nazmKuch Alfaaz

अज़ीज़ माँ मिरी हँसमुख मिरी बहादुर माँ तमाम जौहर-ए-फ़ितरत जगा दिए तू ने मोहब्बत अपने चमन से गुलों से ख़ारों से मोहब्बतों के ख़ज़ाने लुटा दिए तू ने बना बना के मिटाए गए नुक़ूश-ए-अमल तिरे बग़ैर मुकम्मल न हो सकी तस्वीर वो ख़्वाब झांसी की रानी को जिस ने चौंकाया तिरा जिहाद-ए-मुसलसल उसी की है ता'बीर उसे हयात का सोला सिंगार कहते हैं तिरी जबीं पे हैं कुछ सिलवटें भी टीका भी नज़र में जज़्ब-ए-यक़ीं दिल में सोज़-ए-आज़ादी दहकता फूल भी है तू महकता शो'ला भी ज़रा ज़मीन को मेहवर पे घूम लेने दे समाज तुझ से तिरा सोज़-ओ-साज़ मांगेगी जमाल सीखेगा ख़ुद-ए'तिमादियाँ तुझ से हयात-ए-नौ तिरे दिल का गुदाज़ मांगेगी

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"ख़त" तुम को ये बताना था या फिर ये समझाना था दिल की बस ये चाहत थी बस तुम पर प्यार लुटाना था तुम को ये बताना था था छेड़ना तुम को थोड़ा थोड़ा तुम्हें सताना था जो रूठ जाते तुम मुझ सेे हाँ मुझ को तुम्हें मनाना था फिर तुम को गले लगाना था तुम को ये बताना था लड़ के भी तुम सोते तो तुम्हारा सिर सहलाना था मक़्सद सिर्फ़ एक था तुम्हारा प्यार कमाना था सारी दुनिया मिट्टी है तुम्हारा साथ ख़ज़ाना था तुम को ये बताना था मिलने तुम सेे आना था या फिर तुम्हें बुलाना था माँग तुम्हारी भरनी थी अपना तुम्हें बनाना था तुम्हारा ही कहलाना था तुम को ये बताना था इस जीवन का हर मंज़र तुम्हारे साथ बिताना था हर फेरे का हर वा'दा तुम्हारे साथ निभाना था मंगलसूत्र इन हाथों से तुम को ही पहनाना था तुम को ये बताना था फ़ासले जितने भी थे उन को मुझे मिटाना था उस ख़ुदा से हर जन्म में तुम्हारा साथ लिखाना था फिर बारात तुम्हारी चौखट पर तुम सेे ही ब्याह रचाना था तुम को ये बताना था बिन बोले बस चुपके से गजरा तुम्हें दिलाना था बनाता मैं एक दिन खाना फिर खाना तुम्हें खिलाना था तुम्हारे हाथों से खाना मुझ को भी तो खाना था तुम को ये बताना था खो दिया तुम को मैं ने ये दुख अब मुझे मनाना था डूब जाता आसमान बस आँसू मुझे बहाना था फिर लिख दिया मैं ने आँसू बस इतना मेरा फ़साना था तुम को ये बताना था बस तुम को ये बताना था

Divya 'Kumar Sahab'

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"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती

