"संदूकची के ख़त" कई बरसों से वो खिड़की जो तेरे आँगन में खुलती थी पड़ी थी बंद सुब्ह ही झाड़-पोंछ के खोली है क्या है कल रात तुम सपने में आए थे वहीं आँगन में कुर्सी डाले नीम के नीचे शायद कुछ लिख रहे थे तुम या फिर धुँधली पड़ गई यादों को संजो रहे होगे के जैसे मैं ने अब तक वो सारी पतंगें सहेज कर रखीं जो कट कर तुम्हारे घर से मेरी छत पर चली आती थी वो दुपट्टा भी अभी तक मैं ने रखा है बा'द छुप के तुम सेे मिलने के कहीं काँटों में फँस कर फट गया था जो उन्हीं काटों में लगता है मेरा मन भी उलझ कर कट गया सा है मालूम है अब मैं छत पर भी नहीं जाती जहाँ तपती दुपहरी भी नहीं मालूम पड़ती थी नहीं ये पहला ख़त नहीं लिखा तेरे जाने के बा'द मेरी संदूकची में सैकड़ों ख़त ऐसे रखे हैं नहीं ये आख़िरी ख़त भी नहीं है हाँ पता इस में भी संदूकची का ही है
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"तुम हो" तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो मैं होश में बाहोश में मिरे जिस्म का तुम ख़ून हो तुम सर्द हो बरसात भी मिरी गर्मियों की तुम जून हो तुम ग़ज़ल हो हो तुम शा'इरी मिरी लिखी नज़्म की धुन हो मिरी हँसी भी तुम मिरी ख़ुशी भी तुम मिरे इस हयात की मम्नून हो तुम धूप हो मिरी छाँव भी तुम सियाह रात का मून हो तुम सिन हो तुम काफ़ भी तुम वाओ के बा'द की नून हो तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो
ZafarAli Memon
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"तो क्या बात होती" कभी सोचता हूँ ये क्यूँँकर हुआ अगर ये न होता तो क्या बात होती ये अफ़साना हम ने जो मिल के लिखा था ये ऐसा ही होता या कुछ और पेंच होते ये किरदार जो हैं क्या उस वक़्त होते अगर हम न मिलते तो क्या हम ही रहते आँखों में सागर दिलों में कसक या होंठों पे जबरन की मुस्कान होती कहानी हमारी कहाँ ले के आई नज़रें चुराना अभी तक है जारी ज़माने से नज़रें चुराते थे तब हम के न पढ़ ले इन में मुहब्बत तुम्हारी फिर तुम से नज़रें चुराने लगे हम के ना देख पाओ समुंदर हमारे अब ख़ुदस नज़रें चुराने लगे हैं कई यादें अक्सर दामन में गिरतीं मुझे घेर लेतीं सवालों के नेज़े दिल चाक करते मैं चुप-चाप रहता कहता भी क्या मैं कहता तो कहता सवालों की गठरी मेरे पास भी है जवाबों के मौसम मगर लद चले हैं इसी कशमकश में मैं फिर सोचता हूँ अगर ये न होता तो क्या बात होती
Irfan Ahmed Khan
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"कशमकश" तुम्हीं बताओ हम क्या करें अब तुम्हीं बताओ अब क्या अमल होगा तुम्हीं ने तो हम को भँवर में फंँसाया लहरों के तुम ने हवाले किया है बहुत तेज़ तूफ़ांँ थपेड़े बहुत हैं कश्ती हमारी लगे है कि मानो ये अब डूबती है ये अब डूबती है
Irfan Ahmed Khan
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"निफ़ाक़" आईना जो भी कहता है झूठ को सच नहीं करता आईने के हज़ार टुकड़े हों फिर भी मंज़र वही रहता आईना गर मुअय्यन हो सबके लिए बराबर हो एक को मर्तबे मनसब एक को जेल की दीवारें हों
Irfan Ahmed Khan
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"15 अगस्त" ये वही दिन है जब अहद उठाया हम ने ख़ून से सींच के जो पाई थी हम ने आज़ादी साथ मिल सच्चे माने में उसे अपना बनाएँगे मैं तुम्हारे, तुम मेरे लिए आवाज़ उठाओगे आज के बा'द गद्दीनशीं न हुक्मरां होंगे अब कोई छोटा और न कोई बड़ा होगा अब कोई सिख, हिन्दू न मुसलमां होगा अब न भूख और प्यास से मौतें होंगी अब न कोई अमीर कोई ग़ुलाम होगा फिर न जाने ये किस राह चले आए हम ये वो हिंदुस्तान नहीं जिस के लिए क़ुर्बानी दीं आओ सब मिल आज ये अहद करें हाथ में हाथ लिए फिर से वही अपनी नस्लों के बेहतर कल के लिए फिर से सपनों का हिंदुस्तान बनाना है हमें
Irfan Ahmed Khan
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"ग़लती" कहते थे वो के प्यार दिलोजान से किया मीलों और बरसों के फासले तमाम करने की क़स में भी खाईं और वा'दा भी लिया लेकिन ये क्या अदा थी हम जान ना सके वक़्ते विसाल आया तो बोल वो पड़े ग़लती थी हम सेे हो गई अब सुधार लें ज़रा
Irfan Ahmed Khan
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