nazmKuch Alfaaz

"शब-ए-इश्क़" सियाही की चादर यूँँ माथे सजा के फ़िज़ा में वो सुर में की रंगत मिला के मुझे यक-ब-यक ऐसा लगता है जैसे ये शब रात की ओर बढ़ने लगी है अभी चाँद ने हल्का घूँघट ढका है अभी तारों को भी नशा सा चढ़ा है अभी तो चराग़ों ने अँगड़ाई ली है अभी तो हवा भी ये शरमाई सी है मगर किस को परवाह इन बातों की है कि सूरज ये डूबे या डूबे ये दुनिया या, साहिल पे लहरें उठें ले के सपने झमाझम सी बारिश में छप छप छपा छप दो आधे बदन टिप टिपा टिप से भीगें या आशिक़ शहर के यूँँ रातों को जागें भले डिजटल पे चाहत खुली बँट रही है हमें क्या पड़ी थी हमें क्या पड़ी है हमें तो इक अरसे से हर शब ही लगती है बस एक जैसी कि जैसे नदी हो कोई कायनाती वो बहती सदी से भला क्यूँँ हम अपने ही वक़्तों में पलटें उन्हीं शामों को फिरसे सोचें भी क्यूँँ हम उन्हीं शामों को फिरसे जीयें भी क्यूँँ हम वो शा में वो शा में कि जिस में ख़ुमारी छुपी थी इक आवारगी की जो लत सी लगी थी कभी इस गली से कभी उस गली तक क़दम बस मिलाकर के राहें भुलाना उसी एक ख़ुश्बू का कस्तूरी बनकर उसे अपना मक्का मदीना बनाना वो मंदिर से गिरजा के रस्ते में उस की इबादत ही जैसे हो क़ायम ज़ेहन में न जाने ये कैसे ख़बर ना हुई के वही ग्रेविटी का जो लैसन पढ़ा था वो बचपन की कॉपी से बाहर निकलकर मेरे उस के अब दरमियाँ आ गया था इक आवारा जो झल्ला फिरता रहा था उसे महँदी की सब दुकानों से ले कर के रेशम गली का पता आ गया था मुहल्ले में उस की झलक के बहाने गुज़रना हर इक शब मिशन जैसे कोई वो पलटे तो लगता था मिल्की गलेक्सी के चेहरे पे आई शिकन जैसे कोई अरे उफ्फो उम्म हम्म ये क्या कर रहा हूँ कहाँ की थीं शा में कहाँ ला रहा हूँ बिना वज्ह बातें हैं जिन के मुआनी भी सूखे पड़े हैं ये तुम को दिखाएँ हर इक दौर में इश्क़ उतना ही मख़सूस उतना ही मुश्किल है तुम को बताएँ कहो सच कहो आजकल कॉफ़ी शॉफ़ी मुहब्बत वोहब्बत क्या चढ़ने लगी है मुझे लग रहा है हाँ मानो न मानो ये शब रात की ओर बढ़ने लगी है

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तुम हमारे लिए तुम हमारे लिए अर्चना बन गई हम तुम्हारे लिए एक दर्पण प्रिये तुम मिलो तो सही हाल पूछो मेरा हम न रो दें तो कह देना पत्थर प्रिये प्यार मिलना नहीं था अगर भाग्य में देवताओं ने हम सेे ये छल क्यूँ किया मेरे दिल में भरी रेत ही रेत थी दे के अमृत ये हम को विकल क्यूँ किया अप्सरा हो तो हो पर हमारे लिए तुम ही सुंदर सुकोमल सुघर हो प्रिये देवताओं के गणितीय संसार में ऐसा भी है नहीं कोई अच्छा न था हम अगर इस जनम भी नहीं मिल सके सब कहेंगे यही प्यार सच्चा न था कायरों को कभी प्यार मिलता नहीं फ़ैसला कोई ले लो कि डटकर प्रिये मम्मी कहती थीं चंदा बहुत दूर है चाँद से आगे हम को सितारा लगा यूँँ तो चेहरे ही चेहरे थे दुनिया में पर एक तेरा ही चेहरा पियारा लगा पलकों पे मेरी रख कर क़दम तुम चलो पॉंव में चुभ न जाए कि कंकड़ प्रिये

