आ'ज़ा का तनासुब रगों में दौड़ते ज़िंदा जवाँ सरशार ख़ूँ की गुनगुनाहट हमें देते हैं दावत इश्क़ की लेकिन हमारी चश्म-ए-आहन-पोश पैराहन-शनासा है लिबासों की मोहब्बत वज़्-ए-पैराहन को सब कुछ मान कर ना-बीना आँखें इश्क़ करती हैं हमारी ज़िंदगी तहज़ीब-ए-पैराहन है ज़ाहिर की परस्तिश है हमारे सारे आदाब-ए-नज़ारा फ़र्ज़ कर लेते हैं इंसाँ बे-बदन है बदन दर-अस्ल इंसाँ है तमद्दुन है मोहब्बत है बदन ही रूह है नूर-ए-हरारत ज़िंदगी है बदन ही का करिश्मा ज़ेहन की तख़्लीक़ तस्ख़ीर-ए-फुलाँ है हमारी चश्म-ए-आहन-पोश पैराहन शनासा है बदन की ताब ला सकती नहीं तहज़ीब-ए-पैराहन न ज़िंदा है न ज़ेहन-ओ-रूह रखती है हमारे बूढ़े कोहना और फ़र्सूदा लिबासों से इबारत हैं हमारे नौजवाँ मग़रिब के ताज़ा फैशनों के चलते फिरते इश्तिहारी हैं बदन मादूम है और बे-बदन रूहें धुआँ हैं बे-बदन अज़हान आसेब-ए-नज़ारा हैं
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
Faiz Ahmad Faiz
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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं
Tehzeeb Hafi
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"कच्ची उम्र के प्यार" ये कच्ची उम्र के प्यार भी बड़े पक्के निशान देते हैं आज पर कम ध्यान देते हैं बहके बहके बयान देते हैं उन को देखे हुए मुद्दत हुई और हम, अब भी जान देते हैं क्या प्यार एक बार होता है नहीं! ये बार-बार होता है तो फिर क्यूँ किसी एक का इंतिज़ार होता है वही तो सच्चा प्यार होता है अच्छा! प्यार भी क्या इंसान होता है? कभी सच्चा कभी झूठा बे-ईमान होता है उस की रगों में भी क्या ख़ानदान होता है और मक़्सद-ए-हयात नफ़ा नुक़्सान होता है प्यार तो प्यार होता है
Yasra rizvi
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ये भी तिलिस्म-ए-होश-रुबा है ज़िंदा चलते-फिरते हँसते रोते नफ़रत और मोहब्बत करते इंसाँ सिर्फ़ हयूले और धुवें के मर्ग़ूले हैं हम सब अपनी अपनी लाशें अपने तवहहुम के काँधों पर लादे सुस्त-क़दम वामाँदा ख़ाक-ब-सर दामान-ए-दरीदा ज़ख़्मी पैरों से काँटों अंगारों पर चलते रहते हैं हम सब एक बड़े क़ब्रिस्ताँ के आवारा भूत हैं जिन के जिस्म तो हाथ लगाने से तहलील ख़ला में हों जिन की रूहों का ज़ाहिर से ज़ाहिर गोशा हाथ न आए हम को माज़ी से विर्से में कोहना क़ब्रें, गिरते मलबे और आसेब-ज़दा खंडरों के ढेर मिले हैं वो रौशन शब-ताब दिए जिन से माज़ी को नूर मिला था इस आसेब-ज़दा माहौल में यूँँ जुलते हैं जैसे इक पुर-हौल बयाबाँ के तीरा सन्नाटे में कुछ भूतों ने रह-गुम-कर्दा सय्याहों को भटकाने की ख़ातिर आग जलाई हो अब ये उजाले सिर्फ़ धुआँ हैं और आसेब-ज़दा खंडरों की छत के चटख़्ते शहतीरों के शोर में कोई हँसता है झड़ता चूना गिरती मिट्टी नीम मुअल्लक़ दीवार-ओ-दर चुपके चुपके रोते हैं ताक़ों के ख़ामोश दिए ज़ुल्मत को बढ़ावा देते हैं सहन के सदहा साल पुराने बूढ़े पेड़ क़ब्रों के बे-दर्द मुजावर बन कर लाशों पर सूखे पत्तों के ढेर लगा देते हैं हम सब अपनी अपनी लाशें अपने अना के दोश पे लादे इक क़ब्रिस्ताँ की पुर-हौल उदासी से उकताए हुए एक नए शमशान का रस्ता ढूँड रहे हैं मुंतज़िर-ए-मर्ग-ए-अम्बोह हुजूम आँखों के ख़ाली कासे खोले हर-सू देख रहा है जाने कब कोई आएगा जो अपने दामन की हवा से भूतों का जलना देखेगा और भयानक साए गले मिल मिल कर खोखली आवाज़ों में रोएँगे इस मंज़र में जाने फिर ऐसा कोई आए कि न आए हज्व वीराँ मायूस निगाहों की ख़ाली झोली फैलाए राख में फूल कुरेदेगा
