मुख़्तलिफ़ मौज़ूआत पर रात भर बातें कर के वो लोग थक चुके थे और फिर ऐसे वा'दों में बंध गए थे जिस का पूरा होना मुमकिन न था क्यूँँकि कुछ लम्हों बा'द वो सब अपना अपना सामान उठाए मुख़्तलिफ़ रास्तों पर चल पड़े थे और स्टेशन पर सन्नाटा था
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"कब" कब ये पेड़ हरे होंगे फिर से कब ये कलियाँ फूटेंगी और ये फूल हसेंगे कब ये झरने अपनी प्यास भरेंगे कब ये नदियाँ शोर मचाएँगी कब ये आज़ाद किए जाएँगे सब पंछी कब जंगल साँसे लेंगे कब सब जाएँगे अपने घर कब हाथों से ज़ंजीरें खोली जाएँगी कब हम ऐसों को पूछेगा कोई और ये फ़क़ीरों को भी क़िस्से में लाया जाएगा कब इन काँटों की भी क़ीमत होगी और मिट्टी सोने के भाव में आएगी कब लोगों की ग़लती टाली जाएगी कब ये हवाएँ पायल पहने झूमेगी कब अंबर से परियाँ उतरेंगी कब पत्थरों से भी ख़ुशबू आएगी कब हंसों के जोड़ें नदियों पे बैठेंगे बरखा गीत बनाएगी और मोर उठा के पर कत्थक करते देखे जाएँगे नीलकमल पानी से इश्क़ लड़ाएंगे मछलियाँ ख़ुशी के गोते मारेंगी कब कोयल की कूक सुनाई देगी कब भॅंवरे फिर गुन- गुन करते लौटेंगे बागों में और कब ये प्यारी तितलियाँ कलर फेकेंगी फिर सब कुछ डूबा होगा रंगों में कब ये दुनिया रौशन होगी कब ये जुगनू अपने रंग में आएँगे कब ये सब मुमकिन है कब सबके ही सपने पूरे होंगे कब अपने मन के मुताबिक़ होगा सब कुछ कब ये बहारें लोटेंगी कब वो तारीख़ आएगी बस मुझ को ही नहीं सब को इंतिज़ार है तेरे ' बर्थडे ' का
BR SUDHAKAR
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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सदाक़त-ए-इश्क़ इश्क़ की तुम हक़ीक़त समझ लो इस को ग़म से गुज़रना पड़ेगा उन की यादों में मसरूफ़ हो तुम उन की यादों में रहना पड़ेगा दर्द-ए-दिल अपना तुझ को सुनाऊँ जी तो करता है तुझ को सुनाऊँ तेरी आँखों से कह देंगी आँसू अब मुझे भी निकलना पड़ेगा अपने भी रूठ जाएँगे तेरे रिश्ते भी छूट जाएँगे तेरे लोग तुझ को कहेंगे निकम्मा ऐसा लम्हा भी सहना पड़ेगा तू भरोसा भी करता है जिस पे बे-वजह होगा नाराज़ तुझ से होता अक्सर यहाँ ऐसा आशिक़ इश्क़ से हाँ मुकरना पड़ेगा वो तुझे भूल जाएँगे ऐसे जाने ज़िंदा रहेगा तू कैसे मशवरा बस यही देगा 'दानिश' अलविदा तुझ को कहना पड़ेगा
Danish Balliavi
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई
Kaifi Azmi
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आग के शो'ले उतारो हल्क़ में गाड़ दो कीलें धड़कती छातियों में डाल दो गर्दन में फंदे रस्सियों के क़त्ल कर लो ख़ून की नदियाँ बहा लो हो निहत्ता कोई तो गोली चला लो फिर भी हो कोई कसर तो पूरी कर लो जीत का एलान कर दो फिर भी तुम डरते रहोगे और हर युग में तुम्हारी हार ही होती रहेगी फिर भी तुम चेहरे बदल कर हर ज़माने में रहोगे और सदियों तक यही इक सिलसिला चलता रहेगा
Aabid Adeeb
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वो जिद्द-ओ-जहद करना चाहता था मगर जब से उस ने अपने झोंपड़े को पुख़्ता मकान में बदलने का ख़्वाब देखा था वो कई दाइमी बीमारियों में मुब्तला हो चुका था
Aabid Adeeb
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यहाँ तो न पेड़ है न साया न घर है न घर में रहने वाले न ज़िंदगी है न कोई हलचल यहाँ तो ता-हद्द-ए-नज़र धूप ही धूप है रेत ही रेत है धूप ही धूप है तन को झुलसाती धूप आग बरसाती धूप धूल उड़ाती धूप रेत उड़ाती एक दम पराई धूप
Aabid Adeeb
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आरज़ुओं को वुसअ'त न दो अपने ही दाएरे में मुक़य्यद करो वर्ना ये फैल कर हर तरफ़ से तुम्हें घेर लेंगी नोच डालेंगी ज़ख़्मी करेंगी ख़ुद बिखर जाएँगे मर जाएँगे अपनी ही लाश सर पर उठाए बीच बाज़ार नंगे फिरोगे अपने ही लोग नज़दीक आ कर तुम को देखेंगे मुँह फेर लेंगे तुम को ग़लती का एहसास होगा थूक निगलोगे कड़वा लगेगा रात वीरान बे कैफ़ होगी दिन पहाड़ों सा भारी लगेगा आरज़ूओं को वुसअ'त न दो अपने ही दाएरे में मुक़य्यद करो वर्ना ये फैल कर हर तरफ़ से तुम्हें घेर लेंगी
Aabid Adeeb
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कोई मेरे लरज़ते हाथ में काग़ज़ का पुर्ज़ा और क़लम पकड़ा रहा था कभी कुछ ज़ेर-ए-लब ही बड़बड़ा कर कोई इसबात में आँखों की और माथे की जुम्बिश चाहता था कभी दाँतों में होंटों को दबा कर कोई रोने की कोशिश कर रहा था कोई तो चंद लम्हों बा'द अपने बाल बिखराने गरेबाँ नोचने की फ़िक्र में था कोई ग़मगीं चेहरा और सियाह मल्बूस में बेहद हसीं मा'लूम देता था मेरे अज्दाद के नामों को गँवा कर कोई मुझ से तअ'ल्लुक़ जोड़ता था सभी नज़दीक थे मेरे उधर भाई भतीजे थे उधर बहनें थीं भांजे थे फिर उन के बा'द रिश्ते जोड़ने वाले सफ़-आरा थे ये लगता था कि कुछ ही देर में मातम बपा होगा मैं उन बातों से बिस्तर पर पड़ा आँखों को थोड़ी सी खुली रख कर बड़े दिलचस्प मूड में था सभी ग़मगीन थे लेकिन तमन्नाएँ थीं आँखों में यकायक मैं ने करवट ली और आँखें खोल कर उठने की कोशिश की तो देखा सभी के लब पे मसनूई हँसी थी चमक आँखों से ग़ाएब थी
Aabid Adeeb
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