Rakesh Mahadiuree

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"एक बात'" क्या तुम्हें भी सिखा दूँ वो हुनर जिस सेे पढ़ लिया करता हूँ तुम्हारी आँखों को उन सब बातों को जो दबी रहती हैं तुम्हारी पलकों की क़तारों में तब भी, जब लब ख़ामोश होते हैं तुम्हारे या तब, जब बस यूँँ ही मुस्कुरा देती हो मुझ सेे बात करते-करते और तब, जब होंठ तुम्हारे कुछ और ही कहते हैं और कहते कहते रुक जाया करते हैं एक बात नहीं बताई तुम्हें के तब मैं चुपके से पढ़ लिया करता हूँ तुम्हारी आँखों को पूछ लेता हूँ हाल तुम्हारा कहता कुछ नहीं हाँ, आँखें बात करती हैं मेरी भी हज़ारों सवालात भी तुम्हारी ही तरह फिर क्यूँँ जवाब नहीं दे पातीं तुम्हारी आँखें क्या तुम्हें भी सिखा दूँ वो हुनर जिस सेे पढ़ लिया करता हूँ तुम्हारी आँखों को कि तुम भी पढ़ लो वो बातें जिन में होंठ ख़ामोश रहते हैं और वो सारी बातें जो अब तक नहीं कही तुम सेे या मुझे भी सिखा दो अपना आँखों से झूठ बोलने का हुनर

Saurabh Mehta 'Alfaaz'

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“ख़ुदा अब मुझे चैन मिलता नहीं है” न आराम अब मुझ को इक पल भी यारों मुझे याद आया था वो कल भी यारों वो यारों मेरे साथ क्यूँँ कर गया ये कोई तो दवा हो जो आराम दे दे मैं दफ़्तर के पहिये में पिसने लगा हूँ हैं हाथों में पत्थर मैं ख़ुद आइना हूँ वो तारों से आगे मैं धरती के अंदर बना है वो पागल जो कल था सिकंदर वो कल था जहाँ पर वो अब भी वहीं है ख़ुदा अब मुझे चैन मिलता नहीं है मैं बरसों से दर दर भटकता रहा हूँ मैं बेचैन भी हूँ मैं बे-आसरा हूँ नए ज़ख़्म फिर से है लाई मोहब्बत कि जब से हुई है परायी मोहब्बत मोहब्बत का मुझ को सिला ये मिला है दिवानों का अब साथ में क़ाफ़िला है सुकूँ ढूँढ़ते ढूँढ़ते थक गया हूँ मैं दुनिया से आगे फ़लक तक गया हूँ ये दिल है कहीं और धड़कन कहीं है ख़ुदा अब मुझे चैन मिलता नहीं है

Amaan Pathan

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"लव ट्राईऐंगल" जब ख़यालों में मैं उस के पीछे पीछे जाता भाव खाती देखो फिर मैं उस सेे रुठ जाता ऐसे वैसे कैसे कैसे मुझ को वो मनाती जान थी मेरी वो कैसे मैं ना मान पाता अपने लव का ट्राईऐंगल काश जो ना बनता तू सवाल और तेरा मैं जवाब होता काश जो तू मेरी आँखों में वो झाँक जाती तेरे पास में जो महका मैं गुलाब होता अगर ये ख़्वाब सच हुआ तो सुनले ऐ हसीं मैं पूरी उम्र तेरे दिल में ही गुज़ार दूँ तू जो चले तो दिन हो जब रूके तो रात हो ये काएनात तेरे क़दमों में उतार दूँ अपने लव का ट्राईऐंगल काश जो ना बनता काश जो तू बोले तेरी मैं आवाज़ होता तू शबाब तेरी धुन में मैं शराब होता सबके चेहरों को तो तू यूँँ निहार जाती तेरे नैनों का कभी तो मैं शिकार होता अपने लव का ट्राईऐंगल काश जो ना बनता

Rohit tewatia 'Ishq'

