nazmKuch Alfaaz

अपनी आँखों में ख़मिस्तान-ए-मय-ए-नाब लिए अपने आरिज़ पे बहार-ए-गुल-ए-शादाब लिए अपने माथे पे दरख़शानी-ए-महताब लिए निकहत-ओ-रंग लिए नूर का सैलाब लिए ईद आई है मोहब्बत का नया बाब लिए ज़ुल्फ़ बिखरी है कि रहमत की घटा छाई है जिस तरफ़ देखिए रा'नाई ही रा'नाई है रहगुज़र काहकशाँ बन के निखर आई है ज़र्रा ज़र्रा है जमाल-ए-दुर-ए-ख़ुश-आब लिए ईद आई है मोहब्बत का नया बाब लिए ख़ारज़ारों पे गुलिस्ताँ का गुमाँ है इमरोज़ शिकवा-ए-जौर किसी लब पे कहाँ है इमरोज़ मुल्तफ़ित चश्म-ए-हसीनान-ए-जहाँ है इमरोज़ कितने तस्लीम लिए कितने ही आदाब लिए ईद आई है मोहब्बत का नया बाब लिए किस क़दर रहमत-ए-साक़ी-ए-अज़ल आम है आज रक़्स-ए-पैमाना लिए गर्दिश-ए-अय्याम है आज बादा-ए-कैफ़ से लबरेज़ हर इक जाम है आज इशरत-ए-रूह ओ सुकून-ए-दिल-ए-बेताब लिए ईद आई है मोहब्बत का नया बाब लिए दोश-ए-गीती पे परेशाँ हुई फिर ज़ुल्फ़-ए-शमीम लड़खड़ाती हुई फिरती है गुलिस्ताँ में नसीम फिर ज़मीं बन गई ग़ैरत-दह-ए-गुलज़ार-ए-नईम ख़ाक है तख़्ता-ए-गुल बिस्तर-ए-संजाब लिए ईद आई है मोहब्बत का नया बाब लिए ज़िंदगी रंज-ओ-अलम भूल गई है ऐ दोस्त महफ़िल-ए-ज़ीस्त ब-सद-शौक़ सजी है ऐ दोस्त इश्क़ बेगाना-ए-आशुफ़्ता-सरी है ऐ दोस्त हुस्न है पैरहन-ए-अतलस-ओ-कमख़्वाब लिए ईद आई है मोहब्बत का नया बाब लिए दर्द-ए-हस्ती की दवा कर लें ख़ुलूस-ए-दिल से आओ इक फ़र्ज़ अदा कर लें ख़ुलूस-ए-दिल से आओ तजदीद-ए-वफ़ा कर लें ख़ुलूस-ए-दिल से जज़्बा-ओ-शौक़-ए-हम-आहंगी-ए-अहबाब लिए ईद आई है मोहब्बत का नया बाब लिए

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो

Gulzar

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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है

Sahir Ludhianvi

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"नज़्म" इक बरस और कट गया 'शारिक़' रोज़ साँसों की जंग लड़ते हुए सब को अपने ख़िलाफ़ करते हुए यार को भूलने से डरते हुए और सब से बड़ा कमाल है ये साँसें लेने से दिल नहीं भरता अब भी मरने को जी नहीं करता

Shariq Kaifi

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क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!

Raghav Ramkaran

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"एक वीरान मंज़िल" तुम मुझे मंज़िल समझते हो किसी की क्यूँ नहीं फिर देखते हो एक मुद्दत से मेरे दिल पे जमी धूल इक भी नक्श-ए-पा नहीं जिस पे किसी के आश्ना है जो फ़क़त तन्हाई से ही एक पगडंडी सी शायद जिस पे चलना भी हो ज़हमत जाती है जो एक सद में की वबा तक सर-ब-सर गुम है वजूद उस का जहाँ पे और फिर भी तुम मुझे मंज़िल समझते हो किसी की क्यूँ समझते हो तुम ऐसा?

