"ऊपर पंखा चलता है" वो ऊपर पंखा चलता है और नीचे बेबी सोता है जब पंखा बंद ये होता है तब बेबी जाग उठ रोता है फिर इक दिन ऐसा आएगा बेबी ये बड़ा हो जाएगा इसे दुनिया समझ आ जाएगी कोई बात बड़ा इसे खाएगी कुछ दिन तो ये बस रो लेगा दुनिया के माफ़िक हो लेगा कुछ हद तक तो ये सह लेगा कुछ दिन तन्हा भी रह लेगा ये दुख तकलीफ़ें झेलेगा पर मुँह से कुछ नहीं बोलेगा जब ग़म हद से बढ़ जाएगा ये कुछ भी सह नहीं पाएगा जब हर दिन इस को खटकेगा ये बैठा बैठा भटकेगा फिर इक दिन यूँँ ही बे-मतलब ये घर की छत को देखेगा फिर छत से हटकर ध्यान इस का आ कर पंखे पर अटकेगा ये तब पंखे पर लटकेगा तब पंखा चलता जाएगा बेबी सोता रह जाएगा तब लाख करो पंखे को बंद फिर बेबी उठ नहीं पाएगा सब बैठ के इस को रोएँगे और बेबी चुप हो जाएगा ये खेल अज़ल से चलता है सदियों से यही सब होता है वो ऊपर पंखा चलता है और नीचे बेबी सोता है
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"बन्दा और ख़ुदा" एक मुख़्तसर सी कहानी है जो ज़फ़र कि मुँह-ज़बानी है ये हुकूमत आसमानी है हर मख़्लूक़ रूहानी है ये ख़ुदा की मेहरबानी है की सज्दों में झुकती पेशानी है ये सारी दुनिया फ़ानी है हर शख़्स को मौत आनी है ये इंसानियत अय्याशी की दीवानी है हर शख़्स की ढलती जवानी है क़ुदरत की पकड़ से कोई नहीं बचा ये आ रहे अज़ाब क़यामत की निशानी है ये लोगों की गुमराही और बड़ी नादानी है की कहाँ ऊपर ख़ुदा को शक्ल हमें दिखानी है
ZafarAli Memon
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"एक लड़का" एक छोटा सा लड़का था मैं जिन दिनों एक मेले में पहुँचा हुमकता हुआ जी मचलता था एक एक शय पर जैब ख़ाली थी कुछ मोल ले न सका लौट आया लिए हसरतें सैंकड़ों एक छोटा सा लड़का था मैं जिन दिनों ख़ैर महरूमियों के वो दिन तो गए आज मेला लगा है उसी शान से आज चाहूँ तो इक इक दुकाँ मोल लूँ आज चाहूँ तो सारा जहाँ मोल लूँ ना-रसाई का अब जी में धड़का कहाँ पर वो छोटा सा अल्हड़ सा लड़का कहाँ
Ibn E Insha
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"ख़्वाबों की तन्हाई" क्या तुम्हें नींद आती है? क्या तुम्हें ख़्वाब आते है? क्या तुम रातों को सो जाती हो? मैं? नहीं मैं ऐसा नहीं कर सकता मेरी तो नींद तुम्हारी है ना मेरे तो ख़्वाब भी तुम्हारे है ख़ैर अब इन ख़्वाबों में एक तन्हाई है तन्हाई? हम्म्म, अच्छा तन्हाई क्या है? तुम नहीं जानती? हाँ, तुम तो ख़्वाब देखने वाली हो ना तुम ने मेरे कमरा भी तो नहीं देखा ये बिस्तर ये दीवारें किताबें अधूरी जली सिगरेट चाय के छींटों से भरे कप ये बेवजह शोर करता हुआ फेन ये टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक, टिक टिक टिक टिक ! ये टिक टिक करती घड़ी जो मौत के आने की ख़बर देती है ये बिस्तर के चारों तरफ़ फैला सन्नाटा ये खिंडकियों से झाँकता धूप का ख़ाली-पन ये मोबाइल जो आधे वक़्त अब बंद ही रहता है तेरे बा'द किसी से बात नहीं की मैं ने अब कोई मुझे भी कॉल नहीं करता ये मोबाइल लाश के जैसे बिस्तर पर पड़ा है किसी रोज़ इस का भी जनाज़ा उठायेंगे ख़ैर छोड़ो ये सब ये क्यूँ किसी की आँखों में ख़्वाब नहीं है क्यूँ किसी के ख़्वाबों में बस आँखें है अरे तुम भी ना! छोड़ो ये सब मैं तुम्हें क्या बता रहा था वैसे? हाँ तन्हाई! तन्हाई सुकून से बनी वो बेतरतीब शह है जो कुन की यकताई का