पिया अँखियाँ मिलायीं पिया तू ने जो अँखियाँ मिलायीं मेणु देख भोहें उठायीं तीर नज़रों के तेरे दिल के पार हो गए आर पार हो गए ओ पिया तू जो, ऐसे अड़ा है बट के जैसे खड़ा है मैं तो बन बेल तुझ पे लिपटी बार - बार जाऊँ ओ तू ने नज़रां मिलायीं पिया नज़रां मिलायीं देख तेरी ये ख़ुदाई ले ली रब से लड़ाई बात यहाँ तक आई छोड़ दिया मैं ने उस को नमाज़ियों के लिए,, और सुन तेरी बातें लफ़्ज़ बन तेरे आयत रूह के पार हो गए ओ तू ने नज़रां मिलायीं सजना नज़रां मिलायीं पिया नज़रां मिलायीं जानाँ, नज़रां मिलायीं
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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"यार" यार था मैं तुम्हारा या महज़ कोई सीढ़ी मंज़िल तक पहूँच गए, पीछे देखा तक नहीं जो सीख किसी ने नहीं वो सीख पेड़ों ने दी छाओं लेते रहे मगर तुम्हारी आरी रुकी नहीं बचपन में खेला करते साथ हम साँप सीढ़ी उतरा ये ज़िंदगी में कब, भनक तक लगी नहीं सपने भी साथ बुने थे बहुत उमीदें भी थी कई बादलों की सैर पर निकल गए तुम, पर मैं नहीं अगर रुकसत की होती ख़बर ज़रा सी भी तब माँ से दो रोटी ज़्यादा, बनवाता नहीं ‘अर्पित’ मैं ने घूम फिर कर यही बात है मानी कई मिलेंगे इन के जैसे, ये ज़ालिम अकेले नहीं
Arpit Sharma
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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"हौसला" हौसला रख रास्ते दिखने लगेंगे ये अँधेरे सुब्ह तक छटने लगेंगे क़ाफ़िले पर क़ाफ़िले गुज़रे यहाँ से देखना कुछ नक़्श-ए-पा आगे मिलेंगे लड़-खड़ाते हौसलों को फिर उठा कर सुब्ह होते ही सफ़र पर चल पड़ेंगे ठोकरों से कह दो के दम-ख़म लगा दें हम गिरेंगे फिर उठेंगे पर चलेंगे
MAHESH CHAUHAN NARNAULI
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"नज़्म क्या है" शा'इरी की दो सिंफ़ें हैं नज़्म-ओ-ग़ज़ल उर्दू में इन की शोहरत है बच्चो अटल नज़्म पाबंद है नज़्म आज़ाद भी ये कभी नस्र है और मुअर्रा कभी नज़्म-ए-पाबंद में वज़्न होगा म्याँ और आज़ाद में भी है इस का निशाँ नज़्म-ए-पाबंद का तर्ज़ है जो लतीफ़ इस में पाओगे तुम क़ाफ़िया-ओ-रदीफ़ नसरी नज़्मों में बस नस्र ही नस्र है वज़्न और क़ाफ़िया है न ही बहर है वज़्न और क़ाफ़िए जिन को मुश्किल हुए नसरी नज़्में उमूमन वो कहते लगे वज़्न नज़्म-ए-मुअर्रा में है दोस्तो इस को तुम बे-रदीफ़-ओ-क़वाफ़ी कहो मसनवी हो क़सीदा हो या मर्सिया नज़्म का मिलता है बच्चो हम को पता नज़्म में सिलसिला है ख़यालात का एक दरिया सा है देखो जज़्बात का वो मुख़म्मस हो या हो मुसद्दस कोई ये भी इक शक्ल है नज़्म-ए-पाबंद की वो ग़ज़ल हो कि हो नज़्म बच्चो सुनो दोनों यकसाँ हैं शोहरत में बस जान लो 'जोश' की नज़्में मशहूर हैं हर जगह हैं ग़ज़ल के 'जिगर' वाक़ई बादशह नज़्म में जो कहानी कही जाएगी शौक़ से ऐ मियाँ वो सुनी जाएगी नज़्में सीमाब-ओ-इक़बाल ने भी लिखीं जो निहायत ही मशहूर साबित हुईं करता हूँ बच्चों के वास्ते मैं दुआ नज़्में बच्चों की लिखता हूँ 'हाफ़िज़' सदा
Amjad Husain Hafiz Karnataki
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पड़ोसी जो घर से अपने चार कदम मैं उस ओर बढ़ाता हूँ, ऐसा लगता है मैं फिरसे घर में ही आ जाता हूँ बेहिचक जो बैठक में अंगड़ाइयां लेता रहता हूँ ख़्वाब जो मेरे तकिए पे थे, यहीं सिरहाने पाता हूँ। उस नीम की मुड़गेली पे बैठ के जो ताश खेला करते थे जहाँ पत्तों के बीच में हम अक्सर लम्हे फेंटा करते थे वो माकूल बाज़ी याद है, जब मेरे दर्द के एक पत्ते को, अपने इक्के से तुम ने जीता था। सिर्फ़ आटा और नमक नहीं, कुछ और भी हम ने बांटा है तेज़ तूफानी बारिश में एक छत जहाँ चूल्हा ठंडा था, और आग पेट