nazmKuch Alfaaz

यास-खेज़ सुब्हों से बे-सुकून शामों से भागने की काविश ने कितनी रहगुज़ारों के पेच-ओ-ख़म के जल्वों से आश्ना कराया है दर-ब-दर फिराया है जाने कब ये होश आया सुब्ह-ओ-शाम बे-मा'नी बे-सकून-ओ-बे-उम्मीद फिर तो सिलसिला निकला लम्हा-हा-ए-काविश का चैन खो गया दिन का नींद उड़ गई शब की जुस्तुजू का ये चक्कर खींच ले गया हर पल जाने किस तरफ़ लेकिन हर क़दम हुआ एहसास मैं गुनाह करता हूँ उम्र क्यूँँ गँवाता हूँ काविशों का क्या हासिल हर क़दम समेटे हैं ख़ार ना-उमीदी के एक दिन का क़िस्सा है चलते चलते पहुँचा हूँ इक जगह जो वीराँ थी कुछ दरख़्त फैले थे जा-ब-जा परेशाँ से इक दरख़्त पर गिध थे इंतिज़ार में बैठे और मक़बरे थे कुछ पुर-सुकून था माहौल दिल-पसंद था बेहद जाने क्यूँँ ये लगता था अपनी सुब्ह शामों से अपनी बे-सुकूनी से अपनी ना-उमीदी से छूटने का वक़्त आया पय-ब-पय हर इक लम्हा होश हो रहे थे ग़म और दिल को लगता था ज़ीस्त वहम हो जैसे ख़्वाब या कि अफ़्साना दफ़्अ'तन उठी इक चीख़ रूह तक तड़प उट्ठी चीख़ जाने किस की है हाए ये तो मेरी है और बर्क़ की सूरत मैं वहाँ से पल्टा हूँ इस ख़मोश आलम से बे-ख़ुदी की दुनिया से जब पलट के देखा है रूह मुस्कुराती थी मेरी रूह-ए-आवारा और हसीन लगती थी

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'सुनो! मैं घर वापस आ रहा हूँ' अच्छा! तुम्हें एक ख़बर सुना रहा हूँ सुनो! मैं घर वापस आ रहा हूँ पूरे नौ दिनों की छुट्टियाँ मिली हैं मगर छुट्टियाँ तो महज़ एक बहाना है अस्ल में तो तुम सेे मिलना चाहता हूँ तुम्हें रू-ब-रू देखना चाहता हूँ इक दफ़ा फिर बाहों में भरना चाहता हूँ अस्ल में मैं थोड़ा-सा थक गया हूँ तुम्हारी गोद में कुछ देर सोना चाहता हूँ सफ़र की धूप में बहुत जल चुका हूँ ज़रा ज़ुल्फ़ों की पनाह में रहना चाहता हूँ अंजान राहों पे बड़ा भटक लिया हूँ तुम्हारे दिल के मकाँ में ठहरना चाहता हूँ बस नौ ही दिन मिले हैं मुझे मरियम हर पल तुम्हारे साथ गुज़ारना चाहता हूँ और चाहता हूँ कि मेरा इंतिज़ार करना ठीक वैसे ही उन हसीन शामों की तरह उसी सफ़ेद सलवार और कुर्ती में सँवरना और गले में लहराता वही सुर्ख़ दुपट्टा अपनी छत की मुंडेर पर तुम खड़ी रहना गुज़रुँगा जब मैं गली से तुम्हारी तो रोकना न ख़ुद को तुम मुस्कुराने से मगर इस बार फेर लूँगा नज़रें मैं तुम सेे तुम भी रोक लेना ख़ुद को क़दम बढ़ाने से है क़सम हम दोनों को उस रिश्ते की जिस का वजूद कोई नाम कोई हैसियत नहीं मैं ने ख़त में ऊपर लिक्खा है जो कुछ भी उन बातों की मरियम अब कोई अहमियत नहीं सोचो! फिर तुम्हें वो बातें क्यूँँ बता रहा हूँ सुनो! मैं घर वापस आ रहा हूँ