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ज़िंदगी अफ़सुर्दगी से हार जाती है धूप ख़ंजर घोंपती है रोज़ सीने में आहटें जुट जाती हैं सब ख़ून पीने में उठती हैं दहशत-ज़दा लहरें पसीने में तल्ख़ियाँ ही तल्ख़ियाँ होती हैं जीने में हौसला कर के कब इन के पार जाती है ज़िंदगी अफ़सुर्दगी से हार जाती है जिस्म हो जाता है बे-हिस रूह भी बेताब थम से जाते हैं सभी जज़्बातों के सैलाब ख़्वाबों के चेहरों पे पड़ते रहते हैं तेज़ाब टूटते रहते हैं होंठों के गुल-ए-शादाब रफ़्ता-रफ़्ता रौनक़ों को मार जाती है ज़िंदगी अफ़सुर्दगी से हार जाती है सब गुहारें रहती हैं दिल की हिरासत में कट ही जाता है गला आहों का वहशत में वार करती है ज़िहानत दिल पे ख़ल्वत में काँपती है नींद पूरी रात आफ़त में ख़ार से कुछ नक़्स दिल पे वार जाती है ज़िंदगी अफ़सुर्दगी से हार जाती है दर्द दाइम है उमीदों को बताए कौन ख़ाक आँखों में नई आतिश जलाए कौन सदमों की ज़दस सलामत बच के जाए कौन बे-बसी की ये ज़मीं बंजर बनाए कौन मश्क़ ख़ुशबीनी की भी बे-कार जाती है ज़िंदगी अफ़सुर्दगी से हार जाती है

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"मैं कौन हूँ?" मैं वो पानी हूँ जिसे लहरों ने रेत पर फेंक दिया जहाँ से मैं अब वापस नहीं जा सकता मैं वो कप में बची ज़रा सी चाय हूँ जो लोग अक्सर छोड़ देते हैं मैं वो शाख़ हूँ जिस पे फल तो लगते हैं पर खिलने से पहले ही टूट कर गिर जाते हैं मैं नासमझों में ज़रा समझदार हूँ और समझदारों में ज़रा नासमझ मैं दीवार पर टंगा वो कैलेंडर हूँ जिसे इंतिज़ार है कि कोई आएगा और उसे नए महीने में बदलेगा मैं शबनम का वो क़तरा हूँ जो धूल खाए हुए पत्तों को ज़रा भी चमका नहीं पाता और ख़ुद जिसे शम्स की पहली किरण निगल जाती है

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वो चेहरा ग़मज़दा शब में वो चेहरा मेरे दिल के कहकशाँ में यूँँ चमकता है किसी तारे की मानिंद नूर बे-माना नहीं जिस का कहीं से मेरे चेहरे पे चमक है जिस ज़िया से चोट तारीकी को करती है मुसलसल ऐसी तारीकी कि जिस में दफ़्न है मेरी तजस्सुस कोई चेहरा देखने की कोई अपना ढूँढ़ने की पर ये तारा दस्तरस में ही नहीं है रौशनी से इस की कब तक और बहलूँ फिर सवेरा होगा और फिर मैं उसी तारीकी में ही घुट के रह जाऊँगा आख़िर

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पुराने बूट हैं तस्में खुले हैं अभी मिट्टी के चेहरे अन-धुले हैं शराबें और मश्कीज़ा सहर का अभी है जिस्म पाकीज़ा गजर का सुते चेहरे पे इस्तेहज़ा का मौसम लहू नब्ज़ों से ख़ाली कर गया है गले में मुल्क के तावीज़ डालो बिदेसी बर्छियों से डर गया है ग़ज़ल दालान में रक्खी है मैं ने महक है संगतरे की क़ाश जैसी ये कैसी मय है जो चक्खी है मैं ने मुझे उश्शाक़ ये कहते हैं 'आमिर' बहुत तन्हा सिसकते दहर में हो! बड़े शाएर हो छोटे शहर में हो फ़रेब-ए-अस्र से मदहोश कमरा निगोड़ी तितलियों से भर गया है समुंदर पिंडुलियों तक आते आते किसी पत्थर की सिल पर मर गया है सलोनी सर्दियों से झाँकते हैं वो अबरू कश्तियों को हाँकते हैं सिलेटी बादलों का ये सहीफ़ा मिरी मुट्ठी में पढ़ता है वज़ीफ़ा मैं रोता हूँ तो रो पड़ते हैं ताइर मिरे हुजरे में कम आते हैं ज़ाएर ये पोरें नूर-बाफ़ी कर रही हैं मोहब्बत को ग़िलाफ़ी कर रही हैं तफ़ाख़ुर में है दो होंटों का ख़म भी अभी रक्खा नहीं मैं ने क़लम भी

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