में लगी थी वहाँ दोनो ने दाँतों से भूख को कुतर कुतर के खाया था। और वो एक शाम जब रंगीन कीमती काग़ज़ मुझ सेे कुछ रूठ से गए थे तब तुम ने उन्हें बस काग़ज़ समझ, सिरहाने मेरे रक्खा था, भूला नहीं वो रात कि मैं चैन की नींद ख़रीद के लाया था। अब भी उन्हें बस काग़ज़ ही समझते हो क्या, समझते हो तो अच्छा है, क्योंकि सड़क के उस पार सौदागरों का मेला है। अब जो मुन्ना तम्हारा मठरी खाने यहाँ आता है, अच्छा लगता है देख कर कि तंदूर में फ़र्क नहीं कर पाता है। मेरी गुड़िया भी भाभी का हलवा जो बेहतर मीठा है, वही खाती है, लगता है तुम ने बहुत कटोरिया चीनी की घर से माँगी हैं। कैसे तुम पड़ोसी हो, आख़िर कैसे ये मुमकिन हुआ, कि अक्सर चूल्हा भी एक और भूख भी एक जैसी, लगता है कि आग बराबर दोनो घरों में लगी है
Prashant Beybaar
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"शब-ए-इश्क़" सियाही की चादर यूँँ माथे सजा के फ़िज़ा में वो सुर में की रंगत मिला के मुझे यक-ब-यक ऐसा लगता है जैसे ये शब रात की ओर बढ़ने लगी है अभी चाँद ने हल्का घूँघट ढका है अभी तारों को भी नशा सा चढ़ा है अभी तो चराग़ों ने अँगड़ाई ली है अभी तो हवा भी ये शरमाई सी है मगर किस को परवाह इन बातों की है कि सूरज ये डूबे या डूबे ये दुनिया या, साहिल पे लहरें उठें ले के सपने झमाझम सी बारिश में छप छप छपा छप दो आधे बदन टिप टिपा टिप से भीगें या आशिक़ शहर के यूँँ रातों को जागें भले डिजटल पे चाहत खुली बँट रही है हमें क्या पड़ी थी हमें क्या पड़ी है हमें तो इक अरसे से हर शब ही लगती है बस एक जैसी कि जैसे नदी हो कोई कायनाती वो बहती सदी से भला क्यूँँ हम अपने ही वक़्तों में पलटें उन्हीं शामों को फिरसे सोचें भी क्यूँँ हम उन्हीं शामों को फिरसे जीयें भी क्यूँँ हम वो शा में वो शा में कि जिस में ख़ुमारी छुपी थी इक आवारगी की जो लत सी लगी थी कभी इस गली से कभी उस गली तक क़दम बस मिलाकर के राहें भुलाना उसी एक ख़ुश्बू का कस्तूरी बनकर उसे अपना मक्का मदीना बनाना वो मंदिर से गिरजा के रस्ते में उस की इबादत ही जैसे हो क़ायम ज़ेहन में न जाने ये कैसे ख़बर ना हुई के वही ग्रेविटी का जो लैसन पढ़ा था वो बचपन की कॉपी से बाहर निकलकर मेरे उस के अब दरमियाँ आ गया था इक आवारा जो झल्ला फिरता रहा था उसे महँदी की सब दुकानों से ले कर के रेशम गली का पता आ गया था मुहल्ले में उस की झलक के बहाने गुज़रना हर इक शब मिशन जैसे कोई वो पलटे तो लगता था मिल्की गलेक्सी के चेहरे पे आई शिकन जैसे कोई अरे उफ्फो उम्म हम्म ये क्या कर रहा हूँ कहाँ की थीं शा में कहाँ ला रहा हूँ बिना वज्ह बातें हैं जिन के मुआनी भी सूखे पड़े हैं ये तुम को दिखाएँ हर इक दौर में इश्क़ उतना ही मख़सूस उतना ही मुश्किल है तुम को बताएँ कहो सच कहो आजकल कॉफ़ी शॉफ़ी मुहब्बत वोहब्बत क्या चढ़ने लगी है मुझे लग रहा है हाँ मानो न मानो ये शब रात की ओर बढ़ने लगी है
Prashant Beybaar
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वो फ़िल्म कैसे मुमकिन हो जाता है एक ही वक़्त में, दो-दो जगह एक इंसान का होना मैं ने देखा था उस शब जब ट्यूशन के बा'द तुम ने आनन-फ़ानन में खींच के मेरा हाथ बिठाया था उस मोटी पर्दे के सामने जिस पर चल रही थी वो फ़िल्म ; एक ही वक़्त में मैं यहाँ भी था, और वहाँ भी तुम पर्दे पे भी थीं और मेरे नज़दीक भी एक अंशुमन हमारे बीच में भी था फ़िल्म दिख रही थी पर्दे पर मगर चल रही थी हमारे भीतर एक एक पल में सदियाँ तय करती हुई फ़िल्म आख़िरी शॉट में जो थोड़ा बहुत कहा उस हीरोईन ने फ़िल्म के बा'द तुम्हारी आँखों ने सब पूरी तरह कह दिया कैसे मुमकिन हुआ कि, हर शय हर डायलोग इतना ज़रूरी था वरना हम कभी समझ नहीं पाते कि हम क्या चाहते हैं.
