nazmKuch Alfaaz

चेहरे रूहों की बे-माएगी ज़ेहन की तीरगी के सियह आइने सर्द आँखों के तारीक रौज़न में दुबका हुआ इक ख़ला एक सन्नाटा होंटों के बस्ता मकाँ में है सोया हुआ रूह को जेहद-ए-तहसील-ए-ज़र खा गई ज़ेहन की रौशनी ना-उम्मीदी की ज़ुल्मत में धुँदला गई आँखें नाकामियों के खंडर में मकाँ के तसव्वुर से आरी हुईं होंट कश्कोल दरयूज़ा-गर बन के लफ़्ज़ों के इस्मत की दूकाँ बने और अब कुछ नहीं और अब कुछ नहीं एक दीवाना गर ख़्वाहिश-ए-ज़ीस्त है ख़ाल-ओ-ख़त दस्त-ओ-पा सीना-ओ-सर शिकम और ज़ेर-ए-शिकम एक दीवाना गर ख़्वाहिश-ए-ज़ीस्त आ'ज़ा में दौड़ी हुई एक बे-मअ'नी बेकार अपाहिज हवस-ए-जिस्म के ताने-बाने को था में हुए सिर्फ़ उस एक लम्हे की आमद का है इंतिज़ार जब कि ज़ेहनों के रूहों के आइने आँखों में दुबका ख़त और होंटों से लिपटा सुकूत एक बार ख़्वाहिश-ए-ज़ीस्त से कह सकें ज़ीस्त हम पर हमेशा से इल्ज़ाम है हम न ज़िंदा रहे हैं कभी और न ज़िंदा हैं अब एक दीवाना-गर ख़्वाहिश-ए-मर्ग ही थी हमारे लिए ज़िंदगी

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"भूल जाऊँगा?" मोहब्बत के सारे सितम भूल जाऊँगा? बे-असर से ज़ख़्मों के मरहम भूल जाऊँगा? माना टूटा हूँ पर तू ने सोचा भी कैसे के तुझ को मैं मेरे सनम भूल जाऊँगा तेरा लहरों सा चलना ज़ेहन में बसा है उन आँखों की कैसे शरम भूल जाऊँगा? चलो ना होश रहा के शुरुआत कैसे हुई कैसे कब हुआ मैं ख़तम भूल जाऊँगा माना टूटा हूँ पर तू ने सोचा भी कैसे तेरी पायल का शोर जैसे शहनाई कोई जो पाक़ लगे वो क़दम भूल जाऊँगा? वो सादग़ी तेरी जो नज़रें तक ना मिलीं हँसकर सह गया जो मैं ग़म भूल जाऊँगा? माना टूटा हूँ पर तू ने सोचा भी कैसे हम जुदा नहीं बस फ़ासले दौरानियाँ हैं तुझे याद कर हर जनम भूल जाऊँगा? प्यार मिलता नहीं जीते जी ये सुना है मैं बेहोशी में ये भरम भूल जाऊँगा माना टूटा हूँ पर तू ने सोचा भी कैसे

Rohit tewatia 'Ishq'

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उस का चेहरा सिंपल सादा सा भोला चेहरा है यार क़सम से वो प्यारा चेहरा है पेड़ नदी ये फूल सभी छोड़ो उस को देखो उस का चेहरा है दुनिया लाख हसीन हो सकती है लेकिन उस का चेहरा चेहरा है देख उसे कह डाला हम ने भी बातें प्यारी हैं प्यारा चेहरा है इक तिल होट पे, गाल के नीचे इक और वो चाँद सा नाक पे नूर लिए दो प्यारी आँखें, और सुर्ख़ से लब प्यार मिलाकर अपना रंगों में हम ने बनाया उस का चेहरा है भोली सूरत पे वो अकड़ देखो ग़लती कर के घुमाया चेहरा है रूठ गई जो हम सेे कभी वो दोस्त सब सेे पहले चुराया चेहरा है जब भी उस को चूमने आए हम होट से पहले आया चेहरा है मुँह से इक वो स्वाद नहीं जाता जबसे उस का चूमा चेहरा है रात का होना उस की आँखें हैं दिन का निकलना उस का चेहरा है दुनिया में है उस के चेहरे से है नूर रौशनी लाया उस का चेहरा है हम जैसे भी दरिया करेंगे पार ! अब जो सहारा उस का चेहरा है हम आबाद रहेंगे ऐसे ही हम पे गर साया वो चेहरा है वो चेहरा है बस वो चेहरा है हम को बस वो चेहरा चेहरा है हम ने चाहा बस वो चेहरा है हम ने माँगा बस वो चेहरा है हम ने देखा भी तो वो चेहरा हम ने सोचा बस वो चेहरा है