Rehaan

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"वो कवि नहीं थे" मार काट के नारे लग रहे थे नारे लगाने वालों का चेहरा पोता हुआ था उन्हें रोक पाना मुश्किल था इंसानियत लहू-लुहान थी संवेदनाओं के चिथड़े उड़े हुए थे नफ़रत ने वातावरण का तापमान बढ़ा दिया था तभी पुलिस की गाड़ी आ धमकी सायरन सुन कर सभी भागने लगे पर मैं वहीं खड़ा रहा गाड़ी से उतर कर एक पुलिस अफ़सर मेरे सामने आया और उस ने मुझ सेे सवाल पूछा कि हिंसा करने वाले लोग कौन थे? मैं ने कहा हिंसा करने वाले लोग कवि नहीं थे

Adarsh Akshar

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शर्क़ से ग़र्ब तक अर्श से फ़र्श तक या कराँ ता कराँ एक सन्नाटा फैला हुआ मेरी बेकल जबीं के तिलिस्मात से तेरी बेचैन बाँहों के इल्हाम तक तिश्ना होंटों से हलचल भरे जाम तक उन की आँखों के रौशन दियों से मिरी अर्ग़वानी घनी शाम तक या कराँ ता कराँ एक सन्नाटा फैला हुआ कहकशाँ बुझ गई रास्ते में कहीं रंग-ए-नूर-ए-सहर लुट गया आसमानों में उलझा हुआ मै-कदा नूर का दिलबरान-ए-हरम थक के गुमनाम रस्तों में गुम हो गए रंग-ए-महताब कुम्हला गया मह-रुख़ाँ चश्म-ए-आहू सिफ़त मस्त मदमाती शामों में हसरत की दहलीज़ पर आह भरते रहे और सबा रात भर ज़र्द महताब की आँच में ख़ाक बर-सर भटकती रही या कराँ ता कराँ एक सन्नाटा फैला हुआ हल्का-ए-आशिक़ाँ से लब-ए-बाम तक दस्त-ए-साक़ी से दुर्द-ए-तह-ए-जाम तक दीद-ए-बीना से बिस्मिल के अंजाम तक मा'बदों की ख़मोशी से हंगामा-ए-मजमा'-ए-आम तक शहर-ए-अफ़्सोस की तीरा-ओ-तार गलियों से रौशन दमकती हुई शारा-ए-आम तक याँ कराँ ता कराँ एक सन्नाटा फैला हुआ रब्ब-ए-मा'बूद गुम आसमानों में है गुंग-ओ-ख़ामोश है बादशाह-ए-जहाँ वाली-ए-मा-सिवा नाएब-अल्लाह-फ़िल-अर्ज़ कौन-ओ-मकाँ इश्क़ का माजरा हुस्न का माजरा दर्द का माजरा या ख़ुदा या ख़ुदा कुछ सबील-ए-जज़ा दिल धड़कने को कोई बहाना ख़ुदा

Ekram Khawar

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ये रहगुज़र रहगुज़ार-ए-ख़ूबाँ है जिस का हर मोड़ कहकशाँ है सजल शगुफ़्ता हसीं दिल-आवेज़ ख़ूब-सूरत बहार सामाँ इधर से गुज़र गया ज़माना कि जैसे गुज़रे रमीदा आहू जिलौ में सुब्हों की मुस्कुराहट लबों पे रौशन सी गुनगुनाहट जबीं पे तक़्दीस-ए-फ़न का क़श्क़ा नज़र नज़र में सहर के ख़ाके लचकती बाहें महकते गेसू सबीह अबरू गुदाज़ बाज़ू क़दम क़दम पर पड़े हैं हल्क़े ठहर ठहर कर बजे हैं घुँघरू ये रहगुज़र रहगुज़ार-ए-ख़ूबाँ है जिस का हर मोड़ कहकशाँ है ये रहगुज़र होश-मंद मेहनत-कशों की दानिश के शाहज़ादों की रहगुज़र है कि जिस का हर मोड़ जेहद-ओ-फ़न की अलामतों का नगर नगर है मिरे रफ़ीक़ो ये रहगुज़र इक नई डगर है ये रहगुज़र फ़हम और बसीरत की रहगुज़र है मगर अभी ज़ुल्फ़ ता-कमर है

