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"एक वीरान मंज़िल" तुम मुझे मंज़िल समझते हो किसी की क्यूँ नहीं फिर देखते हो एक मुद्दत से मेरे दिल पे जमी धूल इक भी नक्श-ए-पा नहीं जिस पे किसी के आश्ना है जो फ़क़त तन्हाई से ही एक पगडंडी सी शायद जिस पे चलना भी हो ज़हमत जाती है जो एक सद में की वबा तक सर-ब-सर गुम है वजूद उस का जहाँ पे और फिर भी तुम मुझे मंज़िल समझते हो किसी की क्यूँ समझते हो तुम ऐसा?

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।

Divya 'Kumar Sahab'

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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"मैं कौन हूँ?" मैं वो पानी हूँ जिसे लहरों ने रेत पर फेंक दिया जहाँ से मैं अब वापस नहीं जा सकता मैं वो कप में बची ज़रा सी चाय हूँ जो लोग अक्सर छोड़ देते हैं मैं वो शाख़ हूँ जिस पे फल तो लगते हैं पर खिलने से पहले ही टूट कर गिर जाते हैं मैं नासमझों में ज़रा समझदार हूँ और समझदारों में ज़रा नासमझ मैं दीवार पर टंगा वो कैलेंडर हूँ जिसे इंतिज़ार है कि कोई आएगा और उसे नए महीने में बदलेगा मैं शबनम का वो क़तरा हूँ जो धूल खाए हुए पत्तों को ज़रा भी चमका नहीं पाता और ख़ुद जिसे शम्स की पहली किरण निगल जाती है

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वो चेहरा ग़मज़दा शब में वो चेहरा मेरे दिल के कहकशाँ में यूँँ चमकता है किसी तारे की मानिंद नूर बे-माना नहीं जिस का कहीं से मेरे चेहरे पे चमक है जिस ज़िया से चोट तारीकी को करती है मुसलसल ऐसी तारीकी कि जिस में दफ़्न है मेरी तजस्सुस कोई चेहरा देखने की कोई अपना ढूँढ़ने की पर ये तारा दस्तरस में ही नहीं है रौशनी से इस की कब तक और बहलूँ फिर सवेरा होगा और फिर मैं उसी तारीकी में ही घुट के रह जाऊँगा आख़िर

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ज़िंदगी अफ़सुर्दगी से हार जाती है धूप ख़ंजर घोंपती है रोज़ सीने में आहटें जुट जाती हैं सब ख़ून पीने में उठती हैं दहशत-ज़दा लहरें पसीने में तल्ख़ियाँ ही तल्ख़ियाँ होती हैं जीने में हौसला कर के कब इन के पार जाती है ज़िंदगी अफ़सुर्दगी से हार जाती है जिस्म हो जाता है बे-हिस रूह भी बेताब थम से जाते हैं सभी जज़्बातों के सैलाब ख़्वाबों के चेहरों पे पड़ते रहते हैं तेज़ाब टूटते रहते हैं होंठों के गुल-ए-शादाब रफ़्ता-रफ़्ता रौनक़ों को मार जाती है ज़िंदगी अफ़सुर्दगी से हार जाती है सब गुहारें रहती हैं दिल की हिरासत में कट ही जाता है गला आहों का वहशत में वार करती है ज़िहानत दिल पे ख़ल्वत में काँपती है नींद पूरी रात आफ़त में ख़ार से कुछ नक़्स दिल पे वार जाती है ज़िंदगी अफ़सुर्दगी से हार जाती है दर्द दाइम है उमीदों को बताए कौन ख़ाक आँखों में नई आतिश जलाए कौन सदमों की ज़दस सलामत बच के जाए कौन बे-बसी की ये ज़मीं बंजर बनाए कौन मश्क़ ख़ुशबीनी की भी बे-कार जाती है ज़िंदगी अफ़सुर्दगी से हार जाती है