मौजज़ा है ख़्वाबों का सन्नाटा सुना है? उस सन्नाटे को समेट कर एक पेकर में डालो तब जा कर तन्हाई बनती है, चाय से भरे ठंडे कप देखे है? हाँ, वो ठंड तन्हाई है, तुम ने सुना है परिंदों की चह-चहाहट? उन के परों का फड़-फड़ाना? क्या तुम ने बादल आते देखें हैं? क्या तुम ने देखा है केसे कोई बूँद अपने जिस्म की रूह को छोड़ कर ज़मीं की तरफ़ दौड़ी चली आती है? क्या तुम ने देखा है केसे वो बूँद ज़मीं पर गिर कर उसी की हो कर रह जाती है, तुम ख़्वाब देखती हो ना? चलो तो फिर बताओ क्या क्या देखती हों? क्या देखा है तुम ने किसी रूह से उस के दिल का निकल जाना? क्या देखा है तुम ने रक़्स करता हुआ हिज्र? क्या देखा है तुम ने क़ैस को समुंदर पर चलते? क्या देखा है तुम ने कुन के बा'द किसी का न बनना? क्या देखा है तुम ने उन हक़ीक़तों को जो हक़ीक़त से दूर है? क्या देखा है तुम ने टूटी पत्तियों का फिर से शाखों पर चले जाना? क्या देखा है तुम ने आँसुओं से आँखों का बहना? क्या देखा है तुम ने उन गुलदस्तों को जो माज़ी को समेट कर बनाए गए? क्या देखा है तुम ने तारों को आसमाँ से ख़ाली होते? क्या देखा है तुम ने केसे हँसते हँसते कोई दर्द छुपाता है? क्या देखा है तुम ने फूलों को किताबों में लाल होते? क्या देखा है तुम ने लाल लहू का सफ़ेद होना? क्या देखा है तुम ने सड़क पर दुपट्टा लेते हुए डर को चलते? क्या देखा है तुम ने एक जिस्म का दूसरे जिस्म का शिकार होते? क्या देखा है तुम ने सड़क किनारे उस तीन फीट की ज़िंदा मूर्ति को जिस की आँखें बंद कर दी गई हैं? क्या देखा है तुम ने उन के हाथ काट दिए गए हैं और पैर न जाने किस नाले में बह रहे हैं? क्या देखा है तुम ने एक पत्थर का ख़ुदा हो जाना? क्या देखा है तुम ने एक ख़ुदा का पत्थर हो जाना? क्या देखा है तुम ने सड़क किनारे झपकते लाइट के नीचे देश का मुकद्दर पलते? क्या देखा है तुम ने पाँच सितारा होटल में भारी प्लेट छोड़ आना? क्या देखा है तुम ने सड़क पर एक रोटी पर दो ख़ून का बहना? क्या देखा है तुम ने सियासत को मज़हब से हटा कर? क्या देखा है तुम ने मोहब्बत को सियासत से हटा कर? क्या देखा है तुम ने लगे हुए पोधो का सुख जाना? क्या देखा है तुम ने मौत ज़िंदगी से ज़्यादा ख़ूब-सूरत है? क्या क्या क्या? ये सब नहीं देखा! मतलब तुम ख़्वाब नहीं देखती तुम्हें नहीं पता ख़्वाबों का दर्द कैसा है ये तपती रेत पर नंगे पाँव चलने का दर्द ये बारिशों में एक जगह खड़े रहने का दर्द ये धूप में जलते शजर, ये शजर से लिपटी परिंदों की लाश ये समुंदर किनारे प्यास से मर जाने का दुख ये समुंदर की हिफाज़त करते किनारे, ये किनारों पर तैनात दरख़्त ओर फिर उन के सर चढ़ कर नाचती धूप अगर ये सब नहीं देखती तो पिक्चर देखती हो तुम सच मानो ख़्वाब नहीं देखती हो तुम अरे रुको रुको हाँ यहीं, बस यहीं! रुको रुको रुको बस यहीं रुको और देखो वो दूर से आता ज़िंदगी का ग़म वो ग़म अब तुम्हें भी सोने नहीं देगा ख़ैर! मैं तुम सेे कुछ पूछ रहा था? हाँ, मैं ये पूछ रहा था के क्या तुम्हें नींद आती है क्या तुम्हें ख़्वाब आते है क्या तुम रातों को सो जाती हो मैं? नहीं मैं ऐसा नहीं कर सकता मैं ने बताया ना! मेरी तो नींद तुम्हारी है मेरे ख़्वाब भी तुम्हारे है ख़ैर अब इन ख़्वाबों में एक तन्हाई है तन्हाई, तन्हाई, तन्हाई तन्हाई? हम्म ख़ैर छोड़ो ये सब और बताओ कैसी हो तुम?
