nazmKuch Alfaaz

नुक़ूश-ए-हसरत मिटा के उठना, ख़ुशी का परचम उड़ा के उठना मिला के सर बैठना मुबारक तराना-ए-फ़त्ह गा के उठना ये गुफ़्तुगू गुफ़्तुगू नहीं है बिगड़ने बनने का मरहला है धड़क रहा है फ़ज़ा का सीना कि ज़िंदगी का मुआमला है ख़िज़ाँ रहे या बहार आए तुम्हारे हाथों में फ़ैसला है न चैन बे-ताब बिजलियों को न मुतमइन कारवान-ए-शबनम कभी शगूफ़ों के गर्म तेवर कभी गुलों का मिज़ाज बरहम शगूफ़ा ओ गुल के इस तसादुम में गुल्सिताँ बन गया जहन्नम सजा लें सब अपनी अपनी जन्नत अब ऐसे ख़ाके बना के उठना ख़ज़ाना-ए-रंग-ओ-नूर तारीक रहगुज़ारों में लुट रहा है उरूस-ए-गुल का ग़ुरूर-ए-इस्मत सियाहकारों में लुट रहा है तमाम सरमाया-ए-लताफ़त ज़लील ख़ारों में लुट रहा है घुटी घुटी हैं नुमू की साँसें छुटी छुटी नब्ज़-ए-गुलिस्ताँ है हैं गुरसना फूल, तिश्ना ग़ुंचे, रुख़ों पे ज़र्दी लबों पे जाँ है असीर हैं हम-सफ़ीर जब से ख़िज़ाँ चमन में रवाँ-दवाँ है इस इंतिशार-ए-चमन की सौगंद बाब-ए-ज़िंदाँ हिला के उठना हयात-ए-गीती की आज बदली हुई निगाहें हैं इंक़िलाबी उफ़ुक़ से किरनें उतर रही हैं बिखेरती नूर-ए-कामयाबी नई सहर चाहती है ख़्वाबों की बज़्म में इज़्न-ए-बारयाबी ये तीरगी का हुजूम कब तक ये यास का अज़दहाम कब तक निफ़ाक़ ओ ग़फ़लत की आड़ ले कर जियेगा मुर्दा निज़ाम कब तक रहेंगे हिन्दी असीर कब तक रहेगा भारत ग़ुलाम कब तक गले का तौक़ आ रहे क़दम पर कुछ इस तरह तिलमिला के उठना

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तुम्हारी रूह को छूने की तमन्ना है मुझे तुम्हारे जिस्म की सरहद से पार जाना है तुम्हारी आँख के आँसुओं से आँख अपनी भिगोनी है तुम्हारे दर्द को अपने दिल पे पहनना है मुझे अपनी ख़ुशी तुम्हारे कान की बालियों में पिरोनी है तुम्हारी हँसी के गहरे समुंदरों में डूबना है उदासी के हर पैरहन को उतार जाना है। तुम्हारी रूह को छूने की तमन्ना है मुझे तुम्हारे जिस्म की सरहद से पार जाना है

KAPIL DEV

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'मतलबी' तेरा हुनर-ए-बेवफ़ाई अच्छा था वादों से मुकरना वाकई अच्छा था आज ये सब कैसे अरे बस ऐसे ही तुझे तो मालूम है न मैं कैसा हूँ , शायद अब मैं बिल्कुल तेरे जैसा हूँ मतलब पड़ने पर मैं तेरा हूँ मतलब ख़त्म होने पर ज़माने जैसा हूँ मैं ज़माने जैसा न बनता तो क्या करता मैं तुझ सा नहीं बनता तो क्या करता मैं कब तक तेरे लिए रोता रहता मैं आख़िर कब तक गलियों में, कूचों में, गाँव में, शहरों में, बाज़ारों में, खुले मैदानों में , जंगलों में, चर्च में, गुरुद्वारों में मस्जिदों में, मंदिरों में तुझे ढूँढ़ता रहता मैं अपनी ज़िन्दगी तेरे लिए क्यूँ बर्बाद करता फिर ज़ेहन में आया कि बदलना ही ठीक है तेरे हर वादों को भूलना ही ठीक है तेरी यादों को दिल से मिटाना ही ठीक है ज़माना मतलबी , दुनिया मतलबी हर शख़्स मतलबी तू भी मतलबी और अब मैं भी मतलबी

