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"सितंबर1965" किसी क़साई ने इक हड्डी छील कर फेंकी गली के मोड़ से दो कुत्ते भौंकते उट्ठे किसी ने पाँव उठाए किसी ने दुम पटकी बहुत से कुत्ते खड़े हो कर शोर करने लगे न जाने क्यूँँ मिरा जी चाहा अपने सब कपड़े उतार कर किसी चौराहे पर खड़ा हो जाऊँ हर एक चीज़ पे झपटूँ घड़ी घड़ी चिल्लाऊँ निढाल हो के जहाँ चाहूँ जिस्म फैला दूँ हज़ारों साल की सच्चाइयों को झुटला दूँ

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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"सज़ा" हर बार मेरे सामने आती रही हो तुम हर बार तुम से मिल के बिछड़ता रहा हूँ मैं तुम कौन हो ये ख़ुद भी नहीं जानती हो तुम मैं कौन हूँ मैं ख़ुद भी नहीं जानता हूँ मैं तुम मुझ को जान कर ही पड़ी हो अज़ाब में और इस तरह ख़ुद अपनी सज़ा बन गया हूँ मैं तुम जिस ज़मीन पर हो मैं उस का ख़ुदा नहीं पस सर-बसर अजी़य्यत व आजा़र ही रहो बेजा़र हो गई हो बहुत ज़िन्दगी से तुम जब बस में कुछ नहीं है तो बेज़ार ही रहो तुम को यहाँ के साया व परतौ से क्या ग़र्ज़ तुम अपने हक़ में बीच की दीवार ही रहो मैं इब्तिदा-ए-इश्क़ से बेमहर ही रहा तुम इन्तिहा-ए-इश्क़ का मेआ'र ही रहो तुम ख़ून थूकती हो ये सुन कर ख़ुशी हुई इस रंग इस अदा में भी पुरकार ही रहो मैं ने ये कब कहा था मोहब्बत में है नजात मैं ने ये कब कहा था वफ़ादार ही रहो अपनी मता-ए-नाज़ लुटा कर मेरे लिए बाज़ार-ए-इल्तिफ़ात में नादार ही रहो जब मैं तुम्हें निशात-ए-मोहब्बत न दे सका ग़म में कभी सुकून रफा़क़त न दे सका जब मेरे सब चराग़-ए-तमन्ना हवा के हैं जब मेरे सारे ख़्वाब किसी बे-वफ़ा के हैं फिर मुझ को चाहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं तन्हा कराहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं

Jaun Elia

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"कच्ची उम्र के प्यार" ये कच्ची उम्र के प्यार भी बड़े पक्के निशान देते हैं आज पर कम ध्यान देते हैं बहके बहके बयान देते हैं उन को देखे हुए मुद्दत हुई और हम, अब भी जान देते हैं क्या प्यार एक बार होता है नहीं! ये बार-बार होता है तो फिर क्यूँ किसी एक का इंतिज़ार होता है वही तो सच्चा प्यार होता है अच्छा! प्यार भी क्या इंसान होता है? कभी सच्चा कभी झूठा बे-ईमान होता है उस की रगों में भी क्या ख़ानदान होता है और मक़्सद-ए-हयात नफ़ा नुक़्सान होता है प्यार तो प्यार होता है

Yasra rizvi

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"यार" यार था मैं तुम्हारा या महज़ कोई सीढ़ी मंज़िल तक पहूँच गए, पीछे देखा तक नहीं जो सीख किसी ने नहीं वो सीख पेड़ों ने दी छाओं लेते रहे मगर तुम्हारी आरी रुकी नहीं बचपन में खेला करते साथ हम साँप सीढ़ी उतरा ये ज़िंदगी में कब, भनक तक लगी नहीं सपने भी साथ बुने थे बहुत उमीदें भी थी कई बादलों की सैर पर निकल गए तुम, पर मैं नहीं अगर रुकसत की होती ख़बर ज़रा सी भी तब माँ से दो रोटी ज़्यादा, बनवाता नहीं ‘अर्पित’ मैं ने घूम फिर कर यही बात है मानी कई मिलेंगे इन के जैसे, ये ज़ालिम अकेले नहीं

