"मैं कौन हूँ?" मैं वो पानी हूँ जिसे लहरों ने रेत पर फेंक दिया जहाँ से मैं अब वापस नहीं जा सकता मैं वो कप में बची ज़रा सी चाय हूँ जो लोग अक्सर छोड़ देते हैं मैं वो शाख़ हूँ जिस पे फल तो लगते हैं पर खिलने से पहले ही टूट कर गिर जाते हैं मैं नासमझों में ज़रा समझदार हूँ और समझदारों में ज़रा नासमझ मैं दीवार पर टंगा वो कैलेंडर हूँ जिसे इंतिज़ार है कि कोई आएगा और उसे नए महीने में बदलेगा मैं शबनम का वो क़तरा हूँ जो धूल खाए हुए पत्तों को ज़रा भी चमका नहीं पाता और ख़ुद जिसे शम्स की पहली किरण निगल जाती है
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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।
Divya 'Kumar Sahab'
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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो
Rakesh Mahadiuree
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
Faiz Ahmad Faiz
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ज़िंदगी अफ़सुर्दगी से हार जाती है धूप ख़ंजर घोंपती है रोज़ सीने में आहटें जुट जाती हैं सब ख़ून पीने में उठती हैं दहशत-ज़दा लहरें पसीने में तल्ख़ियाँ ही तल्ख़ियाँ होती हैं जीने में हौसला कर के कब इन के पार जाती है ज़िंदगी अफ़सुर्दगी से हार जाती है जिस्म हो जाता है बे-हिस रूह भी बेताब थम से जाते हैं सभी जज़्बातों के सैलाब ख़्वाबों के चेहरों पे पड़ते रहते हैं तेज़ाब टूटते रहते हैं होंठों के गुल-ए-शादाब रफ़्ता-रफ़्ता रौनक़ों को मार जाती है ज़िंदगी अफ़सुर्दगी से हार जाती है सब गुहारें रहती हैं दिल की हिरासत में कट ही जाता है गला आहों का वहशत में वार करती है ज़िहानत दिल पे ख़ल्वत में काँपती है नींद पूरी रात आफ़त में ख़ार से कुछ नक़्स दिल पे वार जाती है ज़िंदगी अफ़सुर्दगी से हार जाती है दर्द दाइम है उमीदों को बताए कौन ख़ाक आँखों में नई आतिश जलाए कौन सदमों की ज़दस सलामत बच के जाए कौन बे-बसी की ये ज़मीं बंजर बनाए कौन मश्क़ ख़ुशबीनी की भी बे-कार जाती है ज़िंदगी अफ़सुर्दगी से हार जाती है
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"एक वीरान मंज़िल" तुम मुझे मंज़िल समझते हो किसी की क्यूँ नहीं फिर देखते हो एक मुद्दत से मेरे दिल पे जमी धूल इक भी नक्श-ए-पा नहीं जिस पे किसी के आश्ना है जो फ़क़त तन्हाई से ही एक पगडंडी सी शायद जिस पे चलना भी हो ज़हमत जाती है जो एक सद में की वबा तक सर-ब-सर गुम है वजूद उस का जहाँ पे और फिर भी तुम मुझे मंज़िल समझते हो किसी की क्यूँ समझते हो तुम ऐसा?
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पुराने बूट हैं तस्में खुले हैं अभी मिट्टी के चेहरे अन-धुले हैं शराबें और मश्कीज़ा सहर का अभी है जिस्म पाकीज़ा गजर का सुते चेहरे पे इस्तेहज़ा का मौसम लहू नब्ज़ों से ख़ाली कर गया है गले में मुल्क के तावीज़ डालो बिदेसी बर्छियों से डर गया है ग़ज़ल दालान में रक्खी है मैं ने महक है संगतरे की क़ाश जैसी ये कैसी मय है जो चक्खी है मैं ने मुझे उश्शाक़ ये कहते हैं 'आमिर' बहुत तन्हा सिसकते दहर में हो! बड़े शाएर हो छोटे शहर में हो फ़रेब-ए-अस्र से मदहोश कमरा निगोड़ी तितलियों से भर गया है समुंदर पिंडुलियों तक आते आते किसी पत्थर की सिल पर मर गया है सलोनी सर्दियों से झाँकते हैं वो अबरू कश्तियों को हाँकते हैं सिलेटी बादलों का ये सहीफ़ा मिरी मुट्ठी में पढ़ता है वज़ीफ़ा मैं रोता हूँ तो रो पड़ते हैं ताइर मिरे हुजरे में कम आते हैं ज़ाएर ये पोरें नूर-बाफ़ी कर रही हैं मोहब्बत को ग़िलाफ़ी कर रही हैं तफ़ाख़ुर में है दो होंटों का ख़म भी अभी रक्खा नहीं मैं ने क़लम भी
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वो चेहरा ग़मज़दा शब में वो चेहरा मेरे दिल के कहकशाँ में यूँँ चमकता है किसी तारे की मानिंद नूर बे-माना नहीं जिस का कहीं से मेरे चेहरे पे चमक है जिस ज़िया से चोट तारीकी को करती है मुसलसल ऐसी तारीकी कि जिस में दफ़्न है मेरी तजस्सुस कोई चेहरा देखने की कोई अपना ढूँढ़ने की पर ये तारा दस्तरस में ही नहीं है रौशनी से इस की कब तक और बहलूँ फिर सवेरा होगा और फिर मैं उसी तारीकी में ही घुट के रह जाऊँगा आख़िर
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"वो वीरान घर" वो घर जो वीरानी में साँस लेता था मैं कभी उसी घर में रहता था जब भी कोई हवा गुलों से ख़ुशबू छीन लाती तो वो घर ख़ूब हँसता था वो तन्हा था कुछ कुछ मेरी तरह उस की आदते भी थीं मेरी तरह आते-जाते मुसाफ़िरों से कुछ कह न पाता था मेरी ही तरह ऐसा लगता था कि किसी ने उस की सदा दाब दी हो लेकिन वो कौन था? अब तो मैं भी परदेस में रहने लगा हूँ ख़ैर, मैं अब उस सेे मिलने भी नहीं जाता तो मुझे पता भी नहीं कि वो कितना अकेला है शायद पास के मैदान से जब बच्चों के शोर मचाने की आवाज़ आती हो तो उस की उम्मीद फिर से जाग जाती हो मगर ये भी कितने दिन चलेगा जल्द ही वो जान जाएगा कि कोई नहीं आने वाला आऍंगी तो सिर्फ़ और सिर्फ़ आवाज़ें वो आवाज़ें जो ख़ुद उसे आबाद करने से डरती हैं
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