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क्या लिख दूँ? क्या लिख दूँ इस काग़ज़ पर? कि जब तुम तक ये पहुँचे तो महसूस कर सको सिर्फ़ पढ़ो नहीं क्या लिख दूँ कि ये ख़त सिर्फ़ ख़त ना रह जाए तुम सेे झगड़े और जिरह कर पाए उन बातों के लिए जो तुम्हारे लिए शायद सिर्फ़ बातें होंगीं वो सारे लम्हात जो तुम्हारे लिए महज़ कुछ दिन और कुछ रातें होंगीं क्या लिख दूँ? वो शिकायती तंज़? जो मैं जानता हूँ नज़रअंदाज़ कर दोगे तुम या अपनी सारी यादें सियाही में बाँध कर एक पुड़िया सी बना दूँ? कि जब तुम उसे खोलो तो तुम्हारा ज़ेहन भी महकने लगे उन सेे मेरी तरह

Saurabh Mehta 'Alfaaz'

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पड़ोसी जो घर से अपने चार कदम मैं उस ओर बढ़ाता हूँ, ऐसा लगता है मैं फिरसे घर में ही आ जाता हूँ बेहिचक जो बैठक में अंगड़ाइयां लेता रहता हूँ ख़्वाब जो मेरे तकिए पे थे, यहीं सिरहाने पाता हूँ। उस नीम की मुड़गेली पे बैठ के जो ताश खेला करते थे जहाँ पत्तों के बीच में हम अक्सर लम्हे फेंटा करते थे वो माकूल बाज़ी याद है, जब मेरे दर्द के एक पत्ते को, अपने इक्के से तुम ने जीता था। सिर्फ़ आटा और नमक नहीं, कुछ और भी हम ने बांटा है तेज़ तूफानी बारिश में एक छत जहाँ चूल्हा ठंडा था, और आग पेट में लगी थी वहाँ दोनो ने दाँतों से भूख को कुतर कुतर के खाया था। और वो एक शाम जब रंगीन कीमती काग़ज़ मुझ सेे कुछ रूठ से गए थे तब तुम ने उन्हें बस काग़ज़ समझ, सिरहाने मेरे रक्खा था, भूला नहीं वो रात कि मैं चैन की नींद ख़रीद के लाया था। अब भी उन्हें बस काग़ज़ ही समझते हो क्या, समझते हो तो अच्छा है, क्योंकि सड़क के उस पार सौदागरों का मेला है। अब जो मुन्ना तम्हारा मठरी खाने यहाँ आता है, अच्छा लगता है देख कर कि तंदूर में फ़र्क नहीं कर पाता है। मेरी गुड़िया भी भाभी का हलवा जो बेहतर मीठा है, वही खाती है, लगता है तुम ने बहुत कटोरिया चीनी की घर से माँगी हैं। कैसे तुम पड़ोसी हो, आख़िर कैसे ये मुमकिन हुआ, कि अक्सर चूल्हा भी एक और भूख भी एक जैसी, लगता है कि आग बराबर दोनो घरों में लगी है

Prashant Beybaar

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रीडिंग फ़ॉर ए ब्लाईंड चाइल्ड इन घुप्प अँधेरी गलियों में रौशन सी सदायें बहने दो बस आवाज़ों की उँगली पकड़ मुझे इस जंगल में रहने दो शे'रू कैसे दहाड़ा, झरना क्या बोला चाँद ने फिर क्या नाक सिकोड़ी ; ख़ामोश नज़ारे हैं ये सब पलकों पे उजाले दुखते हैं, 'फूल' पढ़ूँ गर ब्रेल में तो वो पोटुओं में चुभते हैं तुम आँखों पे आवाज़ें रख दो फिर पुस्तक को कहने दो इन घुप्प अँधेरी गलियों में रौशन सी सदायें बहने दो ।