BR SUDHAKAR

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कमाल कर गया सावन का महीना ,वो चलती सुहानी हवा। और उस हवा में उड़ते गुलाबी दुपट्टे, और लहराते घुंगराले भूरे बालों के बीच, स झांँकता वो ख़ूब-सूरत रूहानी चेहरा, और उस श्यामल देशी चेहरे पर, बड़ी सदाकत और नज़ाकत के साथ सजे, उन मखमली गुलाबी होंठों का, हौले से ये कहना... अजी! सुनते हो! कमाल कर गया

Alankrat Srivastava

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"मकान" कहीं दूर मकाँ बनाऊँगा अपना.. जहाँ ना ये मतलबी लोग हो ना फ़रेबी चेहरे हो जहाँ बस कुछ रिश्ते हो जो सच में अच्छे हो जहाँ चाहे चार दोस्त हो मेरे पर मन के सच्चे हो इस जलन, धोखे, दुख दर्द से भरी और जेहनी तौर पर बीमार दुनिया से पीछा छुड़ाऊँगा अपना कहीं दूर मकाँ बनाऊँगा अपना जहाँ उम्मीद थपकियाँ दे जहाँ सुकून हो राहत हो जहाँ मदद की रौशनी हो हमदर्दी हो...चाहत हो हौसला सुब्ह आवाज़ लगा कर जगाए मेरे ख्वाहिशों के काफिले दिन भर हँसे खिलखिलाए.. जहाँ सहारा बन जाना सबाब का काम हो जहाँ मरहम हो जाना नेकी का काम हो जहाँ खैरात करते हो लोग बेगरज हो कर जहाँ साफ हो दिल और सच्चे जज़्बात हो फिर सब हसरतों के चराग़ों से वो घर सजाऊँगा अपना कहीं दूर मकान बनाऊँगा अपना