Waheed Akhtar
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मुतरिब-ए-ख़ुश-नवा ज़िंदगी के हसीन गीत गाता रहा उस की आवाज़ पर अंजुमन झूम उट्ठी उस ने जब ज़ख़्म-ए-दिल को ज़बाँ बख़्श दी सुनने वालों ने बे-साख़्ता आह की इश्क़ के साज़ पर जब हुआ ज़ख़्मा-ज़न शोर-ए-तहसीं में ख़ुद उस की आवाज़ दब सी गई मुतरिब-ए-ख़ुश-नवा फिर भी तन्हा रहा तिश्नगी-ए-मशाम उस को बाद-ए-सबा की तरह गुल-ब-गुल ले गई कासा-ए-चश्म ने परतव-ए-गुल भी पाया नहीं दर्द उस का किसी महरम-ए-दर्द के वास्ते दर-ब-दर शहर-दर-शहर फिरता रहा दाद ओ तहसीं के हंगामा-ए-ज़ौक़-कश में उसे हर तरफ़ से मलामत के पत्थर मिले मुतरिब-ए-ख़ुश-नवा पत्थरों से पटकता रहा अपना सर पत्थरों को ज़बाँ तो मिली पर तकल्लुम नहीं पत्थरों को ख़द-ओ-ख़ाल-ए-इंसाँ मिले दौलत-ए-दर्द-ओ-ग़म कब मिली पत्थरों को हसीं सूरतें तो मिलीं दिल नहीं मिल सका पत्थरों को मिले पाँव पर ए'तिमाद-ए-सफ़र कौन दे पत्थरों को मिले हाथ पर अज़्म-ए-तेशा-ज़नी कौन दे संग सुनते हैं लेकिन समझते नहीं देखते हैं मगर फ़र्क़ करते नहीं बात करते हैं महसूस करते नहीं टूट सकते हैं लेकिन पिघलते नहीं गर्द बन कर ये उड़ जाएँ साँचों में ढलते नहीं मुतरिब-ए-ख़ुश-नवा पत्थरों से पटकता रहा अपना सर मुतरिब-ए-ख़ुश-नवा पत्थरों को सुनाता रहा दर्द-ए-दिल अपना ग़म उन का ग़म सब का ग़म पत्थरों ने सुना और चुप-चाप हँसते रहे पत्थरों की इसी अंजुमन का मुग़न्नी हूँ मैं और बे-दर्द बे-हिस सितमगार पत्थर सुनेंगे कभी उन का वो मुतरिब-ए-ख़ुश-नवा शिकवा-संज-ए-ज़माँ अपने नग़्मात की आग में जल गया फिर उन ही के मानिंद पत्थर का बुत बन गया
Waheed Akhtar
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चेहरे रूहों की बे-माएगी ज़ेहन की तीरगी के सियह आइने सर्द आँखों के तारीक रौज़न में दुबका हुआ इक ख़ला एक सन्नाटा होंटों के बस्ता मकाँ में है सोया हुआ रूह को जेहद-ए-तहसील-ए-ज़र खा गई ज़ेहन की रौशनी ना-उम्मीदी की ज़ुल्मत में धुँदला गई आँखें नाकामियों के खंडर में मकाँ के तसव्वुर से आरी हुईं होंट कश्कोल दरयूज़ा-गर बन के लफ़्ज़ों के इस्मत की दूकाँ बने और अब कुछ नहीं और अब कुछ नहीं एक दीवाना गर ख़्वाहिश-ए-ज़ीस्त है ख़ाल-ओ-ख़त दस्त-ओ-पा सीना-ओ-सर शिकम और ज़ेर-ए-शिकम एक दीवाना गर ख़्वाहिश-ए-ज़ीस्त आ'ज़ा में दौड़ी हुई एक बे-मअ'नी बेकार अपाहिज हवस-ए-जिस्म के ताने-बाने को था में हुए सिर्फ़ उस एक लम्हे की आमद का है इंतिज़ार जब कि ज़ेहनों के रूहों के आइने आँखों में दुबका ख़त और होंटों से लिपटा सुकूत एक बार ख़्वाहिश-ए-ज़ीस्त से कह सकें ज़ीस्त हम पर हमेशा से इल्ज़ाम है हम न ज़िंदा रहे हैं कभी और न ज़िंदा हैं अब एक दीवाना-गर ख़्वाहिश-ए-मर्ग ही थी हमारे लिए ज़िंदगी
Waheed Akhtar