Vaqar Khaleel

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सफ़ेद और सियाह गोटों के हसीं इक दाएरे अंदर बहुत ही सुर्ख़ रंगत की हसीं इक गोट होती है कि जिस को रानी कहते हैं हर इक खेलने वाले की बस इक ही तमन्ना है इसी कैरम के कोनों में जो छोटे छोटे कमरे हैं उन्हें आबाद करना है कनीज़ों से और रानी से खिलाड़ी चाल चलता है स्ट्राइकर की मदद से आमद-ओ-रफ़्त उन कनीज़ों की लगी रहती है कमरों में कहीं गोरी कहीं काली कभी रानी अजब है खेल कैरम का हर इक याँ खेलने वाला इसी धुन में है सरगर्दां इसी काविश में रहता है किसी तरह से रानी को वो उस जानिब को ले जाए जो उस की जीत का घर है है मस्कन उस की फ़त्ह का महल जो है तमन्ना का जो उस की राजधानी है जहाँ पे जा के ये रानी उसी की हो के रह जाए अजब है खेल कैरम का उधर रानी की शर्तें हैं करेगा जो भी पूरी ये तो रानी तब ही जाएगी लो उस की शर्त भी सुन लो कि कनीज़-ए-ख़ास को ले कर ही रानी आप की होगी करेगी कमरे का रुख़ जब कनीज़-ए-ख़ास हमराह हो सियाह हो चाहे गोरी हो मगर वो साथ में जाए अजब है खेल कैरम का मुझे रानी की शर्तों पर बड़ा ही प्यार आया है खिलाड़ी तो नहीं रानी मगर रानी तो है आख़िर हुमा फ़त्ह-ओ-नुसरत का और अक्सर कामरानी का उसी के सर पे जाता है कि जिस के पास रानी है कई तरह से देखो तो बहुत हैं ज़ाविए उस में बहुत अस्बाक़ हैं उस में दरीचे ज़ेहन के खोले अजब है खेल कैरम का कभी रानी के होते भी शिकस्त-ए-फ़ाश होती है कभी रानी के होने से मुक़द्दर जगमगा उट्ठे मुज़फ़्फ़र आप को कर दे कभी रानी तो मिलती है मगर तुम हार जाते हो कभी ऐसा भी होता है कोई रानी को न पा कर भी तुम से जीत जाता है अजब है खेल कैरम का

Ibn-e-Mufti

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चार सू इक उदास मंज़र है ज़ीस्त है जैसे एक वीराना जाने क्यूँ फट रहा है आज दिमाग़ हो न जाऊँ कहीं मैं दीवाना दोस्त कहते हैं सैर कर आएँ मौज कर आएँ दिल को बहलाएँ कोई दिलबर न दिल-नशीं कोई कोई गुल-रू न मह-जबीं कोई जी मचल जाए जिस से मिलने को हाए इस दहर में नहीं कोई चाँद तारों की रौशनी बे-सूद सैर-ए-दरिया की बात भी बे-सूद गुल्सिताँ की कली कली बे-सूद हम-नशीनों की दिल-लगी बे-सूद दिल को लगता है आज रह रह कर जैसे है मेरी ज़िंदगी बे-सूद माह और साल कितने बीत गए बे-सबब बे-हुसूल बे-मंशा हाए लेकिन ये एक इक लम्हा कुछ भी कीजे गुज़र नहीं पाता चुभ रहा है जिगर में इक काँटा काश मेरा भी कोई हो जाता काश मेरा भी कोई हो जाता काश मेरा भी कोई हो जाता

