nazmKuch Alfaaz

ज़रा ठहर के आना जो इक वा'दा था तुम सेे, फ़िज़ा में खिलखिलाने का कहकशाँ में डूब जाने का जूड़े में तुम्हारे चाँद टिकाने का उगते सूरज को सीने से लगाने का जानाँ इस ख़्वाहिश में, थोड़ा वक़्त लगेगा गुमाँ की आज़माइश में थोड़ा वक़्त लगेगा कि ये दुनियाए ये मंज़र, ये शहरों में बंजर अभी महफूज़ नहीं हसीं ख़्वाबों के लिए किए सड़क पे ख़ून के थक्के अभी सूखे नहीं हैं सरिया लिए हाथ अब किताबों के भूखे नहीं हैं मज़हबी टुकड़े पे पलते सायों को अभी मुल्क में 'टुकड़े-टुकड़े' चलाने से फ़ुर्सत नहीं है कि अभी तो नस्ल को साबित है करना रहने को ज़िंदा अब ज़रूरी है डरना कि कानून के मानी अभी बदल रहे हैं हुक्मरां को इंक़लाबी अभी खल रहे हैं मुझे मालूम है बड़ा मन था तुम्हारा, जाड़े में, कुल्फ़ी का लुत्फ़ उठाने का वादी में, कहवा के दो कप लड़ाने का लालकिले पे बाँह फैलाने का, और श्डलश् की झरझर में डूब जाने का मगर जानांए अभी यहाँ, तेल की खदानों पे मिसाइलों के घेरे हैं बड़े काले से रोज़ यहाँ उठते सवेरे हैं कुछ अंदर के कीड़े सरहद कुतर रहे हैं बड़े-बड़े चेहरों के चेहरे अभी उतर रहे हैं और वो जो वा'दा था तुम सेे कि, तुम्हारी हथेली पे अपनी उँगली उगाकर तुम्हारे बालों में ग़ुलाबी से फूल सजाकर चलेंगे किनारे से मीलों के फ़ेरे देखेंगे तोता-ओ-मैना-ओ-बटेरे इन बातों की सूरत अभी मुमकिन नहीं है जीना न पूछो, हाँ मरना मुश्किल नहीं है अभी स्कैण्डल में साँसों की इक चीख़ दबी है उस लड़की की कैंडल-मार्च अभी रुकी नहीं है अभी आब-ओ-दाने के भाव बहुत हैं ढकी.ओढ़ी इस जनता के घाव बहुत हैं कि अभी सरज़मीं पे शो'ले भभक रहे हैं वर्दी से ख़ून के कतरे अभी टपक रहे हैं वो रातों का वा'दा, वो बुलाती सदायें खिड़की पे तुम्हारी, मल्हार गाती हवाएँ अभी इन बातों में थोड़ा सा वक़्त लगेगा अच्छे दिन का वो वा'दा ज़रा लंबा चलेगा जज साहब ये बोले की मुश्किल घड़ी है कुछ ज़ुल्मी सिफ़त, कुछ सियासी कड़ी है अभी कुफ़लों में क़ैद हैं लफ़्ज़ हमारे मिटाने को अक्स, हो रहे हैं इशारे वो इंसानियत की उसूलों-निगारी अभी मुमकिन नहीं, अभी मुमकिन नहीं सुनो तुम जानांए वो सारे ख़्वाब छुपाना ज़र्रे ज़र्रे को सारी ये बातें बताना हो सके तो अभी, ज़रा ठहर के आना हो सके तो अभी, ज़रा ठहर के आना