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पुराने बूट हैं तस्में खुले हैं अभी मिट्टी के चेहरे अन-धुले हैं शराबें और मश्कीज़ा सहर का अभी है जिस्म पाकीज़ा गजर का सुते चेहरे पे इस्तेहज़ा का मौसम लहू नब्ज़ों से ख़ाली कर गया है गले में मुल्क के तावीज़ डालो बिदेसी बर्छियों से डर गया है ग़ज़ल दालान में रक्खी है मैं ने महक है संगतरे की क़ाश जैसी ये कैसी मय है जो चक्खी है मैं ने मुझे उश्शाक़ ये कहते हैं 'आमिर' बहुत तन्हा सिसकते दहर में हो! बड़े शाएर हो छोटे शहर में हो फ़रेब-ए-अस्र से मदहोश कमरा निगोड़ी तितलियों से भर गया है समुंदर पिंडुलियों तक आते आते किसी पत्थर की सिल पर मर गया है सलोनी सर्दियों से झाँकते हैं वो अबरू कश्तियों को हाँकते हैं सिलेटी बादलों का ये सहीफ़ा मिरी मुट्ठी में पढ़ता है वज़ीफ़ा मैं रोता हूँ तो रो पड़ते हैं ताइर मिरे हुजरे में कम आते हैं ज़ाएर ये पोरें नूर-बाफ़ी कर रही हैं मोहब्बत को ग़िलाफ़ी कर रही हैं तफ़ाख़ुर में है दो होंटों का ख़म भी अभी रक्खा नहीं मैं ने क़लम भी

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अपनी आँखों में ख़मिस्तान-ए-मय-ए-नाब लिए अपने आरिज़ पे बहार-ए-गुल-ए-शादाब लिए अपने माथे पे दरख़शानी-ए-महताब लिए निकहत-ओ-रंग लिए नूर का सैलाब लिए ईद आई है मोहब्बत का नया बाब लिए ज़ुल्फ़ बिखरी है कि रहमत की घटा छाई है जिस तरफ़ देखिए रा'नाई ही रा'नाई है रहगुज़र काहकशाँ बन के निखर आई है ज़र्रा ज़र्रा है जमाल-ए-दुर-ए-ख़ुश-आब लिए ईद आई है मोहब्बत का नया बाब लिए ख़ारज़ारों पे गुलिस्ताँ का गुमाँ है इमरोज़ शिकवा-ए-जौर किसी लब पे कहाँ है इमरोज़ मुल्तफ़ित चश्म-ए-हसीनान-ए-जहाँ है इमरोज़ कितने तस्लीम लिए कितने ही आदाब लिए ईद आई है मोहब्बत का नया बाब लिए किस क़दर रहमत-ए-साक़ी-ए-अज़ल आम है आज रक़्स-ए-पैमाना लिए गर्दिश-ए-अय्याम है आज बादा-ए-कैफ़ से लबरेज़ हर इक जाम है आज इशरत-ए-रूह ओ सुकून-ए-दिल-ए-बेताब लिए ईद आई है मोहब्बत का नया बाब लिए दोश-ए-गीती पे परेशाँ हुई फिर ज़ुल्फ़-ए-शमीम लड़खड़ाती हुई फिरती है गुलिस्ताँ में नसीम फिर ज़मीं बन गई ग़ैरत-दह-ए-गुलज़ार-ए-नईम ख़ाक है तख़्ता-ए-गुल बिस्तर-ए-संजाब लिए ईद आई है मोहब्बत का नया बाब लिए ज़िंदगी रंज-ओ-अलम भूल गई है ऐ दोस्त महफ़िल-ए-ज़ीस्त ब-सद-शौक़ सजी है ऐ दोस्त इश्क़ बेगाना-ए-आशुफ़्ता-सरी है ऐ दोस्त हुस्न है पैरहन-ए-अतलस-ओ-कमख़्वाब लिए ईद आई है मोहब्बत का नया बाब लिए दर्द-ए-हस्ती की दवा कर लें ख़ुलूस-ए-दिल से आओ इक फ़र्ज़ अदा कर लें ख़ुलूस-ए-दिल से आओ तजदीद-ए-वफ़ा कर लें ख़ुलूस-ए-दिल से जज़्बा-ओ-शौक़-ए-हम-आहंगी-ए-अहबाब लिए ईद आई है मोहब्बत का नया बाब लिए

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