nazmKuch Alfaaz

रीडिंग फ़ॉर ए ब्लाईंड चाइल्ड इन घुप्प अँधेरी गलियों में रौशन सी सदायें बहने दो बस आवाज़ों की उँगली पकड़ मुझे इस जंगल में रहने दो शे'रू कैसे दहाड़ा, झरना क्या बोला चाँद ने फिर क्या नाक सिकोड़ी ; ख़ामोश नज़ारे हैं ये सब पलकों पे उजाले दुखते हैं, 'फूल' पढ़ूँ गर ब्रेल में तो वो पोटुओं में चुभते हैं तुम आँखों पे आवाज़ें रख दो फिर पुस्तक को कहने दो इन घुप्प अँधेरी गलियों में रौशन सी सदायें बहने दो ।

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हम घूम चुके बस्ती बन में इक आस की फाँस लिए मन में कोई साजन हो कोई प्यारा हो कोई दीपक हो, कोई तारा हो जब जीवन रात अँधेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो जब सावन बादल छाए हों जब फागुन फूल खिलाए हों जब चंदा रूप लुटाता हो जब सूरज धूप नहाता हो या शाम ने बस्ती घेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो हाँ दिल का दामन फैला है क्यूँँंगोरी का दिल मैला है हम कब तक पीत के धोके में तुम कब तक दूर झरोके में कब दीद से दिल को सेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो क्या झगड़ा सूद ख़सारे का ये काज नहीं बंजारे का सब सोना रूपा ले जाए सब दुनिया, दुनिया ले जाए तुम एक मुझे बहुतेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो

Ibn E Insha

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कॉफ़ी कप रीडिंग उसे मैसेज तो भेजा है के कॉफ़ी पर मिलो मुझ से वो आ जाएगी तो अच्छा मैं पहले सिर्फ़ दो कॉफ़ी मँगाऊंगा मैं कैपेचीनो पीता हूँ वो कैसी कॉफ़ी पीती है इस का अंदाज़ा तो उस के आने पर होगा… हमारे पास तो बातें भी कम हैं सो कॉफ़ी जल्द पी लेंगे। जो उस के कप में थोडा झाग कॉफ़ी का बचा होगा मैं उस की शेप को पढ़ कर उसे फ्यूचर बताउँगा बताऊँगा उसे मैं कैसे वो मुझ जैसे इक लड़के की दुनिया को बदल देगी… (उसे मालूम होगा क्या? के कॉफ़ी कप की रीडिंग का तरीक़ा ये नहीं होता ?) मैं कैफ़े आ चुका हूँ... ...वो भी रस्ते में कहीं होगी बहुत से लोग कैफ़े आ के पढ़ते लिखते रहते हैं मुहम्मद अल्वी की नज़्में तो मैं भी साथ लाया हूँ ये होगा तो नहीं फिर भी, वो आई ही नहीं तो फिर इन्हीं लोगों के जैसे मैं भी पढ़ कर वक़्त काटूँगा। उसे आने में देरी हो रही है मैं इक कॉफ़ी तो तन्हा पी चुका हूँ ज़रा सा झाग कप में है जिसे देखो तो लगता है के इक लड़का अकेला बैठ कर कुछ पढ़ रहा है। तसल्ली दे रहा हूँ अब मैं ख़ुद को ये मेरी शाम का फ्यूचर नहीं है ... के कॉफ़ी कप की रीडिंग का तरीक़ा ये नहीं होता…

Swapnil Tiwari

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रात ढलती है सुब्ह होती है खोल दो अब तो उठ के दरवाज़ा इस अँधेरी सी कोठरी में आज वक़्त आया है रहने बसने को ऐसे मेहमाँ का क्या भरोसा है ये दबे पाँव लौट जाएगा

