ज़ेहन जब तक है ख़यालात की ज़ंजीर कहाँ कटती है होंट जब तक हैं सवालात की ज़ंजीर कहाँ कटती है बहस करते रहो लिखते रहो नज़्में ग़ज़लें ज़ेहन पर सदियों से तारी है जो मज्लिस की फ़ज़ा इस ख़ुनुक आँच से क्या पिघलेगी सोच लेने ही से हालात की ज़ंजीर कहाँ कटती है नींद में डूबी हुई आँखों से वाबस्ता ख़्वाब तेज़ किरनों की सिनानों पे ही रुस्वा सर-ए-आम ये शहीद अपनी सलीबों से पलट आते हैं दिल में हर शाम सुब्ह होती है मगर रात की ज़ंजीर कहाँ कटती है दिन गुज़र जाता है बे-फ़ैज़ कद-ओ-काविश में एक अन-देखे जहन्नम की तब-ओ-ताबिश में जिस्म और जाँ की तग-ओ-ताज़ की हर पुर्सिश में दर्द-ओ-ग़म हसरत-ओ-महरूमी की हर काहिश में तलब-ओ-तर्क-ए-तलब सिलसिला-ए-बे-पायाँ मर्ग ही ज़ीस्त का उनवान है हर ख़ून-शुदा ख़्वाहिश में ग़म से भागें भी तो फ़र्याद-ओ-शिकायात की ज़ंजीर कहाँ कटती है वक़्त वो दौलत-ए-नायाब है आता नहीं हाथ हम मशीनों की तरह जीते हैं पाबंदी-ए-औक़ात के साथ वक़्त बे-कार गुज़रता ही चला जाता है कुर्सियों मेज़ों से बे-मा'नी मुलाक़ातों में सैंकड़ों बार की अगली हुई दोहराई हुई बातों में मंदगी रहने की तमन्ना की मुदारातों में शिकम-ओ-जाँ की इबादात की ज़ंजीर कहाँ कटती है सुब्ह से शाम तलक इतने ख़ुदा मिलते हैं हर काफ़िर को सज्दा-ए-शुक्र से इनकार की मोहलत नहीं मिलने पाती सैंकड़ों लाखों ख़ुदाओं की नज़र से छुप कर ख़ुद से मिल लेने की रुख़्सत नहीं मिलने पाती ख़ुद-परस्तों से भी ताआत की ज़ंजीर कहाँ कटती है रात आती है तो दिल कहता है हम अपने हैं ख़ल्वत-ए-ख़्वाब में दुनिया से किनारा कर लें कल भी देना है लहू अपना दिल-ओ-दीदा की झोली भर लें जिस्म के शोर से और रूह की फ़रियाद से दम घुटता है दिन के बे-कार ख़यालात की ज़ंजीर कहाँ कटती है बे-नियाज़ाना भी जीना है फ़क़त एक गुमाँ फ़िक्र-ए-मौजूद को छोड़ें तो ग़म-ए-ना-मौजूद साथ हर साँस के है सिलसिला-ए-हसत-ओ-बूद ग़म-ए-आफ़ाक़ को ठुकराएँ करें तर्क-ए-जहाँ फिर भी ये फ़िक्र कि जीने का हो कोई उनवाँ बे-नियाज़ी से ग़म-ए-ज़ात की ज़ंजीर कहाँ कटती है ज़ेहन में अंधे अक़ीदों की सियाही भर लो ताकि इस नगरी में कभी अफ़्कार के शो'लों का गुज़र हो न सके जब्र का हुक्म सुनो होंटों को अपने सी लो ताकि उन राहों से कभी लफ़्ज़ों का सफ़र हो न सके ज़ेहन-ओ-लब फिर भी नहीं चुप होते उन के ख़ामोश सवालात की पेच-दर-पेच ख़यालात की ज़ंजीर कहाँ कटती है
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइनात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है
Divya 'Kumar Sahab'