Aves Sayyad
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"इबहाम" ये कौन से नगर आया हूँ मैं कि ख़्वाब यहाँ क़फ़स में हैं कि समेटे हुए हैं इल्म नहीं तसव्वुरात किसी सानिहे की डोरी से उलझ गए कि लपेटे हुए हैं इल्म नहीं निगाह हो कि ज़बाँ हो कि शहर-ए-दिल कि यहाँ हर एक शहर से पेचीदगी ज़ियादा है बॅंधे हुए हैं ख़याल इतने और गहरा सुकूत हर इक ख़याल ज़बाँ से परे निहादा है ये कैसे होंठ कि जो जुम्बिशें नहीं करते ये किस तरह की नज़र जिस में तीरगी है फ़क़त ये चाहते हैं सदाऍं सभी रसन बस्ता ये कान हैं कि जिन्हें रास ख़ामुशी है फ़क़त मैं थक के बैठ गया तो लगा कि दूर कहीं दबी हुई सी सदाएँ पुकारती हैं मुझे क़दम बढ़ाए तो कुछ ख़्वाहिशें दिखी और मैं जिन्हें जिन्हें हूँ मुयस्सर निहारती हैं मुझे शदीद ख़्वाब जो अल्हड़पने में देखे थे मुझे वो आज बड़ी हसरतों से तकते हैं बची हुई वफ़ा और अधमरी उमीद के साथ तमाम शौक़ बड़ी नफ़रतों से तकते हैं मैं इस के बा'द उतर आया और गहरा जहाँ फ़क़त थी याद-ए-गुज़िशता ख़याल-ए-मुस्तक़बिल मैं सेहन कर न सकूॅंगा अब और कुछ कि मुझे यहाँ से ले चलो और छोड़ आओ शहर-ए-दिल हर एक रोज़ वही रट वही सवाल कि 'नाज़' तू जानता है यहाँ हिजरतें नहीं होती ये खेल ज़ेहन में चलता है अहद-ए-फ़ुर्सत में तो ले चलो कि जहाँ फु़र्सतें नहीं होती
Naaz ishq
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"डू इट" मैं निकल एक दिन घर से बस चल पड़ा सोचा समझा न कुछ बस मैं आगे बढ़ा जब मैं चलते हुए थोड़ा थक सा गया फिर ठहरने को मन मेरा करने लगा और चलने की हिम्मत नहीं जब रही मुझ को थोड़ी सी दूरी पे झील इक दिखी फिर मैं उस झील की ओर बढ़ने लगा झील पर जैसे तैसे मैं पहुँचा भला मैं किनारे पे अब झील के था खड़ा और कई देर तक बस खड़ा ही रहा मेरे अंदर का बच्चा बड़ा दोनों ही मुझ को इक साथ कहते रहे कूद जा
KUNAL
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"अनबोदर्ड" अब फ़र्क नहीं पड़ता मुझ को तेरे होने से न होने से इक याद सी दिल में बस्ती है तू जिस में खुल के हँसती है माना कि मेरी ये ज़िंदगी अब उस एक हँसी को तरसती है इक जैसा ही दुख लगता है तेरे हँसने से या रोने से अब फ़र्क नहीं पड़ता मुझ को तेरे होने से न होने से बीती बातों को याद करूँँ पाने की तुझे फ़रियाद करूँँ जो ठीक लगा वो किया तू ने मैं क्यूँँ ख़ुद को बर्बाद करूँँ मैं निकाल रहा हूँ अब तुझ को इस दिल के कोने कोने से अब फ़र्क नहीं पड़ता मुझ को तेरे होने से न होने से मैं अजीब परेशाँ बैठा हूँ ये कौन हूँ मैं और कैसा हूँ धोखा तेरा शर्मिंदा मैं मैं अब भी पहले जैसा हूँ तू खेली तोड़ दिया तो क्या दिल होते ही हैं खिलौने से अब फ़र्क नहीं पड़ता मुझ को तेरे होने से न होने से