Prashant Beybaar
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रीडिंग फ़ॉर ए ब्लाईंड चाइल्ड इन घुप्प अँधेरी गलियों में रौशन सी सदायें बहने दो बस आवाज़ों की उँगली पकड़ मुझे इस जंगल में रहने दो शे'रू कैसे दहाड़ा, झरना क्या बोला चाँद ने फिर क्या नाक सिकोड़ी ; ख़ामोश नज़ारे हैं ये सब पलकों पे उजाले दुखते हैं, 'फूल' पढ़ूँ गर ब्रेल में तो वो पोटुओं में चुभते हैं तुम आँखों पे आवाज़ें रख दो फिर पुस्तक को कहने दो इन घुप्प अँधेरी गलियों में रौशन सी सदायें बहने दो ।
Prashant Beybaar
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ज़रा ठहर के आना जो इक वा'दा था तुम सेे, फ़िज़ा में खिलखिलाने का कहकशाँ में डूब जाने का जूड़े में तुम्हारे चाँद टिकाने का उगते सूरज को सीने से लगाने का जानाँ इस ख़्वाहिश में, थोड़ा वक़्त लगेगा गुमाँ की आज़माइश में थोड़ा वक़्त लगेगा कि ये दुनियाए ये मंज़र, ये शहरों में बंजर अभी महफूज़ नहीं हसीं ख़्वाबों के लिए किए सड़क पे ख़ून के थक्के अभी सूखे नहीं हैं सरिया लिए हाथ अब किताबों के भूखे नहीं हैं मज़हबी टुकड़े पे पलते सायों को अभी मुल्क में 'टुकड़े-टुकड़े' चलाने से फ़ुर्सत नहीं है कि अभी तो नस्ल को साबित है करना रहने को ज़िंदा अब ज़रूरी है डरना कि कानून के मानी अभी बदल रहे हैं हुक्मरां को इंक़लाबी अभी खल रहे हैं मुझे मालूम है बड़ा मन था तुम्हारा, जाड़े में, कुल्फ़ी का लुत्फ़ उठाने का वादी में, कहवा के दो कप लड़ाने का लालकिले पे बाँह फैलाने का, और श्डलश् की झरझर में डूब जाने का मगर जानांए अभी यहाँ, तेल की खदानों पे मिसाइलों के घेरे हैं बड़े काले से रोज़ यहाँ उठते सवेरे हैं कुछ अंदर के कीड़े सरहद कुतर रहे हैं बड़े-बड़े चेहरों के चेहरे अभी उतर रहे हैं और वो जो वा'दा था तुम सेे कि, तुम्हारी हथेली पे अपनी उँगली उगाकर तुम्हारे बालों में ग़ुलाबी से फूल सजाकर चलेंगे किनारे से मीलों के फ़ेरे देखेंगे तोता-ओ-मैना-ओ-बटेरे इन बातों की सूरत अभी मुमकिन नहीं है जीना न पूछो, हाँ मरना मुश्किल नहीं है अभी स्कैण्डल में साँसों की इक चीख़ दबी है उस लड़की की कैंडल-मार्च अभी रुकी नहीं है अभी आब-ओ-दाने के भाव बहुत हैं ढकी.ओढ़ी इस जनता के घाव बहुत हैं कि अभी सरज़मीं पे शो'ले भभक रहे हैं वर्दी से ख़ून के कतरे अभी टपक रहे हैं वो रातों का वा'दा, वो बुलाती सदायें खिड़की पे तुम्हारी, मल्हार गाती हवाएँ अभी इन बातों में थोड़ा सा वक़्त लगेगा अच्छे दिन का वो वा'दा ज़रा लंबा चलेगा जज साहब ये बोले की मुश्किल घड़ी है कुछ ज़ुल्मी सिफ़त, कुछ सियासी कड़ी है अभी कुफ़लों में क़ैद हैं लफ़्ज़ हमारे मिटाने को अक्स, हो रहे हैं इशारे वो इंसानियत की उसूलों-निगारी अभी मुमकिन नहीं, अभी मुमकिन नहीं सुनो तुम जानांए वो सारे ख़्वाब छुपाना ज़र्रे ज़र्रे को सारी ये बातें बताना हो सके तो अभी, ज़रा ठहर के आना हो सके तो अभी, ज़रा ठहर के आना
Prashant Beybaar
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