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"रो तो रहे हैं" नहीं आँखों में नमी तो क्या? रो तो रहे हैं ग़म तुझ सेे कहा नहीं तो क्या? रो तो रहे हैं सितम तू इतने भी न ढा अब ख़ुदा मुझ पर नस हाथ की नहीं भी काटी तो क्या? रो तो रहे हैं कहें क्या किसी से दर्द अपना छुपाएँ कहाँ यार ये दर्द अपना तसल्ली तो ज़माना देगा नहीं कहेगा अपने ही पास रख तू दर्द अपना ज़ालिम इन लोगों को लगता है मुझे ग़म नहीं है कोई ये क्या जाने, सब एक से बढ़कर एक हैं कम नहीं है कोई वैसे न सही, ऐसे ही सही, रो तो रहे हैं आँसू न सही, शा'इरी ही सही, रो तो रहे हैं इतना दिल करता है अब अश्क बहाने का, है करारी वजह न सही, यूँँ ही सही, रो तो रहे हैं मन भारी इतना कभी कभी हो जाता है जीना मुश्किल बेहद कभी कभी हो जाता है ज़ख़्म मुझे न होने नसीब, होता नहीं यूँँ तो और 'गर हो भी तो बस कभी कभी हो जाता है आँखों से रोना, ज़रूरी तो नहीं 'आकर्ष' काम तो दिल ही कर सारा देता है भीगे तकिए पसंद हैं तो नहीं मगर टपकना आँसुओं का सहारा देता है पास किस के बैठें, किसे हाल-ए-दिल बताऍं करें ऐतिबार किस का, किसे मलाल-ए-दिल बताऍं ख़ुद-कुशी कर नहीं पा रहे तो क्या? रो तो रहे हैं कहीं मरने नहीं जा रहे तो क्या? रो तो रहे हैं इतने ढेर ग़म हैं के हिसाब ख़ुदा भी करने वाला नहीं सो हम दरगाह नहीं जा रहे तो क्या? रो तो रहे हैं
Aakarsh Goyal 'Mehtaab'
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"कब" कब ये पेड़ हरे होंगे फिर से कब ये कलियाँ फूटेंगी और ये फूल हसेंगे कब ये झरने अपनी प्यास भरेंगे कब ये नदियाँ शोर मचाएँगी कब ये आज़ाद किए जाएँगे सब पंछी कब जंगल साँसे लेंगे कब सब जाएँगे अपने घर कब हाथों से ज़ंजीरें खोली जाएँगी कब हम ऐसों को पूछेगा कोई और ये फ़क़ीरों को भी क़िस्से में लाया जाएगा कब इन काँटों की भी क़ीमत होगी और मिट्टी सोने के भाव में आएगी कब लोगों की ग़लती टाली जाएगी कब ये हवाएँ पायल पहने झूमेगी कब अंबर से परियाँ उतरेंगी कब पत्थरों से भी ख़ुशबू आएगी कब हंसों के जोड़ें नदियों पे बैठेंगे बरखा गीत बनाएगी और मोर उठा के पर कत्थक करते देखे जाएँगे नीलकमल पानी से इश्क़ लड़ाएंगे मछलियाँ ख़ुशी के गोते मारेंगी कब कोयल की कूक सुनाई देगी कब भॅंवरे फिर गुन- गुन करते लौटेंगे बागों में और कब ये प्यारी तितलियाँ कलर फेकेंगी फिर सब कुछ डूबा होगा रंगों में कब ये दुनिया रौशन होगी कब ये जुगनू अपने रंग में आएँगे कब ये सब मुमकिन है कब सबके ही सपने पूरे होंगे कब अपने मन के मुताबिक़ होगा सब कुछ कब ये बहारें लोटेंगी कब वो तारीख़ आएगी बस मुझ को ही नहीं सब को इंतिज़ार है तेरे ' बर्थडे ' का
BR SUDHAKAR
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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई
