"वो वीरान घर" वो घर जो वीरानी में साँस लेता था मैं कभी उसी घर में रहता था जब भी कोई हवा गुलों से ख़ुशबू छीन लाती तो वो घर ख़ूब हँसता था वो तन्हा था कुछ कुछ मेरी तरह उस की आदते भी थीं मेरी तरह आते-जाते मुसाफ़िरों से कुछ कह न पाता था मेरी ही तरह ऐसा लगता था कि किसी ने उस की सदा दाब दी हो लेकिन वो कौन था? अब तो मैं भी परदेस में रहने लगा हूँ ख़ैर, मैं अब उस सेे मिलने भी नहीं जाता तो मुझे पता भी नहीं कि वो कितना अकेला है शायद पास के मैदान से जब बच्चों के शोर मचाने की आवाज़ आती हो तो उस की उम्मीद फिर से जाग जाती हो मगर ये भी कितने दिन चलेगा जल्द ही वो जान जाएगा कि कोई नहीं आने वाला आऍंगी तो सिर्फ़ और सिर्फ़ आवाज़ें वो आवाज़ें जो ख़ुद उसे आबाद करने से डरती हैं
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
Faiz Ahmad Faiz
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं
Tehzeeb Hafi
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"कच्ची उम्र के प्यार" ये कच्ची उम्र के प्यार भी बड़े पक्के निशान देते हैं आज पर कम ध्यान देते हैं बहके बहके बयान देते हैं उन को देखे हुए मुद्दत हुई और हम, अब भी जान देते हैं क्या प्यार एक बार होता है नहीं! ये बार-बार होता है तो फिर क्यूँ किसी एक का इंतिज़ार होता है वही तो सच्चा प्यार होता है अच्छा! प्यार भी क्या इंसान होता है? कभी सच्चा कभी झूठा बे-ईमान होता है उस की रगों में भी क्या ख़ानदान होता है और मक़्सद-ए-हयात नफ़ा नुक़्सान होता है प्यार तो प्यार होता है
Yasra rizvi
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ज़िंदगी अफ़सुर्दगी से हार जाती है धूप ख़ंजर घोंपती है रोज़ सीने में आहटें जुट जाती हैं सब ख़ून पीने में उठती हैं दहशत-ज़दा लहरें पसीने में तल्ख़ियाँ ही तल्ख़ियाँ होती हैं जीने में हौसला कर के कब इन के पार जाती है ज़िंदगी अफ़सुर्दगी से हार जाती है जिस्म हो जाता है बे-हिस रूह भी बेताब थम से जाते हैं सभी जज़्बातों के सैलाब ख़्वाबों के चेहरों पे पड़ते रहते हैं तेज़ाब टूटते रहते हैं होंठों के गुल-ए-शादाब रफ़्ता-रफ़्ता रौनक़ों को मार जाती है ज़िंदगी अफ़सुर्दगी से हार जाती है सब गुहारें रहती हैं दिल की हिरासत में कट ही जाता है गला आहों का वहशत में वार करती है ज़िहानत दिल पे ख़ल्वत में काँपती है नींद पूरी रात आफ़त में ख़ार से कुछ नक़्स दिल पे वार जाती है ज़िंदगी अफ़सुर्दगी से हार जाती है दर्द दाइम है उमीदों को बताए कौन ख़ाक आँखों में नई आतिश जलाए कौन सदमों की ज़दस सलामत बच के जाए कौन बे-बसी की ये ज़मीं बंजर बनाए कौन मश्क़ ख़ुशबीनी की भी बे-कार जाती है ज़िंदगी अफ़सुर्दगी से हार जाती है
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"एक वीरान मंज़िल" तुम मुझे मंज़िल समझते हो किसी की क्यूँ नहीं फिर देखते हो एक मुद्दत से मेरे दिल पे जमी धूल इक भी नक्श-ए-पा नहीं जिस पे किसी के आश्ना है जो फ़क़त तन्हाई से ही एक पगडंडी सी शायद जिस पे चलना भी हो ज़हमत जाती है जो एक सद में की वबा तक सर-ब-सर गुम है वजूद उस का जहाँ पे और फिर भी तुम मुझे मंज़िल समझते हो किसी की क्यूँ समझते हो तुम ऐसा?
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"मैं कौन हूँ?" मैं वो पानी हूँ जिसे लहरों ने रेत पर फेंक दिया जहाँ से मैं अब वापस नहीं जा सकता मैं वो कप में बची ज़रा सी चाय हूँ जो लोग अक्सर छोड़ देते हैं मैं वो शाख़ हूँ जिस पे फल तो लगते हैं पर खिलने से पहले ही टूट कर गिर जाते हैं मैं नासमझों में ज़रा समझदार हूँ और समझदारों में ज़रा नासमझ मैं दीवार पर टंगा वो कैलेंडर हूँ जिसे इंतिज़ार है कि कोई आएगा और उसे नए महीने में बदलेगा मैं शबनम का वो क़तरा हूँ जो धूल खाए हुए पत्तों को ज़रा भी चमका नहीं पाता और ख़ुद जिसे शम्स की पहली किरण निगल जाती है
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पुराने बूट हैं तस्में खुले हैं अभी मिट्टी के चेहरे अन-धुले हैं शराबें और मश्कीज़ा सहर का अभी है जिस्म पाकीज़ा गजर का सुते चेहरे पे इस्तेहज़ा का मौसम लहू नब्ज़ों से ख़ाली कर गया है गले में मुल्क के तावीज़ डालो बिदेसी बर्छियों से डर गया है ग़ज़ल दालान में रक्खी है मैं ने महक है संगतरे की क़ाश जैसी ये कैसी मय है जो चक्खी है मैं ने मुझे उश्शाक़ ये कहते हैं 'आमिर' बहुत तन्हा सिसकते दहर में हो! बड़े शाएर हो छोटे शहर में हो फ़रेब-ए-अस्र से मदहोश कमरा निगोड़ी तितलियों से भर गया है समुंदर पिंडुलियों तक आते आते किसी पत्थर की सिल पर मर गया है सलोनी सर्दियों से झाँकते हैं वो अबरू कश्तियों को हाँकते हैं सिलेटी बादलों का ये सहीफ़ा मिरी मुट्ठी में पढ़ता है वज़ीफ़ा मैं रोता हूँ तो रो पड़ते हैं ताइर मिरे हुजरे में कम आते हैं ज़ाएर ये पोरें नूर-बाफ़ी कर रही हैं मोहब्बत को ग़िलाफ़ी कर रही हैं तफ़ाख़ुर में है दो होंटों का ख़म भी अभी रक्खा नहीं मैं ने क़लम भी
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वो चेहरा ग़मज़दा शब में वो चेहरा मेरे दिल के कहकशाँ में यूँँ चमकता है किसी तारे की मानिंद नूर बे-माना नहीं जिस का कहीं से मेरे चेहरे पे चमक है जिस ज़िया से चोट तारीकी को करती है मुसलसल ऐसी तारीकी कि जिस में दफ़्न है मेरी तजस्सुस कोई चेहरा देखने की कोई अपना ढूँढ़ने की पर ये तारा दस्तरस में ही नहीं है रौशनी से इस की कब तक और बहलूँ फिर सवेरा होगा और फिर मैं उसी तारीकी में ही घुट के रह जाऊँगा आख़िर
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