उर्दू हिन्दी प्यारी बहनें प्यार का गहना दोनों पहनें एक है इन का घर और आँगन फूल खिले हैं गुलशन गुलशन भारत माँ की राज दुलारी दोनों बहनें प्यारी प्यारी गीत एकता के ये गाएँ भेद भाव को दूर भगाएँ हर दिल पर इन की है हुकूमत सब करते हैं इन से मोहब्बत भेद जो कोई इन में बताए वो मूरख जग में कहलाए 'तुलसी' ग़ालिब 'मीर' 'कबीरा' इन के आशिक़ 'रहमन' मीरा प्यार की बातें हम को सिखाएँ सीधी सच्ची राह बताएँ
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती
Abrar Kashif
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'हमारी बे-वफ़ा हम सफ़र' बे-सबब प्यार करते हैं तुझ से हम ने ये भी जताया नहीं है कब से तू ने निकाला है दिल से तू ने अब तक बताया नहीं है अपने चेहरे से चिलमन हटा ले हम ने जी भर के देखा नहीं है प्यार होगा मुकम्मल ये कैसे साथ तू ने निभाया नहीं है हम तेरे हैं तेरे ही रहेंगे तू ने अपना ही समझा नहीं है हम तो मजनूँ हुए तेरी ख़ातिर तुझ को हम ने सताया नहीं है प्यार के तोहफ़े हम ने जो दी हैं तू ने उस को भी रक्खा नहीं है रंजिशों में ही छोड़ा है तू ने हम ने मातम मनाया नहीं है बे-वफ़ा तू है 'दानिश' के दिल में तेरे दिल में क्यूँ 'दानिश' नहीं है तेरी ख़ातिर ये जाँ भी है हाज़िर तुझ को जुमला सुनाया नहीं है
Danish Balliavi
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उर्दू है मिरा नाम मैं 'ख़ुसरव' की पहेली मैं 'मीर' की हमराज़ हूँ 'ग़ालिब' की सहेली दक्कन के 'वली' ने मुझे गोदी में खेलाया 'सौदा' के क़सीदों ने मिरा हुस्न बढ़ाया है 'मीर' की अज़्मत कि मुझे चलना सिखाया मैं दाग़ के आंगन में खिली बन के चमेली उर्दू है मिरा नाम मैं 'ख़ुसरव' की पहेली 'ग़ालिब' ने बुलंदी का सफ़र मुझ को सिखाया 'हाली' ने मुरव्वत का सबक़ याद दिलाया 'इक़बाल' ने आईना-ए-हक़ मुझ को दिखाया 'मोमिन' ने सजाई मिरे ख़्वाबों की हवेली उर्दू है मिरा नाम मैं 'ख़ुसरव' की पहेली है 'ज़ौक़' की अज़्मत कि दिए मुझ को सहारे 'चकबस्त' की उल्फ़त ने मिरे ख़्वाब सँवारे 'फ़ानी' ने सजाए मिरी पलकों पे सितारे 'अकबर' ने रचाई मिरी बे-रंग हथेली उर्दू है मिरा नाम मैं 'ख़ुसरव' की पहेली क्यूँ मुझ को बनाते हो तअस्सुब का निशाना मैं ने तो कभी ख़ुद को मुसलमां नहीं माना देखा था कभी मैं ने भी ख़ुशियों का ज़माना अपने ही वतन में हूँ मगर आज अकेली उर्दू है मिरा नाम मैं 'ख़ुसरव' की पहेली
Iqbal Ashhar
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इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताज-महल सारी दुनिया को मोहब्बत की निशानी दी है इस के साए में सदा प्यार के चर्चे होंगे ख़त्म जो हो न सकेगी वो कहानी दी है इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताज-महल ताज वो शम्अ' है उल्फ़त के सनम-ख़ाने की जिस के परवानों में मुफ़्लिस भी हैं ज़रदार भी हैं संग-ए-मरमर में समाए हुए ख़्वाबों की क़सम मरहले प्यार के आसाँ भी हैं दुश्वार भी हैं दिल को इक जोश इरादों को जवानी दी है इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताज-महल ताज इक ज़िंदा तसव्वुर है किसी शाएर का उस का अफ़्साना हक़ीक़त के सिवा कुछ भी नहीं इस के आग़ोश में आ कर ये गुमाँ होता है ज़िंदगी जैसे मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं ताज ने प्यार की मौजों को रवानी दी है इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताज-महल ये हसीं रात ये महकी हुई पुर-नूर फ़ज़ा हो इजाज़त तो ये दिल इश्क़ का इज़हार करे इश्क़ इंसान को इंसान बना देता है किस की हिम्मत है मोहब्बत से जो इनकार करे आज तक़दीर ने ये रात सुहानी दी है इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताज महल सारी दुनिया को मोहब्बत की निशानी दी है इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताज-महल