Rovej sheikh

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“अभी न जाओ छोड़ कर” अभी न जाओ छोड़ कर कि दिल अभी भरा नहीं नज़र अभी लड़ी नहीं नशा अभी चढ़ा नहीं अभी न जाओ छोड़ कर कि दिल अभी भरा नहीं अभी तो दिन ढ़ला है ये अभी तो रात आई है अज़ल के बा'द आज फिर फ़ज़ा ये मुस्कुराई है फ़ज़ा को मुस्कुराने दो ये दिल बहक भी जाने दो कि अब न रोको ख़ुद को तुम ये दूरियाँ मिटा दो तुम हवाओं में ये दिल उड़े कि प्यार के चमन खिलें ये रात भी दिवानी है फ़ज़ा भी ये सुहानी है कि बाहों में मुझे भरो यूँँ जाने की न ज़िद करो अभी तो देखो चाँद भी चकोर से मिला नहीं अभी न जाओ छोड़ कर कि दिल अभी भरा नहीं ज़रा ठहर भी जाओ साथ बैठ लो कुछ और पल कि थाम लूँ ये वक़्त मैं कि लिख दूँ फिर कोई ग़ज़ल तुम्हें बताऊँ आज जो कभी न तुम सेे कह सका तुम्हें दिखाऊँ अश्क जो तुम्हारे बिन न बह सका हसीन हो गई हो तुम जवान हो गया हूँ मैं बहार बन गई हो तुम मसान बन गया हूँ मैं कि कर दो अब हरा मुझे ग़मों से अब रिहा मुझे तरस ज़रा तो खाओ तुम मैं इतना भी बुरा नहीं अभी न जाओ छोड़ कर कि दिल अभी भरा नहीं

Rehaan

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जब छुआ साथ तुलसी चौरा आँखों में साँसों को खींचे तुम सेे जो वा'दा किया कभी पड़िया जी के पीपल नीचे तुम ने चाहा था ख़ुश रहना ख़ुद ख़ुशी सदा मुझ से सीखे दुनिया भर के संकल्प सतत पूरे होते मुझ में दीखे ख़ुद से अनुबंध किया है अब मन को निर्बंध किया है अब गत-विगत मुक्त हो सकने का सम्पूर्ण प्रबन्ध किया है अब इस नए साल के पहले दिन तुम से बाहर सोचा तो है मन-प्राण सुमरनी छोड़ेंगे सुनते तो हैं होता तो है काफ़ी है।

Kumar Vishwas

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"ज़िंदगी के रंग" मुझे ज़िंदगी से गिला नहीं मुझे आशिक़ी से गिला नहीं मुझे सादगी से गिला नहीं मुझे बेख़ुदी से गिला नहीं मुझे कहकशाॅं से गिला नहीं मुझे आसमाॅं से गिला नहीं मुझे बस फ़क़त ये गिला रहा मुझे हर ख़ुशी से गिला रहा तेरी जुस्तुजु से मैं डर गया मैं गुज़र गया, मैं बिखर गया मेरा हाल कैसा ये हाल है मैं तो इश्क़ इश्क़ में मर गया तेरी यादें मुझ को सता रहीं मेरी धड़कनों को बढ़ा रहीं मैं कहाॅं हूँ मुझ को ख़बर नहीं ये उदासियाॅं मुझे खा रहीं

Hameed Sarwar Bahraichi

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ऐ हमा-रंग हमा-नूर हमा-सोज़-ओ-गुदाज़ बज़्म-ए-महताब से आने की ज़रूरत क्या थी तू जहाँ थी उसी जन्नत में निखरता तिरा रूप इस जहन्नम को बसाने की ज़रूरत क्या थी ये ख़द-ओ-ख़ाल ये ख़्वाबों से तराशा हुआ जिस्म और दिल जिस पे ख़द-ओ-ख़ाल की नर्मी भी निसार ख़ार ही ख़ार शरारे ही शरारे हैं यहाँ और थम थम के उठा पाँव बहारों की बहार तिश्नगी ज़हर भी पी जाती है अमृत की तरह जाने किस जाम पे रुक जाए निगाह-ए-मासूम डूबते देखा है जिन आँखों में मय-ख़ाना भी प्यास उन आँखों की बुझे या न बुझे क्या मालूम हैं सभी हुस्न-परस्त अहल-ए-नज़र साहिब-ए-दिल कोई घर में कोई महफ़िल में सजाएगा तुझे तू फ़क़त जिस्म नहीं शे'र भी है गीत भी है कौन अश्कों की घनी छाँव में गाएगा तुझे तुझ से इक दर्द का रिश्ता भी है बस प्यार नहीं अपने आँचल पे मुझे अश्क बहा लेने दे तू जहाँ जाती है जा, रोकने वाला मैं कौन अपने रस्ते में मगर शम्अ' जला लेने दे