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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"मरियम" मैं आईनों से गुरेज़ करते हुए पहाड़ों की कोख में साँस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूँ तो सोचता हूँ कि मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम तुम्हारी बे-साख़्ता मोहब्बत ज़मीं पे फैले हुए समुंदर की वुसअतों से भी मावरा है मोहब्बतों के समंदरों में बस एक बहिरा-ए-हिज्र है जो बुरा है मरियम ख़ला-नवर्दों को जो सितारे मुआवज़े में मिले थे वो उन की रौशनी में ये सोचते हैं कि वक़्त ही तो ख़ुदा है मरियम और इस तअल्लुक़ की गठरियों में रुकी हुई सआतों से हटकर मेरे लिए और क्या है मरियम अभी बहुत वक़्त है कि हम वक़्त दे ज़रा इक दूसरे को मगर हम इक साथ रह कर भी ख़ुश न रह सके तो मुआ'फ़ करना कि मैं ने बचपन ही दुख की दहलीज़ पर गुज़ारा मैं उन चराग़ों का दुख हूँ जिन की लवे शब-ए-इंतज़ार में बुझ गई मगर उन सेे उठने वाला धुआँ ज़मान-ओ-मकाँ में फैला हुआ है अब तक मैं कोहसारों और उन के जिस्मों से बहने वाली उन आबशारों का दुख हूँ जिन को ज़मीं के चेहरों पर रेंगते रेंगते ज़माने गुज़र गए हैं जो लोग दिल से उतर गए हैं किताबें आँखों पे रख के सोए थे मर गए हैं मैं उन का दुख हूँ जो जिस्म ख़ुद-लज़्जती से उकता के आईनों की तसल्लिओं में पले बढ़े हैं मैं उन का दुख हूँ मैं घर से भागे हुओ का दुख हूँ मैं रात जागे हुओ का दुख हूँ मैं साहिलों से बँधी हुई कश्तियों का दुख हूँ मैं लापता लड़कियों का दुख हूँ खुली हुए खिड़कियों का दुख हूँ मिटी हुई तख़्तियों का दुख हूँ थके हुए बादलों का दुख हूँ जले हुए जंगलों का दुख हूँ जो खुल कर बरसी नहीं है, मैं उस घटा का दुख हूँ ज़मीं का दुख हूँ ख़ुदा का दुख हूँ बला का दुख हूँ जो शाख सावन में फूटती है वो शाख तुम हो जो पींग बारिश के बा'द बन बन के टूटती है वो पींग तुम हो तुम्हारे होंठों से सआतों ने समाअतों का सबक़ लिया है तुम्हारी ही शाख-ए-संदली से समंदरों ने नमक लिया है तुम्हारा मेरा मुआमला ही जुदा है मरियम तुम्हें तो सब कुछ पता है मरियम

Tehzeeb Hafi

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"शब-ए-इश्क़" सियाही की चादर यूँँ माथे सजा के फ़िज़ा में वो सुर में की रंगत मिला के मुझे यक-ब-यक ऐसा लगता है जैसे ये शब रात की ओर बढ़ने लगी है अभी चाँद ने हल्का घूँघट ढका है अभी तारों को भी नशा सा चढ़ा है अभी तो चराग़ों ने अँगड़ाई ली है अभी तो हवा भी ये शरमाई सी है मगर किस को परवाह इन बातों की है कि सूरज ये डूबे या डूबे ये दुनिया या, साहिल पे लहरें उठें ले के सपने झमाझम सी बारिश में छप छप छपा छप दो आधे बदन टिप टिपा टिप से भीगें या आशिक़ शहर के यूँँ रातों को जागें भले डिजटल पे चाहत खुली बँट रही है हमें क्या पड़ी थी हमें क्या पड़ी है हमें तो इक अरसे से हर शब ही लगती है बस एक जैसी कि जैसे नदी हो कोई कायनाती वो बहती सदी से भला क्यूँँ हम अपने ही वक़्तों में पलटें उन्हीं शामों को फिरसे सोचें भी क्यूँँ हम उन्हीं शामों को फिरसे जीयें भी क्यूँँ हम वो शा में वो शा में कि जिस में ख़ुमारी छुपी थी इक आवारगी की जो लत सी लगी थी कभी इस गली से कभी उस गली तक क़दम बस मिलाकर के राहें भुलाना उसी एक ख़ुश्बू का कस्तूरी बनकर उसे अपना मक्का मदीना बनाना वो मंदिर से गिरजा के रस्ते में उस की इबादत ही जैसे हो क़ायम ज़ेहन में न जाने ये कैसे ख़बर ना हुई के वही ग्रेविटी का जो लैसन पढ़ा था वो बचपन की कॉपी से बाहर निकलकर मेरे उस के अब दरमियाँ आ गया था इक आवारा जो झल्ला फिरता रहा था उसे महँदी की सब दुकानों से ले कर के रेशम गली का पता आ गया था मुहल्ले में उस की झलक के बहाने गुज़रना हर इक शब मिशन जैसे कोई वो पलटे तो लगता था मिल्की गलेक्सी के चेहरे पे आई शिकन जैसे कोई अरे उफ्फो उम्म हम्म ये क्या कर रहा हूँ कहाँ की थीं शा में कहाँ ला रहा हूँ बिना वज्ह बातें हैं जिन के मुआनी भी सूखे पड़े हैं ये तुम को दिखाएँ हर इक दौर में इश्क़ उतना ही मख़सूस उतना ही मुश्किल है तुम को बताएँ कहो सच कहो आजकल कॉफ़ी शॉफ़ी मुहब्बत वोहब्बत क्या चढ़ने लगी है मुझे लग रहा है हाँ मानो न मानो ये शब रात की ओर बढ़ने लगी है

