nazmKuch Alfaaz

पुराने बूट हैं तस्में खुले हैं अभी मिट्टी के चेहरे अन-धुले हैं शराबें और मश्कीज़ा सहर का अभी है जिस्म पाकीज़ा गजर का सुते चेहरे पे इस्तेहज़ा का मौसम लहू नब्ज़ों से ख़ाली कर गया है गले में मुल्क के तावीज़ डालो बिदेसी बर्छियों से डर गया है ग़ज़ल दालान में रक्खी है मैं ने महक है संगतरे की क़ाश जैसी ये कैसी मय है जो चक्खी है मैं ने मुझे उश्शाक़ ये कहते हैं 'आमिर' बहुत तन्हा सिसकते दहर में हो! बड़े शाएर हो छोटे शहर में हो फ़रेब-ए-अस्र से मदहोश कमरा निगोड़ी तितलियों से भर गया है समुंदर पिंडुलियों तक आते आते किसी पत्थर की सिल पर मर गया है सलोनी सर्दियों से झाँकते हैं वो अबरू कश्तियों को हाँकते हैं सिलेटी बादलों का ये सहीफ़ा मिरी मुट्ठी में पढ़ता है वज़ीफ़ा मैं रोता हूँ तो रो पड़ते हैं ताइर मिरे हुजरे में कम आते हैं ज़ाएर ये पोरें नूर-बाफ़ी कर रही हैं मोहब्बत को ग़िलाफ़ी कर रही हैं तफ़ाख़ुर में है दो होंटों का ख़म भी अभी रक्खा नहीं मैं ने क़लम भी

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं

Tehzeeb Hafi

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

Faiz Ahmad Faiz

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"मैं कौन हूँ?" मैं वो पानी हूँ जिसे लहरों ने रेत पर फेंक दिया जहाँ से मैं अब वापस नहीं जा सकता मैं वो कप में बची ज़रा सी चाय हूँ जो लोग अक्सर छोड़ देते हैं मैं वो शाख़ हूँ जिस पे फल तो लगते हैं पर खिलने से पहले ही टूट कर गिर जाते हैं मैं नासमझों में ज़रा समझदार हूँ और समझदारों में ज़रा नासमझ मैं दीवार पर टंगा वो कैलेंडर हूँ जिसे इंतिज़ार है कि कोई आएगा और उसे नए महीने में बदलेगा मैं शबनम का वो क़तरा हूँ जो धूल खाए हुए पत्तों को ज़रा भी चमका नहीं पाता और ख़ुद जिसे शम्स की पहली किरण निगल जाती है

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वो चेहरा ग़मज़दा शब में वो चेहरा मेरे दिल के कहकशाँ में यूँँ चमकता है किसी तारे की मानिंद नूर बे-माना नहीं जिस का कहीं से मेरे चेहरे पे चमक है जिस ज़िया से चोट तारीकी को करती है मुसलसल ऐसी तारीकी कि जिस में दफ़्न है मेरी तजस्सुस कोई चेहरा देखने की कोई अपना ढूँढ़ने की पर ये तारा दस्तरस में ही नहीं है रौशनी से इस की कब तक और बहलूँ फिर सवेरा होगा और फिर मैं उसी तारीकी में ही घुट के रह जाऊँगा आख़िर

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"एक वीरान मंज़िल" तुम मुझे मंज़िल समझते हो किसी की क्यूँ नहीं फिर देखते हो एक मुद्दत से मेरे दिल पे जमी धूल इक भी नक्श-ए-पा नहीं जिस पे किसी के आश्ना है जो फ़क़त तन्हाई से ही एक पगडंडी सी शायद जिस पे चलना भी हो ज़हमत जाती है जो एक सद में की वबा तक सर-ब-सर गुम है वजूद उस का जहाँ पे और फिर भी तुम मुझे मंज़िल समझते हो किसी की क्यूँ समझते हो तुम ऐसा?