Abrar Kashif

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ये किस तरह याद आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो कि जैसे सच-मुच निगाह के सामने खड़ी मुस्कुरा रही हो ये जिस्म-ए-नाज़ुक, ये नर्म बाहें, हसीन गर्दन, सिडौल बाज़ू शगुफ़्ता चेहरा, सलोनी रंगत, घनेरा जूड़ा, सियाह गेसू नशीली आँखें, रसीली चितवन, दराज़ पलकें, महीन अबरू तमाम शोख़ी, तमाम बिजली, तमाम मस्ती, तमाम जादू हज़ारों जादू जगा रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो गुलाबी लब, मुस्कुराते आरिज़, जबीं कुशादा, बुलंद क़ामत निगाह में बिजलियों की झिल-मिल, अदाओं में शबनमी लताफ़त धड़कता सीना, महकती साँसें, नवा में रस, अँखड़ियों में अमृत हमा हलावत, हमा मलाहत, हमा तरन्नुम, हमा नज़ाकत लचक लचक गुनगुना रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो तो क्या मुझे तुम जला ही लोगी गले से अपने लगा ही लोगी जो फूल जूड़े से गिर पड़ा है तड़प के उस को उठा ही लोगी भड़कते शोलों, कड़कती बिजली से मेरा ख़िर्मन बचा ही लोगी घनेरी ज़ुल्फ़ों की छाँव में मुस्कुरा के मुझ को छुपा ही लोगी कि आज तक आज़मा रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो नहीं मोहब्बत की कोई क़ीमत जो कोई क़ीमत अदा करोगी वफ़ा की फ़ुर्सत न देगी दुनिया हज़ार अज़्म-ए-वफ़ा करोगी मुझे बहलने दो रंज-ओ-ग़म से सहारे कब तक दिया करोगी जुनूँ को इतना न गुदगुदाओ, पकड़ लूँ दामन तो क्या करोगी क़रीब बढ़ती ही आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो

Kaifi Azmi

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मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी मुझ को रातों की सियाही के सिवा कुछ न मिला मैं वो नग़्मा हूँ जिसे प्यार की महफ़िल न मिली वो मुसाफ़िर हूँ जिसे कोई भी मंज़िल न मिली ज़ख़्म पाए हैं बहारों की तमन्ना की थी मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी किसी गेसू किसी आंचल का सहारा भी नहीं रास्ते में कोई धुंदला सा सितारा भी नहीं मेरी नज़रों ने नज़ारों की तमन्ना की थी मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी दिल में नाकाम उमीदों के बसेरे पाए रौशनी लेने को निकला तो अंधेरे पाए रंग और नूर के धारों की तमन्ना की थी मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी मेरी राहों से जुदा हो गईं राहें उन की आज बदली नज़र आती हैं निगाहें उन की जिन से इस दिल ने सहारों की तमन्ना की थी मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी प्यार माँगा तो सिसकते हुए अरमान मिले चैन चाहा तो उमडते हुए तूफ़ान मिले डूबते दिल ने किनारों की तमन्ना की थी मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी

Sahir Ludhianvi

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"तशवीश" मुझ को ये डर है कि शायद ये सब कुछ सच हो जाएगा आज का दिन निकला है जैसे यूँँॅं कल का भी निकल जाएगा फिर धीरे-धीरे क्या होगा मेरी सालों की मेहनत पर ये क़िस्मत पानी फेरेगी मैं अल्हड़-पन से निकलूॅंगा और ज़िम्मेदारी घेरेगी कॉलेज ख़त्म हो जाएगा फिर नौकरी करूँॅंगा मैं और दस पंद्रह हज़ार के ख़ातिर दिन और रात मरूॅंगा मैं दिन दफ़्तर में जाएगा और रात ख़यालों में जाएगी फिर इस सोच में दिन निकलेंगे अपनी बारी आएगी मगर नहीं आएगी इक इतवार ज़रूर आएगा छह दिन बा'द कहीं जा कर के एक महीने की तनख़्वाह इक हफ़्ते में ख़त्म फिर दूर-दूर तक नहीं दिखेंगे नाज़ ग़ज़ल और नज़्म शौक़ दबाता जाऊॅंगा फ़र्ज़ निभाता जाऊॅंगा फिर धीरे-धीरे क्या होगा शादी की बातें होंगी दिन दफ़्तर में जाएगा साथ किसी के रातें होंगी जो शाख-ए-उम्मीद पकड़ के बैठा हूँ ये भी इक दिन जल जाएगी फिर धीरे-धीरे क्या होगा नाज़ जवानी ढल जाएगी मुझ को कुछ करना था मुझ को कुछ बनना था मगर नहीं कर पाया मैं बाक़ी सब तो कर लेंगे कुछ अपना ही रह जाएगा ये दुनिया घूमने का सपना सपना ही रह जाएगा फिर हर रोज़ पशेमाँ हो के मैं बीती बातें सोचूॅंगा और ख़ुद को कोसूॅंगा ये भी किया जा सकता था वो भी किया जा सकता था यूँँॅं ज़िन्दगी गुज़ार दी है खुल के जिया जा सकता था और फिर अपनी नज़्म पढूॅंगा उम्र निकलती जाएगी मौत का ख़ौफ़ रहेगा फिर धीरे-धीरे क्या होगा इक दिन इन सब से तंग आके मैं शायद ख़ुद-कुशी करूँॅंगा शे'र लिखा होगा दीवार-ओ-दर पर एक बहुत अच्छा सा लगता है हर रोज़ यही इक ऐसा दिन भी आएगा मुझ को ये डर है कि शायद ये सब कुछ सच हो जाएगा