Prashant Beybaar

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पड़ोसी जो घर से अपने चार कदम मैं उस ओर बढ़ाता हूँ, ऐसा लगता है मैं फिरसे घर में ही आ जाता हूँ बेहिचक जो बैठक में अंगड़ाइयां लेता रहता हूँ ख़्वाब जो मेरे तकिए पे थे, यहीं सिरहाने पाता हूँ। उस नीम की मुड़गेली पे बैठ के जो ताश खेला करते थे जहाँ पत्तों के बीच में हम अक्सर लम्हे फेंटा करते थे वो माकूल बाज़ी याद है, जब मेरे दर्द के एक पत्ते को, अपने इक्के से तुम ने जीता था। सिर्फ़ आटा और नमक नहीं, कुछ और भी हम ने बांटा है तेज़ तूफानी बारिश में एक छत जहाँ चूल्हा ठंडा था, और आग पेट में लगी थी वहाँ दोनो ने दाँतों से भूख को कुतर कुतर के खाया था। और वो एक शाम जब रंगीन कीमती काग़ज़ मुझ सेे कुछ रूठ से गए थे तब तुम ने उन्हें बस काग़ज़ समझ, सिरहाने मेरे रक्खा था, भूला नहीं वो रात कि मैं चैन की नींद ख़रीद के लाया था। अब भी उन्हें बस काग़ज़ ही समझते हो क्या, समझते हो तो अच्छा है, क्योंकि सड़क के उस पार सौदागरों का मेला है। अब जो मुन्ना तम्हारा मठरी खाने यहाँ आता है, अच्छा लगता है देख कर कि तंदूर में फ़र्क नहीं कर पाता है। मेरी गुड़िया भी भाभी का हलवा जो बेहतर मीठा है, वही खाती है, लगता है तुम ने बहुत कटोरिया चीनी की घर से माँगी हैं। कैसे तुम पड़ोसी हो, आख़िर कैसे ये मुमकिन हुआ, कि अक्सर चूल्हा भी एक और भूख भी एक जैसी, लगता है कि आग बराबर दोनो घरों में लगी है

Prashant Beybaar

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पिया अँखियाँ मिलायीं पिया तू ने जो अँखियाँ मिलायीं मेणु देख भोहें उठायीं तीर नज़रों के तेरे दिल के पार हो गए आर पार हो गए ओ पिया तू जो, ऐसे अड़ा है बट के जैसे खड़ा है मैं तो बन बेल तुझ पे लिपटी बार - बार जाऊँ ओ तू ने नज़रां मिलायीं पिया नज़रां मिलायीं देख तेरी ये ख़ुदाई ले ली रब से लड़ाई बात यहाँ तक आई छोड़ दिया मैं ने उस को नमाज़ियों के लिए,, और सुन तेरी बातें लफ़्ज़ बन तेरे आयत रूह के पार हो गए ओ तू ने नज़रां मिलायीं सजना नज़रां मिलायीं पिया नज़रां मिलायीं जानाँ, नज़रां मिलायीं