Javed Kamal Rampuri

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"बिन तेरे" बिन तेरे कुछ भी नहीं ज़िन्दगी मेरी आ दो पल पास बैठ मेरे ज़िन्दगी की घड़ी कर दे पूरी मुकम्मल न हुई ये ज़मीं न मुकम्मल ये आसमाँ हुआ अधूरा तेरे बिन सारा कारवाँ हुआ बिन तेरे कुछ भी नहीं ज़िन्दगी मेरी तेरे बिन ये बूंदे ये बारिश कुछ भी मेरा न हुआ बस जलता दिख रहा है तेरी यादों का धुआँ सोचता हूँ जब मैं लगता है जैसे कुछ न हुआ बिन तेरे कुछ भी नहीं ज़िन्दगी मेरी आ दो पल पास बैठ मेरे ज़िन्दगी की घड़ी कर दे पूरी आग लगी है जो मन में कैसे मैं किसी को बताऊँ क्यूँँ न तुझ को मैं चाहूँ कोई वजह तो मुझ को बताओ कड़कती बिजली अँधेरी शाम धीमी सी बारिश महीना सावन का लाया आज फिर कोई मेरी यादों में तेरे जैसा ही हू-ब-हू याद आया बिन तेरे कुछ भी नहीं ज़िन्दगी मेरी आ दो पल पास बैठ मेरे ज़िन्दगी की घड़ी कर दे पूरी

Pankaj murenvi

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"तेरी याद है" मैं हूँ ये काली अँधेरी रात है तन्हाई है और तेरी याद है मेरे हाथ में क़लम है पास में रखा एक गिलास है जो शराब से भरा है तुझे याद किए जा रहा हूँ शराब पीते हुए नज़्म लिखते जा रहा हूँ सुनो मेरे लिखे नज़्म तो पढ़ोगी ना ख़्वाबों में मुलाक़ात तो करोगी ना प्यार से न सही, नफ़रत से ही मुझे याद तो करोगी ना जब याद आए मेरी तो ये भी ख़याल करना मैं तेरी आवाज़ सुनने को परेशान रहता हूँ मैं तुझे एक बार देखना चाहता हूँ मैं चाहता हूँ कि तू फिर से मेरे सर पे हाथ फेरे मैं ये भी चाहता हूँ कि तू फिर से आए मेरे पास और आ कर फिर कभी न जाए पर ऐसा तो हो ही नहीं सकता ऐसा होना तो नामुम्किन है

Rovej sheikh

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"शब-ए-इश्क़" सियाही की चादर यूँँ माथे सजा के फ़िज़ा में वो सुर में की रंगत मिला के मुझे यक-ब-यक ऐसा लगता है जैसे ये शब रात की ओर बढ़ने लगी है अभी चाँद ने हल्का घूँघट ढका है अभी तारों को भी नशा सा चढ़ा है अभी तो चराग़ों ने अँगड़ाई ली है अभी तो हवा भी ये शरमाई सी है मगर किस को परवाह इन बातों की है कि सूरज ये डूबे या डूबे ये दुनिया या, साहिल पे लहरें उठें ले के सपने झमाझम सी बारिश में छप छप छपा छप दो आधे बदन टिप टिपा टिप से भीगें या आशिक़ शहर के यूँँ रातों को जागें भले डिजटल पे चाहत खुली बँट रही है हमें क्या पड़ी थी हमें क्या पड़ी है हमें तो इक अरसे से हर शब ही लगती है बस एक जैसी कि जैसे नदी हो कोई कायनाती वो बहती सदी से भला क्यूँँ हम अपने ही वक़्तों में पलटें उन्हीं शामों को फिरसे सोचें भी क्यूँँ हम उन्हीं शामों को फिरसे जीयें भी क्यूँँ हम वो शा में वो शा में कि जिस में ख़ुमारी छुपी थी इक आवारगी की जो लत सी लगी थी कभी इस गली से कभी उस गली तक क़दम बस मिलाकर के राहें भुलाना उसी एक ख़ुश्बू का कस्तूरी बनकर उसे अपना मक्का मदीना बनाना वो मंदिर से गिरजा के रस्ते में उस की इबादत ही जैसे हो क़ायम ज़ेहन में न जाने ये कैसे ख़बर ना हुई के वही ग्रेविटी का जो लैसन पढ़ा था वो बचपन की कॉपी से बाहर निकलकर मेरे उस के अब दरमियाँ आ गया था इक आवारा जो झल्ला फिरता रहा था उसे महँदी की सब दुकानों से ले कर के रेशम गली का पता आ गया था मुहल्ले में उस की झलक के बहाने गुज़रना हर इक शब मिशन जैसे कोई वो पलटे तो लगता था मिल्की गलेक्सी के चेहरे पे आई शिकन जैसे कोई अरे उफ्फो उम्म हम्म ये क्या कर रहा हूँ कहाँ की थीं शा में कहाँ ला रहा हूँ बिना वज्ह बातें हैं जिन के मुआनी भी सूखे पड़े हैं ये तुम को दिखाएँ हर इक दौर में इश्क़ उतना ही मख़सूस उतना ही मुश्किल है तुम को बताएँ कहो सच कहो आजकल कॉफ़ी शॉफ़ी मुहब्बत वोहब्बत क्या चढ़ने लगी है मुझे लग रहा है हाँ मानो न मानो ये शब रात की ओर बढ़ने लगी है