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ज़िंदगी अफ़सुर्दगी से हार जाती है धूप ख़ंजर घोंपती है रोज़ सीने में आहटें जुट जाती हैं सब ख़ून पीने में उठती हैं दहशत-ज़दा लहरें पसीने में तल्ख़ियाँ ही तल्ख़ियाँ होती हैं जीने में हौसला कर के कब इन के पार जाती है ज़िंदगी अफ़सुर्दगी से हार जाती है जिस्म हो जाता है बे-हिस रूह भी बेताब थम से जाते हैं सभी जज़्बातों के सैलाब ख़्वाबों के चेहरों पे पड़ते रहते हैं तेज़ाब टूटते रहते हैं होंठों के गुल-ए-शादाब रफ़्ता-रफ़्ता रौनक़ों को मार जाती है ज़िंदगी अफ़सुर्दगी से हार जाती है सब गुहारें रहती हैं दिल की हिरासत में कट ही जाता है गला आहों का वहशत में वार करती है ज़िहानत दिल पे ख़ल्वत में काँपती है नींद पूरी रात आफ़त में ख़ार से कुछ नक़्स दिल पे वार जाती है ज़िंदगी अफ़सुर्दगी से हार जाती है दर्द दाइम है उमीदों को बताए कौन ख़ाक आँखों में नई आतिश जलाए कौन सदमों की ज़दस सलामत बच के जाए कौन बे-बसी की ये ज़मीं बंजर बनाए कौन मश्क़ ख़ुशबीनी की भी बे-कार जाती है ज़िंदगी अफ़सुर्दगी से हार जाती है

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अपनी आँखों में ख़मिस्तान-ए-मय-ए-नाब लिए अपने आरिज़ पे बहार-ए-गुल-ए-शादाब लिए अपने माथे पे दरख़शानी-ए-महताब लिए निकहत-ओ-रंग लिए नूर का सैलाब लिए ईद आई है मोहब्बत का नया बाब लिए ज़ुल्फ़ बिखरी है कि रहमत की घटा छाई है जिस तरफ़ देखिए रा'नाई ही रा'नाई है रहगुज़र काहकशाँ बन के निखर आई है ज़र्रा ज़र्रा है जमाल-ए-दुर-ए-ख़ुश-आब लिए ईद आई है मोहब्बत का नया बाब लिए ख़ारज़ारों पे गुलिस्ताँ का गुमाँ है इमरोज़ शिकवा-ए-जौर किसी लब पे कहाँ है इमरोज़ मुल्तफ़ित चश्म-ए-हसीनान-ए-जहाँ है इमरोज़ कितने तस्लीम लिए कितने ही आदाब लिए ईद आई है मोहब्बत का नया बाब लिए किस क़दर रहमत-ए-साक़ी-ए-अज़ल आम है आज रक़्स-ए-पैमाना लिए गर्दिश-ए-अय्याम है आज बादा-ए-कैफ़ से लबरेज़ हर इक जाम है आज इशरत-ए-रूह ओ सुकून-ए-दिल-ए-बेताब लिए ईद आई है मोहब्बत का नया बाब लिए दोश-ए-गीती पे परेशाँ हुई फिर ज़ुल्फ़-ए-शमीम लड़खड़ाती हुई फिरती है गुलिस्ताँ में नसीम फिर ज़मीं बन गई ग़ैरत-दह-ए-गुलज़ार-ए-नईम ख़ाक है तख़्ता-ए-गुल बिस्तर-ए-संजाब लिए ईद आई है मोहब्बत का नया बाब लिए ज़िंदगी रंज-ओ-अलम भूल गई है ऐ दोस्त महफ़िल-ए-ज़ीस्त ब-सद-शौक़ सजी है ऐ दोस्त इश्क़ बेगाना-ए-आशुफ़्ता-सरी है ऐ दोस्त हुस्न है पैरहन-ए-अतलस-ओ-कमख़्वाब लिए ईद आई है मोहब्बत का नया बाब लिए दर्द-ए-हस्ती की दवा कर लें ख़ुलूस-ए-दिल से आओ इक फ़र्ज़ अदा कर लें ख़ुलूस-ए-दिल से आओ तजदीद-ए-वफ़ा कर लें ख़ुलूस-ए-दिल से जज़्बा-ओ-शौक़-ए-हम-आहंगी-ए-अहबाब लिए ईद आई है मोहब्बत का नया बाब लिए

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