Prashant Beybaar

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सुर्ख़ चाँद एक सुर्ख़ चाँद गोद में लिए हुए ईव फ़लक से उतरी है तुम्हारी नज़रों में उस की हिम्मत किरच के जितनी पतली है हर महीने की यही टीस है नहीं कहेगी तुम सेे वो, कि, सह रही है तुम्हारी नस्ल के लिए आने वाली लहराती फ़स्ल के लिए एक चाँद गढ़ा है कोख में वो दर्द समेटे तड़प रही है नब्ज़ फड़कती पेट को था में सुर्ख़ चाँदनी सिमट रही है पूनम से अमावस्या तक कृष्ण पक्ष है अंदर अमावस्या से पूनम तक शुक्ल पक्ष है भीतर शबाब पे होता है तो महीना पूरा होता है लहू बहता है फ़लक से होकर सुर्ख़ चाँदनी सोखती हुई जीती है औरत और ये किरच चुभोता 'क्रेसेंट' कोख में फिर ढलता है पंद्रह दिन तक फिर बढ़ता है पंद्रह दिन तक जैसे आसमाँ में सरकता है चाँद कोई उन मुश्किल के पाँच दिनों में जब चाँद पूरे शबाब पे हो और अगर, कभी जो उस का हौसला कम पड़ जाए वो चुपके से तुम सेे अपनी नज़र छुपाए तो बढ़ा देना हाथ हिम्मत का, साथ का माना कि एक मर्द के लिए मुश्किल है समझ पाना, मगर तुम मत समझना, न ही कोशिश करना उस एहसास को जीने की बस भर देना गरम पानी की बोतल माँ, बहन या कोई और भी हो तो और अगर हो जीवन-संगिनी तो ले जाना उसे गोल-गप्पे खिलाने; रात के डेढ़ बजे, जब उसे चॉकलेट की तलब लगे तो मुस्कुरा कर ला देना फ्रिज से, एक जले गुड़ की ढेली; बाहों का सहारा दे देना, कह देना झूठे को ही, कि मैं हूँ, अपनी हथेली की गर्माहट भी रख दोगे उस के पेट पे अगर, तो वो गहरी नींद सो जाएगी, इसी भरम में कि तुम हो सोचो, कितना अंधा आसमाँ होगा उस का जो हर महीने चाँद की किरच छील छील कर फेंकती रहती है कपड़े में लपेटकर कहीं दूर ग़लती नहीं है उस की, मर्ज़ी भी नहीं है ख़ुदा ने उतारा है फ़लक से उस को एक औरत का जिस्म देकर ताकि तुम्हारी रातें रौशन हों और, तुम हो कि नज़र भी नहीं मिलाते हो कि कहीं ग़लती से भी मुँह से 'पीरियड्स' या 'मासिक-धर्म' जैसा कोई लफ़्ज़ न निकल जाए साफ़ रिश्ते में ख़लल न पड़ जाए मगर जिस के नाम में ही धर्म हो, उस सेे अधर्म जैसा सुलूक क्यूँँ तुम भी तो एडम का हिस्सा हो फिर अकेली ईव को टीस क्यूँँ ।

Prashant Beybaar

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रीडिंग फ़ॉर ए ब्लाईंड चाइल्ड इन घुप्प अँधेरी गलियों में रौशन सी सदायें बहने दो बस आवाज़ों की उँगली पकड़ मुझे इस जंगल में रहने दो शे'रू कैसे दहाड़ा, झरना क्या बोला चाँद ने फिर क्या नाक सिकोड़ी ; ख़ामोश नज़ारे हैं ये सब पलकों पे उजाले दुखते हैं, 'फूल' पढ़ूँ गर ब्रेल में तो वो पोटुओं में चुभते हैं तुम आँखों पे आवाज़ें रख दो फिर पुस्तक को कहने दो इन घुप्प अँधेरी गलियों में रौशन सी सदायें बहने दो ।

Prashant Beybaar

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