Shakeel Badayuni
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प्यार वफ़ा के दीप जलाएँ घर को अपने स्वर्ग बनाएँ खेलें कूदें और मुस्काएँ देख के ख़ुश हों जिस को माएँ पहला मकतब घर है हमारा दर्स उसी से हम सब पाएँ जिस से मिलें फल इल्म के हम को इस में ऐसे पौदे लगाएँ पहले माँ और बाप से सीखें फिर सब को आदाब सिखाएँ जो भी हमारे घर में आए प्यार से उस को दिल में बिठाएँ बात करें हम मीठी मीठी लफ़्ज़ों के हम फूल खिलाएँ अपने हों या बेगाने हों सब को अपना दोस्त बनाएँ ख़ुश होंगे माँ-बाप हमारे आओ हम ऐसे बन जाएँ और फिर इस के आगे चल कर देश-पुजारी हम कहलाएँ नाम हो रौशन जिस से घर का ऐसे सुंदर दीप जलाएँ
Jauhar Rahmani
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आओ बच्चो बातें बताओ देश का अपने नक़्शा बनाओ गंगा नदी है कहाँ से निकली कहाँ कहाँ ये जा कर फैली संगम का वो कौन नगर है जिस पर सब की लगी नज़र है झांसी क्यूँ मशहूर हुई है किस के नाम से वो चमकी है कैसे अमर पंजाब बना है कौन वहाँ मशहूर हुआ है कहाँ हुए गाँधी जी पैदा काम उन्हों ने किए हैं क्या क्या कौन थे 'शौकत' कौन थे 'जौहर' क्यूँ है इन का चर्चा घर घर पैदा हुए 'अश्फ़ाक़' कहाँ पर नाम है क्यूँ हर एक ज़बाँ पर देश का अपने कौन नगर है जो जन्नत से भी बढ़ कर है दिल्ली को हम क्या हैं कहते जहाँ सफ़ीर हर मुल्क के रहते
Jauhar Rahmani
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प्यारा प्यारा भोला बचपन खेला जो माँ बाप के आँगन प्यारी भोली बातें इस की सपनों वाली रातें इस की पानी को कहता है मानी दौड़ के लाए उस की नानी रोटी माँगे आटी कह कर दोस्ती तोड़े कट्टी कह कर ज़िद पर अपनी जब आ जाए अपनी सी कर के वो दिखाए प्यारे प्यारे इस के खिलौने खेले गुड्डू और सलोने सब पे हुकूमत इस की रहती कोई बात न इस की टलती गिरता पड़ता और सँभलता रोता-धोता और मचलता
Jauhar Rahmani
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दादी अम्माँ जल्दी आओ आ कर एक कहानी सुनाओ आओ बैठो पास हमारे शाही शालू पप्पी दुलारे इक बच्चा था नेक और अच्छा दिल का साफ़ ज़बाँ का सच्चा माँ से अपनी कर के मिन्नत सफ़र की माँगी उस ने इजाज़त माँ ने रक़म सदरी में सी कर कर दिया रुख़्सत आँसू पी कर चलते चलते की ये नसीहत चाहे जितनी आए मुसीबत झूट कभी लब पर मत आए चाहे जान भले ही जाए चला सफ़र पर जब वो बच्चा मन का साफ़ ज़बाँ का सच्चा रस्ते में कुछ डाकू आए ज़ुल्म-ओ-सितम हर इक पर ढाए आख़िर में बच्चे से पूछा पास तिरे जो कुछ हो बतला बच्चे ने कुछ ख़ौफ़ न खाया जो कुछ सच था उन को बताया चीर के सदरी रक़म दिखा दी माँ की नसीहत उन को बता दी बच्चे की जो देखी सदाक़त पाई उस डाकू ने नसीहत तौबा बुरे कामों से कर ली और ईमान से झोली भर ली शैख़ अबदुल-क़ादिर जीलानी दुनिया उन्हें इस नाम से जानी
Jauhar Rahmani
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अब की गर्मी की छुट्टी में या'नी इस गुज़री गर्मी में गए लखनऊ हम ख़ाला के घर देखे तरह तरह के मंज़र भूल-भुलय्याँ हम ने देखी जा के न निकले जिस में कोई देखा हुसैनाबाद का फाटक देखा सिनेमा देखा नाटक लाट शहीदों वाली देखी पार्क गए हम हाथी वाली कौंसिल चैम्बर देखा हम ने ज़ू भी जा कर भालू देखे नाच दिखाते कालू देखे बेली-गारद हम ने देखी जिस में चले थे गोले गोली गए अमीनाबाद भी यारो और हुए हम शाद भी यारो गंज की हम ने सैर भी कर ली हर मंज़र से झोली भर ली गुज़रे क़ैसर-बाग़ से हो कर चार-बाग़ का चलता मंज़र देख के हर मंज़र को आए लौट के अपने घर को आए
Jauhar Rahmani
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