KUNAL
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"लेदर जैकेट" हँसी रुख़ पर ख़ुशी दिल में ज़बाँ पर बहुत नर्मी थी पिछली सर्दियों में तुम्हारे हाथ का स्वेटर पहन कर बहुत गर्मी थी पिछली सर्दियों में मैं यूँँही मुस्कुराया करता था तब कहीं जब ज़िक्र चलता था तुम्हारा वहीं दुनिया ठहर जाती थी सारी नहीं था वक़्त को चलना गवारा नहीं तब रात ढलती थी हमारी नहीं तब दिन ही चढ़ता था हमारा थे सुब्ह-ओ-शाम रहते साथ हम और हमेशा बात ही करते थे हम पर अधूरी ही रही हर बात वो जो हमें करनी थी पिछली सर्दियों में तुम्हारे हाथ का स्वेटर पहन कर बहुत गर्मी थी पिछली सर्दियों में कसौली और शिमला के हमारे ख़याली टूर बनते ख़ूब थे तब तुम्हारा सूट और कुर्ता मेरा वो हसीं ख़्वाबों के सुंदर रूप थे तब हमें चौबीस घंटे कम पड़े थे बड़ी जल्दी बढ़ी थी हर घड़ी तब ख़यालों में मिलन के जीते मरते हमें छोटी लगी थी ज़िंदगी तब कुनाल उस रात मुझ को सोने देना बहुत बेशर्मी थी मनमर्ज़ियों में तुम्हारे हाथ का स्वेटर पहन कर बहुत गर्मी थी पिछली सर्दियों में न ये रम थी न ये ग़म थे न ऐसे अधूरे और आधे से न हम थे तेरी लहराती थी ज़ुल्फ़ें हवा में नहीं इन में कहीं भी कोई ख़म थे वो कंटेसा बगल की सीट जिस पर तुम अक्सर बैठ कर लड़ती थी मुझ से वहाँ अब बैठता कोई नहीं है अब उस के नीचे इक बोतल पड़ी है जो कल तक चूर था तेरे नशे में उसे इस के नशे में सुध नहीं है वही आवारा था मैं साथ तेरे वही आवारा हूँ मैं बा'द तेरे बहुत ख़ुश-फ़हमी रहती थी मुझे पर उन आवारा हमारी गर्दियों में तुम्हारे हाथ का स्वेटर पहन कर बहुत गर्मी थी पिछली सर्दियों में
KUNAL
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"स्लीपिंग ब्यूटी" वो औरत कितनी बेगानी थी रोज़ाना हम बिस्तर होती थी नींद उस को शायद ही आती थी पर शब साथ हमेशा सोती थी यूँँ ही रोज़ गुजरता था हर दिन और हर रात बसर यूँँ होती थी इक रात शोर था सन्नाटे में मेरी नींद अचानक टूटी थी मैं उठ बैठा और देखा उस को वो मूर्छित हो ऐसे लेटी थी शिकन नहीं थी माथे पर उस के वो तो बेफ़िक्री से सोई थी उस रात उस ने मारे ख़र्राटे सीटी सी आवाज़ इक आती थी मैं मन ही मन में मुस्का बैठा दिल में लहर ख़ुशी की उठ्ठी थी फिर मैं ने उस का माथा चूमा कमरे में स्लीपिंग जो ब्यूटी थी मुझ को उस पल ये एहसास हुआ अब आज रात से वो अपनी थी
KUNAL
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