Prashant Beybaar

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पड़ोसी जो घर से अपने चार कदम मैं उस ओर बढ़ाता हूँ, ऐसा लगता है मैं फिरसे घर में ही आ जाता हूँ बेहिचक जो बैठक में अंगड़ाइयां लेता रहता हूँ ख़्वाब जो मेरे तकिए पे थे, यहीं सिरहाने पाता हूँ। उस नीम की मुड़गेली पे बैठ के जो ताश खेला करते थे जहाँ पत्तों के बीच में हम अक्सर लम्हे फेंटा करते थे वो माकूल बाज़ी याद है, जब मेरे दर्द के एक पत्ते को, अपने इक्के से तुम ने जीता था। सिर्फ़ आटा और नमक नहीं, कुछ और भी हम ने बांटा है तेज़ तूफानी बारिश में एक छत जहाँ चूल्हा ठंडा था, और आग पेट में लगी थी वहाँ दोनो ने दाँतों से भूख को कुतर कुतर के खाया था। और वो एक शाम जब रंगीन कीमती काग़ज़ मुझ सेे कुछ रूठ से गए थे तब तुम ने उन्हें बस काग़ज़ समझ, सिरहाने मेरे रक्खा था, भूला नहीं वो रात कि मैं चैन की नींद ख़रीद के लाया था। अब भी उन्हें बस काग़ज़ ही समझते हो क्या, समझते हो तो अच्छा है, क्योंकि सड़क के उस पार सौदागरों का मेला है। अब जो मुन्ना तम्हारा मठरी खाने यहाँ आता है, अच्छा लगता है देख कर कि तंदूर में फ़र्क नहीं कर पाता है। मेरी गुड़िया भी भाभी का हलवा जो बेहतर मीठा है, वही खाती है, लगता है तुम ने बहुत कटोरिया चीनी की घर से माँगी हैं। कैसे तुम पड़ोसी हो, आख़िर कैसे ये मुमकिन हुआ, कि अक्सर चूल्हा भी एक और भूख भी एक जैसी, लगता है कि आग बराबर दोनो घरों में लगी है