Abhishek Bajpei

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"उस सेे कहना" उस सेे कहना बिछड़ गए तो क्या याद तो अब भी आती है उस के लौट आने की उम्मीद अब भी नज़र आती है आधी रात को चाँद जब खिड़कियों से झाँकता है मैं कुछ भी लिखने बैठता हूँ मगर मेरा हाथ काँपता है पता नहीं क्यूँ एक कमी-सी रहती है ये निगाहें उस एक तस्वीर पर थमी-सी रहती है पुराने मैसेज में लबालब भरी मोहब्बत देख कर पिघल जाता है पत्थर वरना तो इस दिल पे बर्फ जमी-सी रहती है गुलज़ार से कहना जैसी उस की एक रात थी वैसी यहाँ हर रोज़ आँख में नमी-सी रहती है मेरी तन्हाई और उस की बे-ए'तिनाई मेरी अधूरी छूटी पड़ी ग़ज़लें और नज़्में वैसे कुछ हिज्र के मुकम्मल शे'र हैं बुझे पड़े दिए हैं जली हुई अँधेर है उस के नाम लिखे गए ख़त मेरे घर की वीरान पड़ी छत तस्वीर से उस की ठोड़ी का तिल और मेरा बिखरा हुआ दिल और वो याद है एक मुरझाया हुआ गुलाब था ना मेरा एक टूटा हुआ ख़्वाब है ना ये सभी रोज़ मेरे बगल में आ कर खड़े हो जाते हैं और मुझ सेे कहते हैं उस सेे कहना दिल टूट गया तो क्या अब भी धड़कता है एक शख़्स तेरे शहर की गलियों में भटकता है ये आँखें उस की मुंतज़िर हैं आज भी जैसे कल थे मुहाजिर हैं आज भी 'इश्क़-ए-सादिक़ तो लापरवाह है ना इश्क़-ए-ना-मुराद ही सही मगर ख़ुदा गवाह है ना इश्क़-ए-मजाज़ी ब-निस्बत इश्क़-ए-इलाही 'अज़ीम है क्या तुम सेे मोहब्बत करना जुर्म-ए-'अज़ीम है उस सेे पूछना था उस सेे पूछना था बहुत कुछ उस सेे कहना था बहुत कुछ कह नहीं पाया उस सेे कहना उस सेे बिछड़ के मैं रह नहीं पाया ऐसा नहीं है भुलाना नहीं चाहता हूँ चाहता हूँ ऐसा नहीं उस के सिवा किसी से मिलना मिलाना नहीं चाहता हूँ चाहता हूँ ऐसा भी नहीं दिखावा करने का शौक़ है मोहब्बत में आशिक़ बनने का शौक़ है मैं तो चाहता हूँ हर फूल को मसल देना मगर बस दिल नहीं करता उस सेे कहना उस के बिना चाँद तारे जुगनू फूल ख़ुशबू क्या उस मह-रू के सामने कोई ख़ुश-रू क्या सब मुक़द्दस होता है मोहब्बत में इश्क़ में बा-वज़ू क्या एक उसी की ख़्वाहिश थी इस दिल को जो पूरी न हो सकी अब तो जो मिल जाए ठीक अब हस्ब-ए-आरज़ू क्या उस सेे कहना मगर फिर भी दिल के एक छोटे से कोने में एक ख़्वाहिश ज़िंदा है उस को अपना कह के पुकारने की हर शब उस की नज़र उतरने की कहने की उस से कि तुम सेे मोहब्बत है मुझे तुम्हारी ज़रूरत है मुझे उस सेे कहना मैं ही नहीं उस को खिड़की दर-ओ-दीवार सब याद करते हैं उस के बारे में रात-रात भर पागल बात करते हैं मुझ सेे ज़्यादा क़लम टेबल पंखा रस्सी सब रोते हैं वो भी उसी की यादों में अक्सर खोए हुए होते हैं वो शर्ट जो उसे पसंद थी, नहीं शर्ट को वो पसंद थी, उस के जाते ही रंग छोड़ दिया इसने वो इत्र जो उस ने दिया था लगाने को कहती थी अब कहीं लगा के जाता हूँ तो ख़ुशबू नहीं आती वो ख़ुशबू इत्र की नहीं थी वो बहाना था महकती तो वो थी मेरे बदन में वो घड़ी जो उस ने दी थी रुक गई उसी दिन जिस दिन मैं वो बिछड़े थे ये दिल-घर उस का जो उस ने सजाया था और फिर तोड़ कर गई थी उस सेे कहना उसे देखने कई किराए दार आए थे काफ़ी अच्छी रक़म दे रहे थे मगर रहने ही नहीं दिए इस की दीवारें चिल्ला पड़ी मुझ पर हर एक मेरी चीज़ मेरी नहीं है अब उस सेे कहना सब उस का है अब सब उसी को चाहते हैं मुझ सेे ज़्यादा इन्हें उस की आदत लग गई है उस सेे कहना आज भी उस की तलाश रहती है वो नहीं मगर उस की याद पास रहती है किसी नए जोड़े को देख कर वो यहाँ होती मेरे कहने से पहले मेरी तन्हाई काश कहती है उस सेे कहना ये कोई इमोशनल ब्लैकमेलिंग नहीं है बस बताना था आज-कल मेरी तबीयत भी बहुत ख़राब रहती है आँखों में प्यास और होंठों पर शराब रहती है बहन तो गुज़र ही गई याद होगा पिताजी थोड़े टूट गए हैं घुटने जाम हो जाते हैं मम्मी का जी थोड़ा और कच्चा हो गया है और तो बस थोड़ी ख़राश रहती है कुछ अच्छा नहीं बनाया सालों से तब से बस जीने के लिए खाते हैं मुझे बड़े डरावने ख़्वाब आते हैं तुम तो कभी निकलती ही नहीं ज़ेहन से पूछना था मैं, बहन, माँ, भाई कोई भी, कभी भी याद आते हैं? उस सेे कहना किसी रोज़ कहीं भी कभी भी अगर मिलने आए तो लौट के मत जाना अगर जाना हो तो मत आना मेरे ये दिल के ज़ख़्म भर भी सकते हैं मगर एक और चोट से हम मर भी सकते हैं कोई पस-ओ-पेश ही नहीं इस बात पर तेरा दीदार ज़रूरी है तेरे साथ से इस लिए ही तो तेरी तस्वीर है आज भी आँसू-ओ-ख़लिश तक़दीर थे कल भी तक़दीर हैं आज भी कभी याद आए तो हाल पूछ लेना बुरा ही सही मेरे बारे में सोच लेना वैसे तो मैं ख़ुद ही जब याद बन जाऊॅंगा तब देखना बहुत याद आऊॅंगा उस सेे कहना बिछड़ गए तो क्या याद तो अब भी आती है लो फिर उस की याद आ गई

