nazmKuch Alfaaz

मोती हो कि शीशा जाम कि दूर जो टूट गया सो टूट गया कब अश्कों से जुड़ सकता है जो टूट गया सो छूट गया तुम नाहक़ टुकड़े चुन चुन कर दामन में छुपाए बैठे हो शीशों का मसीहा कोई नहीं क्या आस लगाए बैठे हो शायद कि इन्हीं टुकड़ों में कहीं वो साग़र-ए-दिल है जिस में कभी सद-नाज़ से उतरा करती थी सहबा-ए-ग़म-ए-जानाँ की परी फिर दुनिया वालों ने तुम से ये साग़र ले कर फोड़ दिया जो मय थी बहा दी मिट्टी में मेहमान का शहपर तोड़ दिया ये रंगीं रेज़े हैं शायद उन शोख़ बिलोरीं सपनों के तुम मस्त जवानी में जिन से ख़ल्वत को सजाया करते थे नादारी दफ़्तर भूक और ग़म उन सपनों से टकराते रहे बे-रहम था चौमुख पथराओ ये काँच के ढाँचे क्या करते या शायद इन ज़र्रों में कहीं मोती है तुम्हारी इज़्ज़त का वो जिस से तुम्हारे इज्ज़ पे भी शमशाद-क़दों ने रश्क किया इस माल की धुन में फिरते थे ताजिर भी बहुत रहज़न भी कई है चोर-नगर याँ मुफ़लिस की गर जान बची तो आन गई ये साग़र शीशे लाल-ओ-गुहर सालिम हों तो क़ीमत पाते हैं यूँँ टुकड़े टुकड़े हों तो फ़क़त चुभते हैं लहू रुलवाते हैं तुम नाहक़ शीशे चुन चुन कर दामन में छुपाए बैठे हो शीशों का मसीहा कोई नहीं क्या आस लगाए बैठे हो यादों के गिरेबानों के रफ़ू पर दिल की गुज़र कब होती है इक बख़िया उधेड़ा एक सिया यूँँ उम्र बसर कब होती है इस कार-गह-ए-हस्ती में जहाँ ये साग़र शीशे ढलते हैं हर शय का बदल मिल सकता है सब दामन पुर हो सकते हैं जो हाथ बढ़े यावर है यहाँ जो आँख उठे वो बख़्तावर याँ धन-दौलत का अंत नहीं हों घात में डाकू लाख मगर कब लूट-झपट से हस्ती की दूकानें ख़ाली होती हैं याँ परबत-परबत हीरे हैं याँ सागर सागर मोती हैं कुछ लोग हैं जो इस दौलत पर पर्दे लटकाते फिरते हैं हर पर्बत को हर सागर को नीलाम चढ़ाते फिरते हैं कुछ वो भी हैं जो लड़ भिड़ कर ये पर्दे नोच गिराते हैं हस्ती के उठाई-गीरों की हर चाल उलझाए जाते हैं इन दोनों में रन पड़ता है नित बस्ती-बस्ती नगर-नगर हर बस्ते घर के सीने में हर चलती राह के माथे पर ये कालक भरते फिरते हैं वो जोत जगाते रहते हैं ये आग लगाते फिरते हैं वो आग बुझाते रहते हैं सब साग़र शीशे लाल-ओ-गुहर इस बाज़ी में बद जाते हैं उट्ठो सब ख़ाली हाथों को इस रन से बुलावे आते हैं