Kaifi Azmi
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मुतरिब-ए-ख़ुश-नवा ज़िंदगी के हसीन गीत गाता रहा उस की आवाज़ पर अंजुमन झूम उट्ठी उस ने जब ज़ख़्म-ए-दिल को ज़बाँ बख़्श दी सुनने वालों ने बे-साख़्ता आह की इश्क़ के साज़ पर जब हुआ ज़ख़्मा-ज़न शोर-ए-तहसीं में ख़ुद उस की आवाज़ दब सी गई मुतरिब-ए-ख़ुश-नवा फिर भी तन्हा रहा तिश्नगी-ए-मशाम उस को बाद-ए-सबा की तरह गुल-ब-गुल ले गई कासा-ए-चश्म ने परतव-ए-गुल भी पाया नहीं दर्द उस का किसी महरम-ए-दर्द के वास्ते दर-ब-दर शहर-दर-शहर फिरता रहा दाद ओ तहसीं के हंगामा-ए-ज़ौक़-कश में उसे हर तरफ़ से मलामत के पत्थर मिले मुतरिब-ए-ख़ुश-नवा पत्थरों से पटकता रहा अपना सर पत्थरों को ज़बाँ तो मिली पर तकल्लुम नहीं पत्थरों को ख़द-ओ-ख़ाल-ए-इंसाँ मिले दौलत-ए-दर्द-ओ-ग़म कब मिली पत्थरों को हसीं सूरतें तो मिलीं दिल नहीं मिल सका पत्थरों को मिले पाँव पर ए'तिमाद-ए-सफ़र कौन दे पत्थरों को मिले हाथ पर अज़्म-ए-तेशा-ज़नी कौन दे संग सुनते हैं लेकिन समझते नहीं देखते हैं मगर फ़र्क़ करते नहीं बात करते हैं महसूस करते नहीं टूट सकते हैं लेकिन पिघलते नहीं गर्द बन कर ये उड़ जाएँ साँचों में ढलते नहीं मुतरिब-ए-ख़ुश-नवा पत्थरों से पटकता रहा अपना सर मुतरिब-ए-ख़ुश-नवा पत्थरों को सुनाता रहा दर्द-ए-दिल अपना ग़म उन का ग़म सब का ग़म पत्थरों ने सुना और चुप-चाप हँसते रहे पत्थरों की इसी अंजुमन का मुग़न्नी हूँ मैं और बे-दर्द बे-हिस सितमगार पत्थर सुनेंगे कभी उन का वो मुतरिब-ए-ख़ुश-नवा शिकवा-संज-ए-ज़माँ अपने नग़्मात की आग में जल गया फिर उन ही के मानिंद पत्थर का बुत बन गया
Waheed Akhtar
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आ'ज़ा का तनासुब रगों में दौड़ते ज़िंदा जवाँ सरशार ख़ूँ की गुनगुनाहट हमें देते हैं दावत इश्क़ की लेकिन हमारी चश्म-ए-आहन-पोश पैराहन-शनासा है लिबासों की मोहब्बत वज़्-ए-पैराहन को सब कुछ मान कर ना-बीना आँखें इश्क़ करती हैं हमारी ज़िंदगी तहज़ीब-ए-पैराहन है ज़ाहिर की परस्तिश है हमारे सारे आदाब-ए-नज़ारा फ़र्ज़ कर लेते हैं इंसाँ बे-बदन है बदन दर-अस्ल इंसाँ है तमद्दुन है मोहब्बत है बदन ही रूह है नूर-ए-हरारत ज़िंदगी है बदन ही का करिश्मा ज़ेहन की तख़्लीक़ तस्ख़ीर-ए-फुलाँ है हमारी चश्म-ए-आहन-पोश पैराहन शनासा है बदन की ताब ला सकती नहीं तहज़ीब-ए-पैराहन न ज़िंदा है न ज़ेहन-ओ-रूह रखती है हमारे बूढ़े कोहना और फ़र्सूदा लिबासों से इबारत हैं हमारे नौजवाँ मग़रिब के ताज़ा फैशनों के चलते फिरते इश्तिहारी हैं बदन मादूम है और बे-बदन रूहें धुआँ हैं बे-बदन अज़हान आसेब-ए-नज़ारा हैं
Waheed Akhtar