Naaz ishq

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नुक़ूश-ए-हसरत मिटा के उठना, ख़ुशी का परचम उड़ा के उठना मिला के सर बैठना मुबारक तराना-ए-फ़त्ह गा के उठना ये गुफ़्तुगू गुफ़्तुगू नहीं है बिगड़ने बनने का मरहला है धड़क रहा है फ़ज़ा का सीना कि ज़िंदगी का मुआमला है ख़िज़ाँ रहे या बहार आए तुम्हारे हाथों में फ़ैसला है न चैन बे-ताब बिजलियों को न मुतमइन कारवान-ए-शबनम कभी शगूफ़ों के गर्म तेवर कभी गुलों का मिज़ाज बरहम शगूफ़ा ओ गुल के इस तसादुम में गुल्सिताँ बन गया जहन्नम सजा लें सब अपनी अपनी जन्नत अब ऐसे ख़ाके बना के उठना ख़ज़ाना-ए-रंग-ओ-नूर तारीक रहगुज़ारों में लुट रहा है उरूस-ए-गुल का ग़ुरूर-ए-इस्मत सियाहकारों में लुट रहा है तमाम सरमाया-ए-लताफ़त ज़लील ख़ारों में लुट रहा है घुटी घुटी हैं नुमू की साँसें छुटी छुटी नब्ज़-ए-गुलिस्ताँ है हैं गुरसना फूल, तिश्ना ग़ुंचे, रुख़ों पे ज़र्दी लबों पे जाँ है असीर हैं हम-सफ़ीर जब से ख़िज़ाँ चमन में रवाँ-दवाँ है इस इंतिशार-ए-चमन की सौगंद बाब-ए-ज़िंदाँ हिला के उठना हयात-ए-गीती की आज बदली हुई निगाहें हैं इंक़िलाबी उफ़ुक़ से किरनें उतर रही हैं बिखेरती नूर-ए-कामयाबी नई सहर चाहती है ख़्वाबों की बज़्म में इज़्न-ए-बारयाबी ये तीरगी का हुजूम कब तक ये यास का अज़दहाम कब तक निफ़ाक़ ओ ग़फ़लत की आड़ ले कर जियेगा मुर्दा निज़ाम कब तक रहेंगे हिन्दी असीर कब तक रहेगा भारत ग़ुलाम कब तक गले का तौक़ आ रहे क़दम पर कुछ इस तरह तिलमिला के उठना

Kaifi Azmi

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मैं ये सोच कर उस के दर से उठा था कि वो रोक लेगी मना लेगी मुझ को हवाओं में लहराता आता था दामन कि दामन पकड़ कर बिठा लेगी मुझ को क़दम ऐसे अंदाज़ से उठ रहे थे कि आवाज़ दे कर बुला लेगी मुझ को मगर उस ने रोका न मुझ को मनाया न दामन ही पकड़ा न मुझ को बिठाया न आवाज़ ही दी न मुझ को बुलाया मैं आहिस्ता आहिस्ता बढ़ता ही आया यहाँ तक कि उस से जुदा हो गया मैं