Kaifi Azmi

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मैं ये सोच कर उस के दर से उठा था कि वो रोक लेगी मना लेगी मुझ को हवाओं में लहराता आता था दामन कि दामन पकड़ कर बिठा लेगी मुझ को क़दम ऐसे अंदाज़ से उठ रहे थे कि आवाज़ दे कर बुला लेगी मुझ को मगर उस ने रोका न मुझ को मनाया न दामन ही पकड़ा न मुझ को बिठाया न आवाज़ ही दी न मुझ को बुलाया मैं आहिस्ता आहिस्ता बढ़ता ही आया यहाँ तक कि उस से जुदा हो गया मैं

Kaifi Azmi

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ये अँधेरी रात ये सारी फ़ज़ा सोई हुई पत्ती पत्ती मंज़र-ए-ख़ामोश में खोई हुई मौजज़न है बहर-ए-ज़ुल्मत तीरगी का जोश है शाम ही से आज क़िंदील-ए-फ़लक ख़ामोश है चंद तारे हैं भी तो बे-नूर पथराए हुए जैसे बासी हार में हों फूल कुम्हलाए हुए खप गया है यूँँ घटा में चाँदनी का साफ़ रंग जिस तरह मायूसियों में दब के रह जाए उमंग उमडी है काली घटा दुनिया डुबोने के लिए या चली है बाल खोले राँड रोने के लिए जितनी है गुंजान बस्ती उतनी ही वीरान है हर गली ख़ामोश है हर रास्ता सुनसान है इक मकाँ से भी मकीं की कुछ ख़बर मिलती नहीं चिलमनें उठती नहीं ज़ंजीर-ए-दर हिलती नहीं सो रहे हैं मस्त-ओ-बे-ख़ुद घर के कुल पीर-ओ-जवाँ हो गई हैं बंद हुस्न-ओ-इश्क़ में सरगोशियाँ हाँ मगर इक सम्त इक गोशे में कोई नौहागर ले रही है करवटों पर करवटें दिल थाम कर दिल सँभलता ही नहीं है सीना-ए-सद-चाक में फूल सा चेहरा अटा है बेवगी की ख़ाक में उड़ चली है रंग-ए-रुख़ बन कर हयात-ए-मुस्तआर हो रहा है क़ल्ब-ए-मुर्दा में जवानी का फ़िशार हसरतें दम तोड़ती हैं यास की आग़ोश में सैकड़ों शिकवे मचलते हैं लब-ए-ख़ामोश में उम्र आमादा नहीं मुर्दा-परस्ती के लिए बार है ये ज़िंदा मय्यत दोश-ए-हस्ती के लिए चाहती है लाख क़ाबू दिल पे पाती ही नहीं हाए-रे ज़ालिम जवानी बस में आती ही नहीं थरथर्रा कर गिरती है जब सूने बिस्तर पर नज़र ले के इक करवट पटक देती है वो तकिया पे सर जब खनक उठती हैं सोती लड़कियों की चूड़ियाँ आह बन कर उठने लगता है कलेजा से धुआँ हो गई बेवा की ख़ातिर नींद भी जैसे हराम मुख़्तसर सा अहद-ए-वसलत दे गया सोज़-ए-दवाम दोपहर की छाँव दौर-ए-शादमानी हो गया प्यास भी बुझने न पाई ख़त्म पानी हो गया ले रही है करवटों पर करवटें बा-इज़तिरार आग में पारा है या बिस्तर पे जिस्म-ए-बे-क़रार पड़ गई इक आह कर के रो के उठ बैठी कभी उँगलियों में ले के ज़ुल्फ़-ए-ख़म-ब-ख़म एेंठी कभी आ के होंटों पर कभी मायूस आहें थम गईं और कभी सूनी कलाई पर निगाहें जम गईं इतनी दुनिया में कहीं अपनी जगह पाती नहीं यास इस हद की कि शौहर की भी याद आती नहीं आ रहे हैं याद पैहम सास ननदों के सुलूक फट रहा है ग़म से सीना उठ रही है दिल में हूक अपनी माँ बहनों का भी आँखें चुराना याद है ऐसी दुनिया में किसी का छोड़ जाना याद है बाग़बाँ तो क़ब्र में है कौन अब देखे बहार ख़ुद उसी को तीर उस के करने वाले हैं शिकार जब नज़र आता नहीं देता कोई बेकस का साथ ज़हर की शीशी की जानिब ख़ुद-ब-ख़ुद बढ़ता है हाथ दिल तड़प कर कह रहा है जल्द इस दुनिया को छोड़ चूड़ियाँ तोड़ीं तो फिर ज़ंजीर-ए-हस्ती को भी तोड़ दम अगर निकला तो खोई ज़िंदगी मिल जाएगी ये नहीं तो ख़ैर तन्हा क़ब्र ही मिल जाएगी वाँ तुझे ज़िल्लत की नज़रों से न देखेगा कोई चाहे हँसना चाहे रोना फिर न रोकेगा कोई वाँ सब अहल-ए-दर्द हैं सब साहब-ए-इंसाफ़ हैं रहबर आगे जा चुका राहें भी तेरी साफ़ हैं दिल इन्हीं बातों में उलझा था कि दम घबरा गया हाथ ले कर ज़हर की शीशी लबों तक आ गया तिलमिलाती आँख झपकाती झिझकती हाँफती पी गई कुल ज़हर आख़िर थरथराती काँपती मौत ने झटका दिया कुल उज़्व ढीले हो गए साँस उखड़ी, नब्ज़ डूबी, होंट नीले हो गए आँख झपकी अश्क टपका हिचकी आई खो गई मौत की आग़ोश में इक आह भर कर सो गई और कर इक आह सुलगे हिन्द की रस्मों का दाम ऐ जवाना-मर्ग बेवा तुझ पे 'कैफ़ी' का सलाम