Daud Ghazi

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कनार-ए-आब सर-ए-शाम आ के बैठा हूँ नज़र में सब्र से बेगाना इक समुंदर है उभरता दबता मचलता बिफर के बढ़ता हुआ कभी उतरता हुआ और उतर के चढ़ता हुआ तमाशा सई-ए-जुनूँ-ख़ेज़ का दिखाता हुआ तिलिस्म-ए-फ़िक्र से अपनी तरफ़ बुलाता हुआ कनार-ए-आब सर-ए-शाम आ के बैठा हूँ नज़र में एक हुजूम-ए-जिगर-फ़िगार लिए दिल-ओ-दिमाग़ में सौ उलझनों का बार लिए नफ़स नफ़स में ग़म-ए-ज़ीस्त के शरार लिए ख़याल-ओ-फ़िक्र-ओ-तजस्सुस का ख़लफ़शार लिए यक़ीं का जोश लिए वहम-ए-शो'ला-बार लिए कनार-ए-आब सर-ए-शाम आ के बैठा हूँ नज़र में एक अजब दिल-फ़रेब मंज़र है वहाँ पे दूर ज़रा दूर कुछ ज़रा आगे उफ़ुक़ से हाथ मिलाता हुआ समुंदर है वहाँ पे है कोई कमतर न कोई बेहतर है मदार-ए-ज़ीस्त वहाँ तो बराबरी पर है वहाँ न है कोई ज़ुल्मत न कोई मायूसी हर एक ज़र्रा वहाँ रौशन-ओ-मुनव्वर है पहुँच गया है जो उस अंजुमन में ख़ुश-तर है मैं सोचता हूँ कि एक जस्त में पहुँच जाऊँ उस एक जस्त में जो फ़ासलों की दुश्मन है वहाँ हयात जहाँ क़हर है न उलझन है मगर ठहर ज़रा ऐ दिल ये सोच लूँ पहले पहुँच गया जो मैं उस सरहद-ए-निगाह तलक वहाँ पहुँच के अगर आह ऐसा हो जाए नज़र के सामने जो कुछ था महज़ धोका था वो इक हसीन तसव्वुर था जो कि देखा था वो हद जहाँ कि समुंदर उफ़ुक़ को छूता था कुछ और बढ़ गई आगे जो सरहद-ए-इम्काँ मदार-ए-ज़ीस्त भला फिर बनाएँगे किस को ख़िरद की मंज़िल-ए-आख़िर बनाएँगे किस को ख़िरद की मंज़िल-ए-आख़िर न मिल सकेगी कभी मगर ये ज़ीस्त तो फिर भी गुज़ारनी होगी लगा दूँ जस्त कि ये सरहद-ए-निगाह बहुत हसीन लगती है कल क्या हो ये किसे मालूम कनार-ए-आब सर-ए-शाम आ के बैठा हूँ यक़ीं का जोश लिए अज़्म का ख़ुमार लिए जुनून-ए-शौक़ लिए फ़िक्र-ए-होशियार लिए

Daud Ghazi

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ग़म-ए-हयात के नग़्मों का मैं मुग़न्नी हूँ ग़म-ए-हयात की लज़्ज़त का हूँ मैं शैदाई ये जज़्बा जो दिल-ए-बेताब से फ़ुज़ूँ-तर है कहीं से गर्दिश-ए-शाम-ओ-सहर उड़ा लाई नज़र को देता है ये रौशनी तजस्सुस की ये ग़म बनाता है दिल को दिल-ए-तमन्नाई ये राज़-हा-ए-तग-ओ-दौ को फ़ाश करता है ये राह-रौ को सिखाता है जादा-पैमाई इसी से गर्मी-ए-बज़्म-ए-हयात बाक़ी है यही है दहर के हर इंक़लाब का बानी कहीं न डस ले ये तन्हाई-ए-हयात मुझे तू ग़म से सीख ले आदाब-ए-बज़्म-आराई न कर हिसार-ए-मन-ओ-तू में अपना ग़म महदूद कि हो ये आम तो फिर ज़िंदगी है आफ़ाक़ी

Daud Ghazi

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ये तहज़ीब आख़िर बनाई है किस ने ज़माने की इज़्ज़त बढ़ाई है किस ने बना कर बदलने का मुख़्तार है कौन हयात-ए-मुसलसल का फ़नकार है कौन मशीनों में किस का लहू चल रहा है ये किस के लहू पर जहाँ पल रहा है बता दो ख़ुदा के लिए अब बता दो हक़ीक़त के चेहरे से पर्दा उठा दो

Daud Ghazi

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जब इंसान ने पढ़ना सीखा पढ़ने लगा तहज़ीब की आयत मिट्टी आग हवा और पानी दुश्मन सारे बन गए यार उस की आयत की तफ़्सीरें अब इतनी हैं कि अक़्ल है दंग लेकिन इक ऐसी है बात जिस से कि बनती है बात इन बे-गिनती तफ़सीरों की हर इक इंसाँ इंसाँ है जब इंसान ने पढ़ना सीखा पढ़ने लगा तहज़ीब की आयत गिरने लगीं दीवारें खुलने लगे दरवाज़े जिन लोगों ने दीवारें बनवाई हैं भूल गए तहज़ीब की आयत

Daud Ghazi

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