Prashant Beybaar

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सुर्ख़ चाँद एक सुर्ख़ चाँद गोद में लिए हुए ईव फ़लक से उतरी है तुम्हारी नज़रों में उस की हिम्मत किरच के जितनी पतली है हर महीने की यही टीस है नहीं कहेगी तुम सेे वो, कि, सह रही है तुम्हारी नस्ल के लिए आने वाली लहराती फ़स्ल के लिए एक चाँद गढ़ा है कोख में वो दर्द समेटे तड़प रही है नब्ज़ फड़कती पेट को था में सुर्ख़ चाँदनी सिमट रही है पूनम से अमावस्या तक कृष्ण पक्ष है अंदर अमावस्या से पूनम तक शुक्ल पक्ष है भीतर शबाब पे होता है तो महीना पूरा होता है लहू बहता है फ़लक से होकर सुर्ख़ चाँदनी सोखती हुई जीती है औरत और ये किरच चुभोता 'क्रेसेंट' कोख में फिर ढलता है पंद्रह दिन तक फिर बढ़ता है पंद्रह दिन तक जैसे आसमाँ में सरकता है चाँद कोई उन मुश्किल के पाँच दिनों में जब चाँद पूरे शबाब पे हो और अगर, कभी जो उस का हौसला कम पड़ जाए वो चुपके से तुम सेे अपनी नज़र छुपाए तो बढ़ा देना हाथ हिम्मत का, साथ का माना कि एक मर्द के लिए मुश्किल है समझ पाना, मगर तुम मत समझना, न ही कोशिश करना उस एहसास को जीने की बस भर देना गरम पानी की बोतल माँ, बहन या कोई और भी हो तो और अगर हो जीवन-संगिनी तो ले जाना उसे गोल-गप्पे खिलाने; रात के डेढ़ बजे, जब उसे चॉकलेट की तलब लगे तो मुस्कुरा कर ला देना फ्रिज से, एक जले गुड़ की ढेली; बाहों का सहारा दे देना, कह देना झूठे को ही, कि मैं हूँ, अपनी हथेली की गर्माहट भी रख दोगे उस के पेट पे अगर, तो वो गहरी नींद सो जाएगी, इसी भरम में कि तुम हो सोचो, कितना अंधा आसमाँ होगा उस का जो हर महीने चाँद की किरच छील छील कर फेंकती रहती है कपड़े में लपेटकर कहीं दूर ग़लती नहीं है उस की, मर्ज़ी भी नहीं है ख़ुदा ने उतारा है फ़लक से उस को एक औरत का जिस्म देकर ताकि तुम्हारी रातें रौशन हों और, तुम हो कि नज़र भी नहीं मिलाते हो कि कहीं ग़लती से भी मुँह से 'पीरियड्स' या 'मासिक-धर्म' जैसा कोई लफ़्ज़ न निकल जाए साफ़ रिश्ते में ख़लल न पड़ जाए मगर जिस के नाम में ही धर्म हो, उस सेे अधर्म जैसा सुलूक क्यूँँ तुम भी तो एडम का हिस्सा हो फिर अकेली ईव को टीस क्यूँँ ।

Prashant Beybaar

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पिया अँखियाँ मिलायीं पिया तू ने जो अँखियाँ मिलायीं मेणु देख भोहें उठायीं तीर नज़रों के तेरे दिल के पार हो गए आर पार हो गए ओ पिया तू जो, ऐसे अड़ा है बट के जैसे खड़ा है मैं तो बन बेल तुझ पे लिपटी बार - बार जाऊँ ओ तू ने नज़रां मिलायीं पिया नज़रां मिलायीं देख तेरी ये ख़ुदाई ले ली रब से लड़ाई बात यहाँ तक आई छोड़ दिया मैं ने उस को नमाज़ियों के लिए,, और सुन तेरी बातें लफ़्ज़ बन तेरे आयत रूह के पार हो गए ओ तू ने नज़रां मिलायीं सजना नज़रां मिलायीं पिया नज़रां मिलायीं जानाँ, नज़रां मिलायीं

Prashant Beybaar

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वो फ़िल्म कैसे मुमकिन हो जाता है एक ही वक़्त में, दो-दो जगह एक इंसान का होना मैं ने देखा था उस शब जब ट्यूशन के बा'द तुम ने आनन-फ़ानन में खींच के मेरा हाथ बिठाया था उस मोटी पर्दे के सामने जिस पर चल रही थी वो फ़िल्म ; एक ही वक़्त में मैं यहाँ भी था, और वहाँ भी तुम पर्दे पे भी थीं और मेरे नज़दीक भी एक अंशुमन हमारे बीच में भी था फ़िल्म दिख रही थी पर्दे पर मगर चल रही थी हमारे भीतर एक एक पल में सदियाँ तय करती हुई फ़िल्म आख़िरी शॉट में जो थोड़ा बहुत कहा उस हीरोईन ने फ़िल्म के बा'द तुम्हारी आँखों ने सब पूरी तरह कह दिया कैसे मुमकिन हुआ कि, हर शय हर डायलोग इतना ज़रूरी था वरना हम कभी समझ नहीं पाते कि हम क्या चाहते हैं.

Prashant Beybaar

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