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है

Sohaib Mugheera Siddiqi

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हम परवरिश-ए-लौह-ओ-क़लम करते रहेंगे जो दिल पे गुज़रती है रक़म करते रहेंगे असबाब-ए-ग़म-ए-इश्क़ बहम करते रहेंगे वीरानी-ए-दौराँ पे करम करते रहेंगे हाँ तल्ख़ी-ए-अय्याम अभी और बढ़ेगी हाँ अहल-ए-सितम मश्क़-ए-सितम करते रहेंगे मंज़ूर ये तल्ख़ी ये सितम हम को गवारा दम है तो मुदावा-ए-अलम करते रहेंगे मय-ख़ाना सलामत है तो हम सुर्ख़ी-ए-मय से तज़ईन-ए-दर-ओ-बाम-ए-हरम करते रहेंगे बाक़ी है लहू दिल में तो हर अश्क से पैदा रंग-ए-लब-ओ-रुख़्सार-ए-सनम करते रहेंगे इक तर्ज़-ए-तग़ाफ़ुल है सो वो उन को मुबारक इक अर्ज़-ए-तमन्ना है सो हम करते रहेंगे

Faiz Ahmad Faiz

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गुज़र रहे हैं शब ओ रोज़ तुम नहीं आतीं रियाज़-ए-ज़ीस्त है आज़ुरदा-ए-बहार अभी मिरे ख़याल की दुनिया है सोगवार अभी जो हसरतें तिरे ग़म की कफ़ील हैं प्यारी अभी तलक मिरी तन्हाइयों में बस्ती हैं तवील रातें अभी तक तवील हैं प्यारी उदास आँखें तिरी दीद को तरसती हैं बहार-ए-हुस्न पे पाबंदी-ए-जफ़ा कब तक ये आज़माइश-ए-सब्र-ए-गुरेज़-पा कब तक क़सम तुम्हारी बहुत ग़म उठा चुका हूँ मैं ग़लत था दावा-ए-सब्र-ओ-शकेब आ जाओ क़रार-ए-ख़ातिर-ए-बेताब थक गया हूँ मैं

Faiz Ahmad Faiz

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चलो फिर से मुस्कुराएँ चलो फिर से दिल जलाएँ जो गुज़र गई हैं रातें उन्हें फिर जगा के लाएँ जो बिसर गई हैं बातें उन्हें याद में बुलाएँ चलो फिर से दिल लगाएँ चलो फिर से मुस्कुराएँ किसी शह-नशीं पे झलकी वो धनक किसी क़बा की किसी रग में कसमसाई वो कसक किसी अदा की कोई हर्फ़-ए-बे-मुरव्वत किसी कुंज-ए-लब से फूटा वो छनक के शीशा-ए-दिल तह-ए-बाम फिर से टूटा ये मिलन की ना मिलन की ये लगन की और जलन की जो सही हैं वारदातें जो गुज़र गई हैं रातें जो बिसर गई हैं बातें कोई उन की धुन बनाएँ कोई उन का गीत गाएँ चलो फिर से मुस्कुराएँ चलो फिर से दिल जलाएँ

Faiz Ahmad Faiz

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मुझे मोजज़ों पे यक़ीं नहीं मगर आरज़ू है कि जब क़ज़ा मुझे बज़्म-ए-दहरस ले चले तो फिर एक बार ये इज़्न दे कि लहद से लौट के आ सकूँ तिरे दर पे आ के सदा करूँँ तुझे ग़म-गुसार की हो तलब तो तिरे हुज़ूर में आ रहूँ ये न हो तो सूए-ए-रह-ए-अदम मैं फिर एक बार रवाना हूँ

Faiz Ahmad Faiz

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इस वक़्त तो यूँँ लगता है अब कुछ भी नहीं है महताब न सूरज, न अँधेरा न सवेरा आँखों के दरीचों पे किसी हुस्न की चिलमन और दिल की पनाहों में किसी दर्द का डेरा मुमकिन है कोई वहम था, मुमकिन है सुना हो गलियों में किसी चाप का इक आख़िरी फेरा शाख़ों में ख़यालों के घने पेड़ की शायद अब आ के करेगा न कोई ख़्वाब बसेरा इक बैर न इक मेहर न इक रब्त न रिश्ता तेरा कोई अपना, न पराया कोई मेरा माना कि ये सुनसान घड़ी सख़्त कड़ी है लेकिन मिरे दिल ये तो फ़क़त इक ही घड़ी है हिम्मत करो जीने को तो इक उम्र पड़ी है

Faiz Ahmad Faiz

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