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अगर मैं कहता हूँ जीना है क़ैद-ए-तन्हाई तो ज़िंदगानी की क़ीमत पे हर्फ़ क्यूँँ आए अगर न आया मुझे साज़गार वस्ल-ए-हबीब तो ए'तिमाद-ए-मोहब्बत पे हर्फ़ क्यूँँ आए अगर मिले मुझे विर्से में कुछ शिकस्ता खंडर तो काएनात की वुसअत पे हर्फ़ क्यूँँ आए अगर दिखाई दिए मुझ को आदमी आसेब तो अस्र-ए-नौ की बसीरत पे हर्फ़ क्यूँँ आए अगर न राह-ए-यक़ीं पा सकी मिरी तश्कीक तो फ़िक्र-ओ-फ़न की शराफ़त पे हर्फ़ क्यूँँ आए अगर ख़िज़ाँ ही मिली मुझ को आँख खुलने पर तो फ़स्ल-ए-गुल की अमानत पे हर्फ़ क्यूँँ आए अगर मिरे ग़म-ए-बे-नाम को मिली वहशत तो बज़्म-ए-जश्न-ए-मसर्रत पे हर्फ़ क्यूँँ आए मैं अपने अहद का हूँ नौहा-ख़्वाँ न दीजे दाद क़सीदा-ख़्वाँ की रिवायत पे हर्फ़ क्यूँँ आए अगर हुनर है मिरा जिंस-ए-कम-अयार तो हो ज़मीर-ओ-दिल की तिजारत पे हर्फ़ क्यूँँ आए मैं अपने ख़्वाबों का भटका हुआ मुसाफ़िर हूँ अगर मुझे न मिली मंज़िल-ए-नजात तो क्या मैं अपनी रूह की तन्हाइयों का शोअ'ला हूँ हवा-ए-दहर में हासिल नहीं सबात तो क्या मैं अपनी तुर्फ़गी-ए-तब्अ' का तो पी लूँ ज़हर जो दस्तरस में नहीं चश्मा-ए-हयात तो क्या मैं अपनी ज़ात की ख़ल्वत का हैरती ही सही जो मुझ पे खुल न सका राज़-ए-काएनात तो क्या मैं अपने ख़ूँ के चराग़ों को रौशनी दे दूँ सहर-नसीब न हो पाए मेरी रात तो क्या मैं आप से न कहूँगा कि है ज़ियाँ जाँ का ख़याल-ए-शीशा-ए-दिल संग-आज़मा न करे मैं आप से नहीं चाहूँगा दाद-ए-जाँ-बाज़ी दुआ है आप को ग़म दर्द-आश्ना न करे मैं आप से नहीं माँगूँगा ख़ूँ-बहा-ए-वफ़ा कोई तो तर्क रह-ओ-रस्म-ए-आशिक़ाना करे मैं आप को न दिखाऊँगा अपने ज़ख़्मी ख़्वाब ख़लल हो आप के आराम में ख़ुदा न करे मगर ज़मीन परोमीथियस को क्यूँँ रोके जो वो जहाँ के ख़ुदाओं से जंग करता है उसे न मौत के आसेब पास आने दें जो आसमानों से ले कर हयात उतरता है है डर पिघलने का देखें इधर न बर्फ़ के बुत जो कोई शोला-ए-उर्यां ये हाथ धरता है अज़ाब उस पे करें कम न क़हर के देवता जो अपनी आग में जल कर भी रक़्स करता है इसे न माने कभी बे-हिसी हयात-परस्त हर एक साँस पे जो ज़िंदा हो के मरता है करें न आप मुदावा-ए-सोज़-ए-आतिश-ए-ग़म ये ज़ुल्म मुझ पे तो हर रोज़-ओ-शब गुज़रता है सलामत आप का ईमान मैं तो हूँ काफ़िर हर एक वज़्अ'' से अपनी हयात करता है
Waheed Akhtar