Kaifi Azmi

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ऐ हमा-रंग हमा-नूर हमा-सोज़-ओ-गुदाज़ बज़्म-ए-महताब से आने की ज़रूरत क्या थी तू जहाँ थी उसी जन्नत में निखरता तिरा रूप इस जहन्नम को बसाने की ज़रूरत क्या थी ये ख़द-ओ-ख़ाल ये ख़्वाबों से तराशा हुआ जिस्म और दिल जिस पे ख़द-ओ-ख़ाल की नर्मी भी निसार ख़ार ही ख़ार शरारे ही शरारे हैं यहाँ और थम थम के उठा पाँव बहारों की बहार तिश्नगी ज़हर भी पी जाती है अमृत की तरह जाने किस जाम पे रुक जाए निगाह-ए-मासूम डूबते देखा है जिन आँखों में मय-ख़ाना भी प्यास उन आँखों की बुझे या न बुझे क्या मालूम हैं सभी हुस्न-परस्त अहल-ए-नज़र साहिब-ए-दिल कोई घर में कोई महफ़िल में सजाएगा तुझे तू फ़क़त जिस्म नहीं शे'र भी है गीत भी है कौन अश्कों की घनी छाँव में गाएगा तुझे तुझ से इक दर्द का रिश्ता भी है बस प्यार नहीं अपने आँचल पे मुझे अश्क बहा लेने दे तू जहाँ जाती है जा, रोकने वाला मैं कौन अपने रस्ते में मगर शम्अ' जला लेने दे

Kaifi Azmi

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ये बरसात ये मौसम-ए-शादमानी ख़स-ओ-ख़ार पर फट पड़ी है जवानी भड़कता है रह रह के सोज़-ए-मोहब्बत झमाझम बरसता है पुर-शोर पानी फ़ज़ा झूमती है घटा झूमती है दरख़्तों को ज़ौ बर्क़ की चूमती है थिरकते हुए अब्र का जज़्ब तौबा कि दामन उठाए ज़मीं घूमती है कड़कती है बिजली चमकती हैं बूँदें लपकता है कौंदा दमकती हैं बूँदें रग-ए-जाँ पे रह रह के लगती हैं चोटें छमा-छम ख़ला में खनकती हैं बूँदें फ़लक गा रहा है ज़मीं गा रही है कलेजे में हर लय चुभी जा रही है मुझे पा के इस मस्त शब में अकेला ये रंगीं घटा तीर बरसा रही है चमकता है बुझता है थर्रा रहा है भटकने की जुगनू सज़ा पा रहा है अभी ज़ेहन में था ये रौशन तख़य्युल फ़ज़ा में जो उड़ता चला जा रहा है लचक कर सँभलते हैं जब अब्र-पारे बरसते हैं दामन से दुम-दार तारे मचलती है रह रह के बालों में बिजली गुलाबी हुए जा रहे हैं किनारे फ़ज़ा झूम कर रंग बरसा रही है हर इक साँस शो'ला बनी जा रही है कभी इस तरह याद आती नहीं थी वो जिस तरह इस वक़्त याद आ रही है भला लुत्फ़ क्या मंज़र-ए-पुर-असर दे कि अश्कों ने आँखों पे डाले हैं पर्दे कहीं और जा कर बरस मस्त बादल ख़ुदा तेरा दामन जवाहिर से भर दे

Kaifi Azmi

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प्यार का जश्न नई तरह मनाना होगा ग़म किसी दिल में सही ग़म को मिटाना होगा काँपते होंटों पे पैमान-ए-वफ़ा क्या कहना तुझ को लाई है कहाँ लग़्ज़िश-ए-पा क्या कहना मेरे घर में तिरे मुखड़े की ज़िया क्या कहना आज हर घर का दिया मुझ को जलाना होगा रूह चेहरों पे धुआँ देख के शरमाती है झेंपी झेंपी सी मिरे लब पे हँसी आती है तेरे मिलने की ख़ुशी दर्द बनी जाती है हम को हँसना है तो औरों को हँसाना होगा सोई सोई हुई आँखों में छलकते हुए जाम खोई खोई हुई नज़रों में मोहब्बत का पयाम लब शीरीं पे मिरी तिश्ना-लबी का इन'आम जाने इन'आम मिलेगा कि चुराना होगा मेरी गर्दन में तिरी संदली बाहोँ का ये हार अभी आँसू थे इन आँखों में अभी इतना ख़ुमार मैं न कहता था मिरे घर में भी आएगी बहार शर्त इतनी थी कि पहले तुझे आना होगा

Kaifi Azmi

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