Kaifi Azmi

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मस्त घटा मंडलाई हुई है बाग़ पे मस्ती छाई हुई है झूम रही हैं आम की शाख़ें नींद सी जैसे आई हुई है बोलता है रह रह के पपीहा बर्क़ सी इक लहराई हुई है लहके हुए हैं फूल शफ़क़ के आतिश-ए-तर छलकाई हुई है शे'र मिरे बन बन के हुवैदा क़ौस की हर अँगड़ाई हुई है रेंगते हैं ख़ामोश तराने मौज-ए-हवा बल खाई हुई है रौनक़-ए-आलम सर है झुकाए जैसे दुल्हन शरमाई हुई है घास पे गुम-सुम बैठा है 'कैफ़ी' याद किसी की आई हुई है

Kaifi Azmi

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ये बरसात ये मौसम-ए-शादमानी ख़स-ओ-ख़ार पर फट पड़ी है जवानी भड़कता है रह रह के सोज़-ए-मोहब्बत झमाझम बरसता है पुर-शोर पानी फ़ज़ा झूमती है घटा झूमती है दरख़्तों को ज़ौ बर्क़ की चूमती है थिरकते हुए अब्र का जज़्ब तौबा कि दामन उठाए ज़मीं घूमती है कड़कती है बिजली चमकती हैं बूँदें लपकता है कौंदा दमकती हैं बूँदें रग-ए-जाँ पे रह रह के लगती हैं चोटें छमा-छम ख़ला में खनकती हैं बूँदें फ़लक गा रहा है ज़मीं गा रही है कलेजे में हर लय चुभी जा रही है मुझे पा के इस मस्त शब में अकेला ये रंगीं घटा तीर बरसा रही है चमकता है बुझता है थर्रा रहा है भटकने की जुगनू सज़ा पा रहा है अभी ज़ेहन में था ये रौशन तख़य्युल फ़ज़ा में जो उड़ता चला जा रहा है लचक कर सँभलते हैं जब अब्र-पारे बरसते हैं दामन से दुम-दार तारे मचलती है रह रह के बालों में बिजली गुलाबी हुए जा रहे हैं किनारे फ़ज़ा झूम कर रंग बरसा रही है हर इक साँस शो'ला बनी जा रही है कभी इस तरह याद आती नहीं थी वो जिस तरह इस वक़्त याद आ रही है भला लुत्फ़ क्या मंज़र-ए-पुर-असर दे कि अश्कों ने आँखों पे डाले हैं पर्दे कहीं और जा कर बरस मस्त बादल ख़ुदा तेरा दामन जवाहिर से भर दे

Kaifi Azmi

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