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ये भी तिलिस्म-ए-होश-रुबा है ज़िंदा चलते-फिरते हँसते रोते नफ़रत और मोहब्बत करते इंसाँ सिर्फ़ हयूले और धुवें के मर्ग़ूले हैं हम सब अपनी अपनी लाशें अपने तवहहुम के काँधों पर लादे सुस्त-क़दम वामाँदा ख़ाक-ब-सर दामान-ए-दरीदा ज़ख़्मी पैरों से काँटों अंगारों पर चलते रहते हैं हम सब एक बड़े क़ब्रिस्ताँ के आवारा भूत हैं जिन के जिस्म तो हाथ लगाने से तहलील ख़ला में हों जिन की रूहों का ज़ाहिर से ज़ाहिर गोशा हाथ न आए हम को माज़ी से विर्से में कोहना क़ब्रें, गिरते मलबे और आसेब-ज़दा खंडरों के ढेर मिले हैं वो रौशन शब-ताब दिए जिन से माज़ी को नूर मिला था इस आसेब-ज़दा माहौल में यूँँ जुलते हैं जैसे इक पुर-हौल बयाबाँ के तीरा सन्नाटे में कुछ भूतों ने रह-गुम-कर्दा सय्याहों को भटकाने की ख़ातिर आग जलाई हो अब ये उजाले सिर्फ़ धुआँ हैं और आसेब-ज़दा खंडरों की छत के चटख़्ते शहतीरों के शोर में कोई हँसता है झड़ता चूना गिरती मिट्टी नीम मुअल्लक़ दीवार-ओ-दर चुपके चुपके रोते हैं ताक़ों के ख़ामोश दिए ज़ुल्मत को बढ़ावा देते हैं सहन के सदहा साल पुराने बूढ़े पेड़ क़ब्रों के बे-दर्द मुजावर बन कर लाशों पर सूखे पत्तों के ढेर लगा देते हैं हम सब अपनी अपनी लाशें अपने अना के दोश पे लादे इक क़ब्रिस्ताँ की पुर-हौल उदासी से उकताए हुए एक नए शमशान का रस्ता ढूँड रहे हैं मुंतज़िर-ए-मर्ग-ए-अम्बोह हुजूम आँखों के ख़ाली कासे खोले हर-सू देख रहा है जाने कब कोई आएगा जो अपने दामन की हवा से भूतों का जलना देखेगा और भयानक साए गले मिल मिल कर खोखली आवाज़ों में रोएँगे इस मंज़र में जाने फिर ऐसा कोई आए कि न आए हज्व वीराँ मायूस निगाहों की ख़ाली झोली फैलाए राख में फूल कुरेदेगा
Waheed Akhtar
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ऐ ख़ुदा ऐ ख़ुदा मैं हूँ मसरूफ़-ए-तस्बीह-ओ-हम्द-ओ-सना गो ब-ज़ाहिर इबादत की आदत नहीं है रिंद-मशरब हूँ ज़ोहद-ओ-रियाज़त से रग़बत नहीं है मगर जब भी चलता है मेरा क़लम जब भी खुलती है मेरी ज़बाँ कुछ कहूँ कुछ लिखूँ तेरी तख़्लीक़ का ज़मज़मा मुद्दआ' मुंतहा हर्फ़ जुड़ कर बनें लफ़्ज़ तो करते हैं तेरी हम्द-ओ-सना या ख़ुदा या ख़ुदा मेरे अतराफ़ हैं पेट ख़ाली बदन-ए-नीम-जाँ कोई तकता है जब मेरा दस्त-ए-तही शर्म आती है मुझ को ख़ुदा-ए-ग़नी सोचता हूँ मैं अपनी ज़बाँ रेहन रख दूँ कहीं रिज़्क़ से ख़ाली पेटों को भर दूँ जो हैं नीम-जाँ उन में जान फूँक दूँ और अपने लिए थोड़ी आसाइशें मोल ले आऊँ बाज़ार से अपने बच्चों की ज़िद पूरी कर दूँ जो वाक़िफ़ नहीं हैं मईशत के अंदाज़-ओ-रफ़्तार से फिर यही सोचता हूँ ख़ुदा ऐ ख़ुदा क्या ज़बाँ रेहन हो कर भी तेरी इता'अत करेगी क्या क़लम बिक के भी नाम तेरा ही लेगा दूसरों को ख़ुदा मान कर वो न करने लगें मा-सिवा की भी हम्द-ओ-सना ऐ ख़ुदा ऐ ख़ुदा है दुआ आख़िरी साँस तक ये क़लम ये ज़बाँ लिखते रहते हैं ला-इलाहा
Waheed Akhtar
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