Chhayank Tyagi

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मुतरिब-ए-ख़ुश-नवा ज़िंदगी के हसीन गीत गाता रहा उस की आवाज़ पर अंजुमन झूम उट्ठी उस ने जब ज़ख़्म-ए-दिल को ज़बाँ बख़्श दी सुनने वालों ने बे-साख़्ता आह की इश्क़ के साज़ पर जब हुआ ज़ख़्मा-ज़न शोर-ए-तहसीं में ख़ुद उस की आवाज़ दब सी गई मुतरिब-ए-ख़ुश-नवा फिर भी तन्हा रहा तिश्नगी-ए-मशाम उस को बाद-ए-सबा की तरह गुल-ब-गुल ले गई कासा-ए-चश्म ने परतव-ए-गुल भी पाया नहीं दर्द उस का किसी महरम-ए-दर्द के वास्ते दर-ब-दर शहर-दर-शहर फिरता रहा दाद ओ तहसीं के हंगामा-ए-ज़ौक़-कश में उसे हर तरफ़ से मलामत के पत्थर मिले मुतरिब-ए-ख़ुश-नवा पत्थरों से पटकता रहा अपना सर पत्थरों को ज़बाँ तो मिली पर तकल्लुम नहीं पत्थरों को ख़द-ओ-ख़ाल-ए-इंसाँ मिले दौलत-ए-दर्द-ओ-ग़म कब मिली पत्थरों को हसीं सूरतें तो मिलीं दिल नहीं मिल सका पत्थरों को मिले पाँव पर ए'तिमाद-ए-सफ़र कौन दे पत्थरों को मिले हाथ पर अज़्म-ए-तेशा-ज़नी कौन दे संग सुनते हैं लेकिन समझते नहीं देखते हैं मगर फ़र्क़ करते नहीं बात करते हैं महसूस करते नहीं टूट सकते हैं लेकिन पिघलते नहीं गर्द बन कर ये उड़ जाएँ साँचों में ढलते नहीं मुतरिब-ए-ख़ुश-नवा पत्थरों से पटकता रहा अपना सर मुतरिब-ए-ख़ुश-नवा पत्थरों को सुनाता रहा दर्द-ए-दिल अपना ग़म उन का ग़म सब का ग़म पत्थरों ने सुना और चुप-चाप हँसते रहे पत्थरों की इसी अंजुमन का मुग़न्नी हूँ मैं और बे-दर्द बे-हिस सितमगार पत्थर सुनेंगे कभी उन का वो मुतरिब-ए-ख़ुश-नवा शिकवा-संज-ए-ज़माँ अपने नग़्मात की आग में जल गया फिर उन ही के मानिंद पत्थर का बुत बन गया

Waheed Akhtar

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आ'ज़ा का तनासुब रगों में दौड़ते ज़िंदा जवाँ सरशार ख़ूँ की गुनगुनाहट हमें देते हैं दावत इश्क़ की लेकिन हमारी चश्म-ए-आहन-पोश पैराहन-शनासा है लिबासों की मोहब्बत वज़्-ए-पैराहन को सब कुछ मान कर ना-बीना आँखें इश्क़ करती हैं हमारी ज़िंदगी तहज़ीब-ए-पैराहन है ज़ाहिर की परस्तिश है हमारे सारे आदाब-ए-नज़ारा फ़र्ज़ कर लेते हैं इंसाँ बे-बदन है बदन दर-अस्ल इंसाँ है तमद्दुन है मोहब्बत है बदन ही रूह है नूर-ए-हरारत ज़िंदगी है बदन ही का करिश्मा ज़ेहन की तख़्लीक़ तस्ख़ीर-ए-फुलाँ है हमारी चश्म-ए-आहन-पोश पैराहन शनासा है बदन की ताब ला सकती नहीं तहज़ीब-ए-पैराहन न ज़िंदा है न ज़ेहन-ओ-रूह रखती है हमारे बूढ़े कोहना और फ़र्सूदा लिबासों से इबारत हैं हमारे नौजवाँ मग़रिब के ताज़ा फैशनों के चलते फिरते इश्तिहारी हैं बदन मादूम है और बे-बदन रूहें धुआँ हैं बे-बदन अज़हान आसेब-ए-नज़ारा हैं

