार क्रिसमस बाँटे सब को प्यार क्रिसमस रंगीले ग़ुब्बारे ले लो गोया चाँद सितारे ले लो चलती फिरती मोटर ले लो ढोल बजाता बंदर ले लो देखो आ कर ख़ूब तमाशा आओ जाने आओ 'पाशा' अगले साल मैं फिर आउँगा जब आएगा यार क्रिसमस बाँटे सब को प्यार क्रिसमस
Haidar Bayabani
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"क्रिसमस" आया है त्यौहार क्रिसमस बाँटे सब को प्यार क्रिसमस मैं लाया हूँ प्यारे तोहफ़े देखो कितने सारे तोहफ़े गुड़िया कैसी आली लाया गुड्डा दाढ़ी वाला लाया जिस के पास हों पैसे ले लो जी चाहे तो वैसे ले लो तोहफ़े पा कर सब बोलेंगे आए यूँँ हर बार क्रिसमस बाँटे सब को प्यार क्रिसमस रंगीले ग़ुब्बारे ले लो गोया चाँद सितारे ले लो चलती फिरती मोटर ले लो ढोल बजाता बंदर ले लो देखो आ कर ख़ूब तमाशा आओ जाने आओ 'पाशा' अगले साल मैं फिर आउँगा जब आएगा यार क्रिसमस बाँटे सब को प्यार क्रिसमस
Haidar Bayabani
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बेलों पर टॉफ़ी खिल जाए चाय कॉफ़ी नल से आए बिस्कुट डाली डाली झूले बच्चा बच्चा जिस को छू ले बगिया होगी कितनी प्यारी लड्डू हों जब क्यारी क्यारी बूँदें टपके बूँदीं बन कर बर्फ़ी फैले घर की छत पर हलवे का बादल घर आए ऐसा काश कभी हो जाए पेड़ों पर पेड़े लग जाएँ जब चाहें हम तोड़ के खाएँ हर जानिब सोहन हलवा हो बालूशाही का जल्वा हो झरना ख़ैर का बहता जाए ख़ूब जलेबी तैरती आए बेरी पर जब मारें पत्थर खील बताशे टपकें दिन भर बच्चा खाए बूढ़ा खाए ऐसा काश कभी हो जाए क़ुलफ़ी का मीनार खड़ा हो हर तारे में केक जुड़ा हो निकलें जब सड़कों पर घर से मोती-चूर के लड्डू बरसे मीठे दूध की बरसातें हों पेठे की सब सौग़ातें हों फ़ालूदे से हौज़ भरा हो लस्सी का दरिया बहता हो बारिश आ कर रस बरसाए ऐसा काश कभी हो जाए नफ़रत हो कड़वी बोली से उल्फ़त हो हर हम-जोली से शीरीं कर दें दुनिया सारी प्यार से भर दें दुनिया सारी दुनिया में हर काम हो शीरीं अव्वल आख़िर नाम हो शीरीं सब से 'हैदर' बोलो मीठा मीठा खा कर बोलो मीठा शीरीनी होंटों पर छाए ऐसा काश अभी हो जाए
Haidar Bayabani
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जनवरी का महीना जो आ कर गया फिर नए साल की इब्तिदाई कर गया फ़रवरी कर रहा है जुदा सर्दियाँ हम उतारेंगे अब ऊन की वर्दियाँ मार्च है साल का तीसरा माह-ए-नौ सब को करता है तल्क़ीन अब ख़ुश रहो माह अप्रैल में इम्तिहाँ आएँगे रात-दिन पढ़ के हम पास हो जाएँगे लो मई आ गया बंद मकतब हुए गर्मियों से परेशान हम सब हुए जून बारिश की लाए ख़बर दोस्तो है फ़लक की तरफ़ हर नज़र दोस्तो है जुलाई के आने के अब सिलसिले खुल गए सारे स्कूल मकतब खुले साल में जब भी माह-ए-अगस्त आ चला अपनी आज़ादियों का बढ़ा क़ाफ़िला जब भी माह-ए-सितंबर जनाब आएगा खेतियों पर ग़ज़ब का शबाब आएगा लाए ख़ुश-हालियाँ देखना अक्टूबर खेत खलियान को हो रही है नज़र कितना पुर-कैफ़ मौसम नवम्बर में है मोतियों जैसी शबनम नवम्बर में है साल रुख़्सत हुआ लो दिसम्बर चला हो शुरूअ' अब नए साल का सिलसिला
Haidar Bayabani
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कितनी अच्छी प्यारी बाजी प्यारी प्यारी प्यारी बाजी अच्छे अच्छे गीत सुनाए प्यारे प्यारे गीत सुनाए एक था राजा एक थी रानी रोज़ कहे दिलचस्प कहानी बूझे है दिलचस्प पहेली अच्छी दोस्त है प्यारी सहेली कितने क़िस्से याद हैं उस को ख़ूब लतीफ़े याद हैं उस को मुझ को ख़ूब हँसाए बाजी रोऊँ तो बहलाए बाजी कितनी अच्छी प्यारी बाजी प्यारी प्यारी प्यारी बाजी गुड़िया का जब ब्याह रचाए सब बच्चों को साथ खिलाए बाग़ में जा कर झूला झूले मौज में आ कर डाली छू ली खेले मिल-जुल आँख-मिचोली बोले सब से प्यार की बोली खेले पर स्कूल से पहले रुक जाए हर भूल से पहले पढ़ने में होशियार है बाजी खेल में भी तय्यार है बाजी कितनी अच्छी प्यारी बाजी प्यारी प्यारी प्यारी बाजी मुखड़ा उस का भोला-भाला दाँत उस के मोती की माला हँस दे तो फुल-झड़ियाँ छूटे बात करें खुल जाए बूटे प्यारी प्यारी बातें उस की रहबर सारी बातें उस की सब को अच्छी बात बताए सब को सच्ची बात सिखाए सच्ची चाह जताए बाजी सीधी राह दिखाए बाजी कितनी अच्छी प्यारी बाजी प्यारी प्यारी प्यारी बाजी
Haidar Bayabani
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