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ज़ेहन जब तक है ख़यालात की ज़ंजीर कहाँ कटती है होंट जब तक हैं सवालात की ज़ंजीर कहाँ कटती है बहस करते रहो लिखते रहो नज़्में ग़ज़लें ज़ेहन पर सदियों से तारी है जो मज्लिस की फ़ज़ा इस ख़ुनुक आँच से क्या पिघलेगी सोच लेने ही से हालात की ज़ंजीर कहाँ कटती है नींद में डूबी हुई आँखों से वाबस्ता ख़्वाब तेज़ किरनों की सिनानों पे ही रुस्वा सर-ए-आम ये शहीद अपनी सलीबों से पलट आते हैं दिल में हर शाम सुब्ह होती है मगर रात की ज़ंजीर कहाँ कटती है दिन गुज़र जाता है बे-फ़ैज़ कद-ओ-काविश में एक अन-देखे जहन्नम की तब-ओ-ताबिश में जिस्म और जाँ की तग-ओ-ताज़ की हर पुर्सिश में दर्द-ओ-ग़म हसरत-ओ-महरूमी की हर काहिश में तलब-ओ-तर्क-ए-तलब सिलसिला-ए-बे-पायाँ मर्ग ही ज़ीस्त का उनवान है हर ख़ून-शुदा ख़्वाहिश में ग़म से भागें भी तो फ़र्याद-ओ-शिकायात की ज़ंजीर कहाँ कटती है वक़्त वो दौलत-ए-नायाब है आता नहीं हाथ हम मशीनों की तरह जीते हैं पाबंदी-ए-औक़ात के साथ वक़्त बे-कार गुज़रता ही चला जाता है कुर्सियों मेज़ों से बे-मा'नी मुलाक़ातों में सैंकड़ों बार की अगली हुई दोहराई हुई बातों में मंदगी रहने की तमन्ना की मुदारातों में शिकम-ओ-जाँ की इबादात की ज़ंजीर कहाँ कटती है सुब्ह से शाम तलक इतने ख़ुदा मिलते हैं हर काफ़िर को सज्दा-ए-शुक्र से इनकार की मोहलत नहीं मिलने पाती सैंकड़ों लाखों ख़ुदाओं की नज़र से छुप कर ख़ुद से मिल लेने की रुख़्सत नहीं मिलने पाती ख़ुद-परस्तों से भी ताआत की ज़ंजीर कहाँ कटती है रात आती है तो दिल कहता है हम अपने हैं ख़ल्वत-ए-ख़्वाब में दुनिया से किनारा कर लें कल भी देना है लहू अपना दिल-ओ-दीदा की झोली भर लें जिस्म के शोर से और रूह की फ़रियाद से दम घुटता है दिन के बे-कार ख़यालात की ज़ंजीर कहाँ कटती है बे-नियाज़ाना भी जीना है फ़क़त एक गुमाँ फ़िक्र-ए-मौजूद को छोड़ें तो ग़म-ए-ना-मौजूद साथ हर साँस के है सिलसिला-ए-हसत-ओ-बूद ग़म-ए-आफ़ाक़ को ठुकराएँ करें तर्क-ए-जहाँ फिर भी ये फ़िक्र कि जीने का हो कोई उनवाँ बे-नियाज़ी से ग़म-ए-ज़ात की ज़ंजीर कहाँ कटती है ज़ेहन में अंधे अक़ीदों की सियाही भर लो ताकि इस नगरी में कभी अफ़्कार के शो'लों का गुज़र हो न सके जब्र का हुक्म सुनो होंटों को अपने सी लो ताकि उन राहों से कभी लफ़्ज़ों का सफ़र हो न सके ज़ेहन-ओ-लब फिर भी नहीं चुप होते उन के ख़ामोश सवालात की पेच-दर-पेच ख़यालात की ज़ंजीर कहाँ कटती है
Waheed Akhtar
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ऐ ख़ुदा ऐ ख़ुदा मैं हूँ मसरूफ़-ए-तस्बीह-ओ-हम्द-ओ-सना गो ब-ज़ाहिर इबादत की आदत नहीं है रिंद-मशरब हूँ ज़ोहद-ओ-रियाज़त से रग़बत नहीं है मगर जब भी चलता है मेरा क़लम जब भी खुलती है मेरी ज़बाँ कुछ कहूँ कुछ लिखूँ तेरी तख़्लीक़ का ज़मज़मा मुद्दआ' मुंतहा हर्फ़ जुड़ कर बनें लफ़्ज़ तो करते हैं तेरी हम्द-ओ-सना या ख़ुदा या ख़ुदा मेरे अतराफ़ हैं पेट ख़ाली बदन-ए-नीम-जाँ कोई तकता है जब मेरा दस्त-ए-तही शर्म आती है मुझ को ख़ुदा-ए-ग़नी सोचता हूँ मैं अपनी ज़बाँ रेहन रख दूँ कहीं रिज़्क़ से ख़ाली पेटों को भर दूँ जो हैं नीम-जाँ उन में जान फूँक दूँ और अपने लिए थोड़ी आसाइशें मोल ले आऊँ बाज़ार से अपने बच्चों की ज़िद पूरी कर दूँ जो वाक़िफ़ नहीं हैं मईशत के अंदाज़-ओ-रफ़्तार से फिर यही सोचता हूँ ख़ुदा ऐ ख़ुदा क्या ज़बाँ रेहन हो कर भी तेरी इता'अत करेगी क्या क़लम बिक के भी नाम तेरा ही लेगा दूसरों को ख़ुदा मान कर वो न करने लगें मा-सिवा की भी हम्द-ओ-सना ऐ ख़ुदा ऐ ख़ुदा है दुआ आख़िरी साँस तक ये क़लम ये ज़बाँ लिखते रहते हैं ला-इलाहा
Waheed Akhtar
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