Waheed Akhtar

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ये भी तिलिस्म-ए-होश-रुबा है ज़िंदा चलते-फिरते हँसते रोते नफ़रत और मोहब्बत करते इंसाँ सिर्फ़ हयूले और धुवें के मर्ग़ूले हैं हम सब अपनी अपनी लाशें अपने तवहहुम के काँधों पर लादे सुस्त-क़दम वामाँदा ख़ाक-ब-सर दामान-ए-दरीदा ज़ख़्मी पैरों से काँटों अंगारों पर चलते रहते हैं हम सब एक बड़े क़ब्रिस्ताँ के आवारा भूत हैं जिन के जिस्म तो हाथ लगाने से तहलील ख़ला में हों जिन की रूहों का ज़ाहिर से ज़ाहिर गोशा हाथ न आए हम को माज़ी से विर्से में कोहना क़ब्रें, गिरते मलबे और आसेब-ज़दा खंडरों के ढेर मिले हैं वो रौशन शब-ताब दिए जिन से माज़ी को नूर मिला था इस आसेब-ज़दा माहौल में यूँँ जुलते हैं जैसे इक पुर-हौल बयाबाँ के तीरा सन्नाटे में कुछ भूतों ने रह-गुम-कर्दा सय्याहों को भटकाने की ख़ातिर आग जलाई हो अब ये उजाले सिर्फ़ धुआँ हैं और आसेब-ज़दा खंडरों की छत के चटख़्ते शहतीरों के शोर में कोई हँसता है झड़ता चूना गिरती मिट्टी नीम मुअल्लक़ दीवार-ओ-दर चुपके चुपके रोते हैं ताक़ों के ख़ामोश दिए ज़ुल्मत को बढ़ावा देते हैं सहन के सदहा साल पुराने बूढ़े पेड़ क़ब्रों के बे-दर्द मुजावर बन कर लाशों पर सूखे पत्तों के ढेर लगा देते हैं हम सब अपनी अपनी लाशें अपने अना के दोश पे लादे इक क़ब्रिस्ताँ की पुर-हौल उदासी से उकताए हुए एक नए शमशान का रस्ता ढूँड रहे हैं मुंतज़िर-ए-मर्ग-ए-अम्बोह हुजूम आँखों के ख़ाली कासे खोले हर-सू देख रहा है जाने कब कोई आएगा जो अपने दामन की हवा से भूतों का जलना देखेगा और भयानक साए गले मिल मिल कर खोखली आवाज़ों में रोएँगे इस मंज़र में जाने फिर ऐसा कोई आए कि न आए हज्व वीराँ मायूस निगाहों की ख़ाली झोली फैलाए राख में फूल कुरेदेगा

Waheed Akhtar

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ऐ ख़ुदा ऐ ख़ुदा मैं हूँ मसरूफ़-ए-तस्बीह-ओ-हम्द-ओ-सना गो ब-ज़ाहिर इबादत की आदत नहीं है रिंद-मशरब हूँ ज़ोहद-ओ-रियाज़त से रग़बत नहीं है मगर जब भी चलता है मेरा क़लम जब भी खुलती है मेरी ज़बाँ कुछ कहूँ कुछ लिखूँ तेरी तख़्लीक़ का ज़मज़मा मुद्दआ' मुंतहा हर्फ़ जुड़ कर बनें लफ़्ज़ तो करते हैं तेरी हम्द-ओ-सना या ख़ुदा या ख़ुदा मेरे अतराफ़ हैं पेट ख़ाली बदन-ए-नीम-जाँ कोई तकता है जब मेरा दस्त-ए-तही शर्म आती है मुझ को ख़ुदा-ए-ग़नी सोचता हूँ मैं अपनी ज़बाँ रेहन रख दूँ कहीं रिज़्क़ से ख़ाली पेटों को भर दूँ जो हैं नीम-जाँ उन में जान फूँक दूँ और अपने लिए थोड़ी आसाइशें मोल ले आऊँ बाज़ार से अपने बच्चों की ज़िद पूरी कर दूँ जो वाक़िफ़ नहीं हैं मईशत के अंदाज़-ओ-रफ़्तार से फिर यही सोचता हूँ ख़ुदा ऐ ख़ुदा क्या ज़बाँ रेहन हो कर भी तेरी इता'अत करेगी क्या क़लम बिक के भी नाम तेरा ही लेगा दूसरों को ख़ुदा मान कर वो न करने लगें मा-सिवा की भी हम्द-ओ-सना ऐ ख़ुदा ऐ ख़ुदा है दुआ आख़िरी साँस तक ये क़लम ये ज़बाँ लिखते रहते हैं ला-इलाहा

