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वही नर्म लहजा जो इतना मुलाएम है जैसे धनक गीत बन के समाअ'त को छूने लगी हो शफ़क़ नर्म कोमल सुरों में कोई प्यार की बात कहने चली हो किस क़दर रंग-ओ-आहंग का किस क़दर ख़ूब-सूरत सफ़र वही नर्म लहजा कभी अपने मख़्सूस अंदाज़ में मुझ से बातें करेगा तो ऐसा लगे जैसे रेशम के झूले पे कोई मधुर गीत हलकोरे लेने लगा हो वही नर्म लहजा किसी शोख़ लम्हे में उस की हँसी बन के बिखरे तो ऐसा लगे जैसे क़ौस-ए-क़ुज़ह ने कहीं पास ही अपनी पाज़ेब छनकाई है हँसी को वो रिम-झिम कि जैसे फ़ज़ा में बनफ़्शी चमकदार बूंदों के घुँघरू छनकने लगे हों कि फिर उस की आवाज़ का लम्स पा के हवाओं के हाथों में अन-देखे कंगन खनकने लगे हों वही नर्म लहजा मुझे छेड़ने पर जब आए तो ऐसा लगेगा जैसे सावन की चंचल हवा सब्ज़ पत्तों के झाँझन पहन सुर्ख़ फूलों की पायल बजाती हुई मेरे रुख़्सार को गाहे गाहे शरारे से छूने लगे मैं जो देखूँ पलट के तो वो भाग जाए मगर दूर पेड़ों में छुप कर हँसे और फिर नन्हे बच्चों की मानिंद ख़ुश हो के ताली बजाने लगे वही नर्म लहजा कि जिस ने मिरे ज़ख़्म-ए-जाँ पे हमेशा शगुफ़्ता गुलाबों की शबनम रखी है बहारों के पहले परिंदे की मानिंद है जो सदा आने वाले नए सुख के मौसम का क़ासिद बना है उसी नर्म लहजे ने फिर मुझ को आवाज़ दी है

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइ‌नात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है

Divya 'Kumar Sahab'

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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है

Sohaib Mugheera Siddiqi

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"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं

Divya 'Kumar Sahab'

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अंदेशों के दरवाज़ों पर कोई निशान लगाता है और रातों रात तमाम घरों पर वही सियाही फिर जाती है दुख का शब ख़ूँ रोज़ अधूरा रह जाता है और शनाख़्त का लम्हा बीतता जाता है मैं और मेरा शहर-ए-मोहब्बत तारीकी की चादर ओढ़े रौशनी की आहट पर कान लगाए कब से बैठे हैं घोड़ों की टापों को सुनते रहते हैं हद-ए-समाअत से आगे जाने वाली आवाज़ों के रेशम से अपनी रू-ए-सियाह पे तारे काढ़ते रहते हैं अँगुश्ता ने इक इक कर के छलनी होने को आए अब बारी अंगुश्त-ए-शहादत की आने वाली है सुब्ह से पहले वो कटने से बच जाए तो!

Parveen Shakir

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मुसाहिब-ए-शाह से कहो कि फ़क़ीह-ए-आज़म भी आज तस्दीक़ कर गए हैं कि फ़स्ल फिर से गुनाहगारों की पक गई है हुज़ूर की जुम्बिश-ए-नज़र के तमाम जल्लाद मुंतज़िर हैं कि कौन सी हद जनाब जारी करें तो तामील-ए-बंदगी हो कहाँ पे सर और कहाँ पे दस्तार उतारना अहसन-उल-अमल है कहाँ पे हाथों कहाँ ज़बानों को क़त्अ कीजिए कहाँ पे दरवाज़ा रिज़्क़ का बंद करना होगा कहाँ पे आसाइशों की भूखों को मार दीजे कहाँ बटेगी लुआन की छूट और कहाँ पर रज्म के अहकाम जारी होंगे कहाँ पे नौ साला बच्चियां चहल साला मर्दों के साथ संगीन में पिरोने का हुक्म होगा कहाँ पे इक़बाली मुलज़िमों को किसी तरह शक का फ़ाएदा हो कहाँ पे मासूम दार पर खींचना पड़ेगा हुज़ूर अहकाम जो भी जारी करेंगे फ़क़त इल्तिजा ये होगी कि अपने इरशाद-ए-आलिया को ज़बानी रखें वगरना कानूनी उलझनें हैं!

Parveen Shakir

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दिल-आज़ारी भी इक फ़न है और कुछ लोग तो सारी ज़िंदगी इसी की रोटी खाते हैं चाहे उन का बुर्ज कोई हो अक़रब ही लगते हैं तीसरे दर्जे के पीले अख़बारों पर ये अपनी यर्क़ानी सोचों से और भी ज़र्दी मलते रहते हैं माला बारी केबिन हों या पाँच सितारा होटल कहीं भी क़य करने से बाज़ नहीं आते ऊपर से इस अमल को फ़िक़रे-बाज़ी कहते हैं जिस का पहला निशाना उमूमन बिल को अदा करने वाला साथी होता है! अपने अपने कुँवें को बहर-ए-आज़म कहने और समझने वाले ये नन्हे मेंडक हर हाथी को देख के फूलने लगे हैं और जब फटने वाले हों तो हाथी की आँखों पर फबती कसने लगे हैं कव्वे भी अंडे खाने के शौक़ को अपने फ़ाख़्ता के घर जा कर पूरा करते हैं लेकिन ये वो साँप हैं जो कि अपने बच्चे ख़ुद ही चट कर जाते हैं कभी कभी मैं सोचती हूँ कि साँपों की ये ख़सलत मालिक-ए-जिंन-ओ-इन्स की, इंसानों के हक़ में कैसी बे-पायाँ रहमत है!

Parveen Shakir

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गुड़िया सी ये लड़की जिस की उजली हँसी से मेरा आँगन दमक रहा है कल जब सात समुंदर पार चली जाएगी और साहिली शहर के सुर्ख़ छतों वाले घर के अंदर पूरे चाँद की रौशनी बन कर बिखरेगी हम सब उस को याद करेंगे और अपने अश्कों के सच्चे मोतियों से सारी उम्र इक ऐसा सूद उतारते जाएँगे जिस का अस्ल भी हम पर क़र्ज़ नहीं था!

Parveen Shakir

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पैरों की मेहँदी मैं ने किस मुश्किल से छुड़ाई थी और फिर बैरन ख़ुश्बू की कैसी-कैसी विनती की थी प्यारी धीरे-धीरे बोल सावन, भरा घर जाग उठेगा लेकिन जब उस के आने की घड़ी हुई सुब्ह से ऐसी झड़ी लगी उम्र में पहली बार मुझे बारिश अच्छी नहीं लगी बारिश में क्या तन्हा भीगना लड़की बारिश में क्या तन्हा भीगना लड़की उसे बुला जिस की चाहत में तेरा तन-मन भीगा है प्यार की बारिश से बढ़कर क्या बारिश होगी और जब उस बारिश के बा'द हिज्र की पहली धूप खुलेगी तुझ पर रंग के इस्म खुलेंगे

Parveen Shakir

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