Prashant Beybaar

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ज़रा ठहर के आना जो इक वा'दा था तुम सेे, फ़िज़ा में खिलखिलाने का कहकशाँ में डूब जाने का जूड़े में तुम्हारे चाँद टिकाने का उगते सूरज को सीने से लगाने का जानाँ इस ख़्वाहिश में, थोड़ा वक़्त लगेगा गुमाँ की आज़माइश में थोड़ा वक़्त लगेगा कि ये दुनियाए ये मंज़र, ये शहरों में बंजर अभी महफूज़ नहीं हसीं ख़्वाबों के लिए किए सड़क पे ख़ून के थक्के अभी सूखे नहीं हैं सरिया लिए हाथ अब किताबों के भूखे नहीं हैं मज़हबी टुकड़े पे पलते सायों को अभी मुल्क में 'टुकड़े-टुकड़े' चलाने से फ़ुर्सत नहीं है कि अभी तो नस्ल को साबित है करना रहने को ज़िंदा अब ज़रूरी है डरना कि कानून के मानी अभी बदल रहे हैं हुक्मरां को इंक़लाबी अभी खल रहे हैं मुझे मालूम है बड़ा मन था तुम्हारा, जाड़े में, कुल्फ़ी का लुत्फ़ उठाने का वादी में, कहवा के दो कप लड़ाने का लालकिले पे बाँह फैलाने का, और श्डलश् की झरझर में डूब जाने का मगर जानांए अभी यहाँ, तेल की खदानों पे मिसाइलों के घेरे हैं बड़े काले से रोज़ यहाँ उठते सवेरे हैं कुछ अंदर के कीड़े सरहद कुतर रहे हैं बड़े-बड़े चेहरों के चेहरे अभी उतर रहे हैं और वो जो वा'दा था तुम सेे कि, तुम्हारी हथेली पे अपनी उँगली उगाकर तुम्हारे बालों में ग़ुलाबी से फूल सजाकर चलेंगे किनारे से मीलों के फ़ेरे देखेंगे तोता-ओ-मैना-ओ-बटेरे इन बातों की सूरत अभी मुमकिन नहीं है जीना न पूछो, हाँ मरना मुश्किल नहीं है अभी स्कैण्डल में साँसों की इक चीख़ दबी है उस लड़की की कैंडल-मार्च अभी रुकी नहीं है अभी आब-ओ-दाने के भाव बहुत हैं ढकी.ओढ़ी इस जनता के घाव बहुत हैं कि अभी सरज़मीं पे शो'ले भभक रहे हैं वर्दी से ख़ून के कतरे अभी टपक रहे हैं वो रातों का वा'दा, वो बुलाती सदायें खिड़की पे तुम्हारी, मल्हार गाती हवाएँ अभी इन बातों में थोड़ा सा वक़्त लगेगा अच्छे दिन का वो वा'दा ज़रा लंबा चलेगा जज साहब ये बोले की मुश्किल घड़ी है कुछ ज़ुल्मी सिफ़त, कुछ सियासी कड़ी है अभी कुफ़लों में क़ैद हैं लफ़्ज़ हमारे मिटाने को अक्स, हो रहे हैं इशारे वो इंसानियत की उसूलों-निगारी अभी मुमकिन नहीं, अभी मुमकिन नहीं सुनो तुम जानांए वो सारे ख़्वाब छुपाना ज़र्रे ज़र्रे को सारी ये बातें बताना हो सके तो अभी, ज़रा ठहर के आना हो सके तो अभी, ज़रा ठहर के आना