Waheed Akhtar

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अगर मैं कहता हूँ जीना है क़ैद-ए-तन्हाई तो ज़िंदगानी की क़ीमत पे हर्फ़ क्यूँँ आए अगर न आया मुझे साज़गार वस्ल-ए-हबीब तो ए'तिमाद-ए-मोहब्बत पे हर्फ़ क्यूँँ आए अगर मिले मुझे विर्से में कुछ शिकस्ता खंडर तो काएनात की वुसअत पे हर्फ़ क्यूँँ आए अगर दिखाई दिए मुझ को आदमी आसेब तो अस्र-ए-नौ की बसीरत पे हर्फ़ क्यूँँ आए अगर न राह-ए-यक़ीं पा सकी मिरी तश्कीक तो फ़िक्र-ओ-फ़न की शराफ़त पे हर्फ़ क्यूँँ आए अगर ख़िज़ाँ ही मिली मुझ को आँख खुलने पर तो फ़स्ल-ए-गुल की अमानत पे हर्फ़ क्यूँँ आए अगर मिरे ग़म-ए-बे-नाम को मिली वहशत तो बज़्म-ए-जश्न-ए-मसर्रत पे हर्फ़ क्यूँँ आए मैं अपने अहद का हूँ नौहा-ख़्वाँ न दीजे दाद क़सीदा-ख़्वाँ की रिवायत पे हर्फ़ क्यूँँ आए अगर हुनर है मिरा जिंस-ए-कम-अयार तो हो ज़मीर-ओ-दिल की तिजारत पे हर्फ़ क्यूँँ आए मैं अपने ख़्वाबों का भटका हुआ मुसाफ़िर हूँ अगर मुझे न मिली मंज़िल-ए-नजात तो क्या मैं अपनी रूह की तन्हाइयों का शोअ'ला हूँ हवा-ए-दहर में हासिल नहीं सबात तो क्या मैं अपनी तुर्फ़गी-ए-तब्अ' का तो पी लूँ ज़हर जो दस्तरस में नहीं चश्मा-ए-हयात तो क्या मैं अपनी ज़ात की ख़ल्वत का हैरती ही सही जो मुझ पे खुल न सका राज़-ए-काएनात तो क्या मैं अपने ख़ूँ के चराग़ों को रौशनी दे दूँ सहर-नसीब न हो पाए मेरी रात तो क्या मैं आप से न कहूँगा कि है ज़ियाँ जाँ का ख़याल-ए-शीशा-ए-दिल संग-आज़मा न करे मैं आप से नहीं चाहूँगा दाद-ए-जाँ-बाज़ी दुआ है आप को ग़म दर्द-आश्ना न करे मैं आप से नहीं माँगूँगा ख़ूँ-बहा-ए-वफ़ा कोई तो तर्क रह-ओ-रस्म-ए-आशिक़ाना करे मैं आप को न दिखाऊँगा अपने ज़ख़्मी ख़्वाब ख़लल हो आप के आराम में ख़ुदा न करे मगर ज़मीन परोमीथियस को क्यूँँ रोके जो वो जहाँ के ख़ुदाओं से जंग करता है उसे न मौत के आसेब पास आने दें जो आसमानों से ले कर हयात उतरता है है डर पिघलने का देखें इधर न बर्फ़ के बुत जो कोई शोला-ए-उर्यां ये हाथ धरता है अज़ाब उस पे करें कम न क़हर के देवता जो अपनी आग में जल कर भी रक़्स करता है इसे न माने कभी बे-हिसी हयात-परस्त हर एक साँस पे जो ज़िंदा हो के मरता है करें न आप मुदावा-ए-सोज़-ए-आतिश-ए-ग़म ये ज़ुल्म मुझ पे तो हर रोज़-ओ-शब गुज़रता है सलामत आप का ईमान मैं तो हूँ काफ़िर हर एक वज़्अ'' से अपनी हयात करता है

Waheed Akhtar

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