Arpit Sharma

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मैं रात उठूँ और अपने सारे पुराने यारों को फ़ोन कर के उन्हें जगाऊँ उन्हें जगाऊँ उन्हें बताऊँ कि यार तुम सब बदल गए हो बहुत ही आगे निकल गए हो जो राहें तुम ने चुनी हुई हैं वो कितनी तन्हा हैं कितनी ख़ाली जो रातें तुम ने पसंद की हैं वो सख़्त काली हैं सख़्त काली ज़रा सा माज़ी बईद देखो हम ऐसी दुनिया में जी रहे थे जहाँ पे हम से अगर हमारा कोई भी जिगरी ख़फ़ा हुआ तो हम उस का ग़ुस्सा ख़ुद अपने ऊपर निकालते थे हँसी की बातें, अजीब क़िस्से, अजीब सस्ते से जोक कह के किसी भी हालत, किसी भी क़ीमत पे उस ख़फ़ा को हँसा रहे थे और आज आलम है ऐसा हम सब ख़फ़ा ख़फ़ा हैं जुदा जुदा हैं हमारी लाइफ़ में कोई लड़की हमारी लाइफ़ बनी हुई है हमारी आँखों पे प्यार नामक सफ़ेद पट्टी बंधी हुई है तुम्हारी लाइफ़ को किस तरह तुम बिता रहे हो किसी हसीना की उलझी ज़ुल्फ़ें सँवारते हो उसी की नख़रे उठा रहे हो, रुला रहे हो, मना रहे हो ये बातें अपने मैं दोस्तों को सुनाना चाहूँ तो फ़ोन उठाऊँ जो फ़ोन उठाऊँ तो कॉन्टैक्ट को खँगाल बैठूँ मगर तअज्जुब के मेरी उँगली मेरी बग़ावत में आ खड़ी है किसी हसीना के एक नंबर को कॉल करने पे जा अड़ी है सो मैं किसी यार, दोस्त को फिर पुरानी यादें दिलाऊँ कैसे किसी का नंबर लगाऊँ कैसे मैं ख़ुद सभी को भुला चुका हूँ मैं कॉल आख़िर मिलाऊँ कैसे ??

Shadab Javed

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"बुझ गए नील-गगन" अब कहीं कोई नहीं जल गए सारे फ़रिश्तों के बदन बुझ गए नील-गगन टूटता चाँद बिखरता सूरज कोई नेकी न बदी अब कहीं कोई नहीं आग के शो'ले बढ़े आसमानों का ख़ुदा डर के ज़मीं पर उतरा चार छे गाम चला टूट गया आदमी अपनी ही दीवारों से पत्थर ले कर फिर गुफाओं की तरफ़ लौट गया अब कहीं कोई नहीं

Nida Fazli

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"एक कहानी" तुम ने शायद किसी रिसाले में कोई अफ़्साना पढ़ लिया होगा खो गई होगी रूप की रानी इश्क़ ने ज़हर खा लिया होगा तुम अकेली खड़ी हुई होगी सर से आँचल ढलक रहा होगा या पड़ोसन के फूल से रुख़ पर कोई धब्बा चमक रहा होगा काम में होंगे सारे घर वाले रेडियो गुनगुना रहा होगा तुम पे नश्शा सा छा गया होगा मुझ को विश्वाश है कि अब तुम भी शाम को खिड़की खोल देने पर अपनी लड़की को टोकती होगी गीत गाने से रोकती होगी

Nida Fazli

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"चौथा आदमी" बैठे बैठे यूँँही क़लम ले कर मैं ने काग़ज़ के एक कोने पर अपनी माँ अपने बाप के दो नाम एक घेरा बना के काट दिए और इस गोल दाएरे के क़रीब अपना छोटा सा नाम टाँक दिया मेरे उठते ही, मेरे बच्चे ने पूरे काग़ज़ को ले कर फाड़ दिया!

Nida Fazli

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"रुख़्सत होते वक़्त" रुख़्सत होते वक़्त उस ने कुछ नहीं कहा लेकिन एयरपोर्ट पर अटैची खोलते हुए मैं ने देखा मेरे कपड़े के नीचे उस ने अपने दोनों बच्चों की तस्वीर छुपा दी है तअज्जुब है छोटी बहन हो कर भी उस ने मुझे माँ की तरह दुआ दी है

Nida Fazli

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"सोने से पहले" हर लड़की के तकिए के नीचे तेज़ ब्लेड गोंद की शीशी और कुछ तस्वीरें होती हैं सोने से पहले वो कई तस्वीरों की तराश-ख़राश से एक तस्वीर बनाती है किसी की आँखें किसी के चेहरे पर लगाती है किसी के जिस्म पर किसी का चेहरा सजाती है और जब इस खेल से ऊब जाती है तो किसी भी गोश्त-पोस्त के आदमी के साथ लिपट कर सो जाती है

Nida Fazli

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