Prashant Beybaar

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अभी इश्क़ लिखने का दिल नहीं है मैं कोशिशें हज़ार करता हूँ मगर रूह है कि सिहर जाती है नज़र है कि ठहर जाती है ; सिग्नल पे खड़े उस नंगे बच्चे पे जो कार के शीशे पार से बेच रहा है आज़ादी । तेरे ख़यालों में डूबकर एक ग़ज़ल बुननी थी मुहब्बत में पड़ कर आशिक़ की राह चुननी थी मगर ज़ेहन की छत है कि टपक रही है टीस की धूरी लपक रही है और बन रहीं हैं तस्वीरें बेहिसाब। हैं तस्वीरें, बेवा औरत के ज़र्द चेहरे की यतीम बूढ़ी आँख में कोहरे की रोज़मर्रा के फंदे में, फँसते जीवन के मोहरे की । एक नौवीं की लड़की जो भटक रही है एक औरत जो कोठे पे तड़प रही है चूल्हे और बिस्तर के बीच में बीवी धीरे धीरे सदियों से सरक रही है । और भी कोफ़्त टटोलती तस्वीरें हैं यहाँ मैं हुस्न-ओ-इश्क़ लिखूँ तो कैसे, कि हस्पताल में घाव लिए मरीज़ों की कमी नहीं है यहाँ शहीदों की मौत पे आँखों में नमी नहीं है बस किसानों तक जो कभी पहुँची नहीं, वो तरक्की काग़ज़ों में थमी नहीं है । कूड़ेदान में कपड़े-जूते और पुराने सेलफ़ोन के नीचे हथेली भर की बच्ची की ठंडी लाश छुपी है । एक परियों की रानी सच्चे प्यार की ख़ातिर अपनी इज़्ज़त और यक़ीं, धोखे में गँवा चुकी है । दिल सुलग जाता है, मन बिखर जाता है देख कर, कि 'वीमन एम्पावर मेंट' वाले शहर के भीतर बड़े फ्लाईओवर और भीड़ की नज़रों से होकर लक्ष्मी तेज़ाब से अब भी झुलस रही है । सरकारी फ़ाइलों में खोई वो चप्पल सालों से अब तक घिसट रही है । और भी शय हैं दुनिया में मौजूद ; मेरा दोस्त जो कैंसर से घुट घुट के लड़ता है एक बाप घर खर्च की ख़ातिर ख़ुद से झगड़ता है घर के पड़ोस में कल ही 'लिनचिंग' हुई है ख़बरें कहती हैं सब क़ाबू है, कैसी 'चीटिंग' हुई है। हीर-रांझा के हिज्र का दर्द यक़ीनन है भारी जिस में तिनके भर का भी मुझ को भरम नहीं है मगर, फुटपाथ पे सिकुड़ते पेट की भूख के आगे जिस का जवान बेटा मरा हो, उस माँ की हूक के आगे, उस महबूब की जुदाई की कचोट कुछ भी नहीं है, कुछ भी नहीं है । और इन सब के बीच में मुहब्बत की बातें ग़ुलाब ओढ़े सवेरे, लिली फ्लावर की रातें हाँ, मगर बात ये भी सही है, कि तेरी हुस्न-ओ-अदास कभी दिल नहीं भरता तेरी याद के दरिया में डूबा, मन नहीं उबरता मगर ज़माने में और भी दर्द बचे हैं हर चुप्पी के पीछे अफ़साने दबे हैं क़लम झुक जाती है मेरी उन बेज़ुबानों की जानिब जिन के गूंगे फ़साने किसी से सुने नहीं हैं मगर, ऐ हुस्न-ए-जानां धुएं में आग न उकेरना तुम मेरी बेरया मुहब्बत से कभी मुँह न फेरना ऐसा नहीं है कि मुझे प्यार हासिल नहीं है ऐसा भी नहीं कि दिल दोस्ती मुमकिन नहीं है मगर, अभी इश्क़ लिखने का दिल नहीं है मगर, अभी इश्क़ लिखने का दिल नहीं है।

Prashant Beybaar

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पिया अँखियाँ मिलायीं पिया तू ने जो अँखियाँ मिलायीं मेणु देख भोहें उठायीं तीर नज़रों के तेरे दिल के पार हो गए आर पार हो गए ओ पिया तू जो, ऐसे अड़ा है बट के जैसे खड़ा है मैं तो बन बेल तुझ पे लिपटी बार - बार जाऊँ ओ तू ने नज़रां मिलायीं पिया नज़रां मिलायीं देख तेरी ये ख़ुदाई ले ली रब से लड़ाई बात यहाँ तक आई छोड़ दिया मैं ने उस को नमाज़ियों के लिए,, और सुन तेरी बातें लफ़्ज़ बन तेरे आयत रूह के पार हो गए ओ तू ने नज़रां मिलायीं सजना नज़रां मिलायीं पिया नज़रां मिलायीं जानाँ, नज़रां मिलायीं

Prashant Beybaar

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