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"अनबोदर्ड" अब फ़र्क नहीं पड़ता मुझ को तेरे होने से न होने से इक याद सी दिल में बस्ती है तू जिस में खुल के हँसती है माना कि मेरी ये ज़िंदगी अब उस एक हँसी को तरसती है इक जैसा ही दुख लगता है तेरे हँसने से या रोने से अब फ़र्क नहीं पड़ता मुझ को तेरे होने से न होने से बीती बातों को याद करूँँ पाने की तुझे फ़रियाद करूँँ जो ठीक लगा वो किया तू ने मैं क्यूँँ ख़ुद को बर्बाद करूँँ मैं निकाल रहा हूँ अब तुझ को इस दिल के कोने कोने से अब फ़र्क नहीं पड़ता मुझ को तेरे होने से न होने से मैं अजीब परेशाँ बैठा हूँ ये कौन हूँ मैं और कैसा हूँ धोखा तेरा शर्मिंदा मैं मैं अब भी पहले जैसा हूँ तू खेली तोड़ दिया तो क्या दिल होते ही हैं खिलौने से अब फ़र्क नहीं पड़ता मुझ को तेरे होने से न होने से

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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"मरियम" मैं आईनों से गुरेज़ करते हुए पहाड़ों की कोख में साँस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूँ तो सोचता हूँ कि मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम तुम्हारी बे-साख़्ता मोहब्बत ज़मीं पे फैले हुए समुंदर की वुसअतों से भी मावरा है मोहब्बतों के समंदरों में बस एक बहिरा-ए-हिज्र है जो बुरा है मरियम ख़ला-नवर्दों को जो सितारे मुआवज़े में मिले थे वो उन की रौशनी में ये सोचते हैं कि वक़्त ही तो ख़ुदा है मरियम और इस तअल्लुक़ की गठरियों में रुकी हुई सआतों से हटकर मेरे लिए और क्या है मरियम अभी बहुत वक़्त है कि हम वक़्त दे ज़रा इक दूसरे को मगर हम इक साथ रह कर भी ख़ुश न रह सके तो मुआ'फ़ करना कि मैं ने बचपन ही दुख की दहलीज़ पर गुज़ारा मैं उन चराग़ों का दुख हूँ जिन की लवे शब-ए-इंतज़ार में बुझ गई मगर उन सेे उठने वाला धुआँ ज़मान-ओ-मकाँ में फैला हुआ है अब तक मैं कोहसारों और उन के जिस्मों से बहने वाली उन आबशारों का दुख हूँ जिन को ज़मीं के चेहरों पर रेंगते रेंगते ज़माने गुज़र गए हैं जो लोग दिल से उतर गए हैं किताबें आँखों पे रख के सोए थे मर गए हैं मैं उन का दुख हूँ जो जिस्म ख़ुद-लज़्जती से उकता के आईनों की तसल्लिओं में पले बढ़े हैं मैं उन का दुख हूँ मैं घर से भागे हुओ का दुख हूँ मैं रात जागे हुओ का दुख हूँ मैं साहिलों से बँधी हुई कश्तियों का दुख हूँ मैं लापता लड़कियों का दुख हूँ खुली हुए खिड़कियों का दुख हूँ मिटी हुई तख़्तियों का दुख हूँ थके हुए बादलों का दुख हूँ जले हुए जंगलों का दुख हूँ जो खुल कर बरसी नहीं है, मैं उस घटा का दुख हूँ ज़मीं का दुख हूँ ख़ुदा का दुख हूँ बला का दुख हूँ जो शाख सावन में फूटती है वो शाख तुम हो जो पींग बारिश के बा'द बन बन के टूटती है वो पींग तुम हो तुम्हारे होंठों से सआतों ने समाअतों का सबक़ लिया है तुम्हारी ही शाख-ए-संदली से समंदरों ने नमक लिया है तुम्हारा मेरा मुआमला ही जुदा है मरियम तुम्हें तो सब कुछ पता है मरियम

Tehzeeb Hafi

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"डू इट" मैं निकल एक दिन घर से बस चल पड़ा सोचा समझा न कुछ बस मैं आगे बढ़ा जब मैं चलते हुए थोड़ा थक सा गया फिर ठहरने को मन मेरा करने लगा और चलने की हिम्मत नहीं जब रही मुझ को थोड़ी सी दूरी पे झील इक दिखी फिर मैं उस झील की ओर बढ़ने लगा झील पर जैसे तैसे मैं पहुँचा भला मैं किनारे पे अब झील के था खड़ा और कई देर तक बस खड़ा ही रहा मेरे अंदर का बच्चा बड़ा दोनों ही मुझ को इक साथ कहते रहे कूद जा

KUNAL

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"लेदर जैकेट" हँसी रुख़ पर ख़ुशी दिल में ज़बाँ पर बहुत नर्मी थी पिछली सर्दियों में तुम्हारे हाथ का स्वेटर पहन कर बहुत गर्मी थी पिछली सर्दियों में मैं यूँँही मुस्कुराया करता था तब कहीं जब ज़िक्र चलता था तुम्हारा वहीं दुनिया ठहर जाती थी सारी नहीं था वक़्त को चलना गवारा नहीं तब रात ढलती थी हमारी नहीं तब दिन ही चढ़ता था हमारा थे सुब्ह-ओ-शाम रहते साथ हम और हमेशा बात ही करते थे हम पर अधूरी ही रही हर बात वो जो हमें करनी थी पिछली सर्दियों में तुम्हारे हाथ का स्वेटर पहन कर बहुत गर्मी थी पिछली सर्दियों में कसौली और शिमला के हमारे ख़याली टूर बनते ख़ूब थे तब तुम्हारा सूट और कुर्ता मेरा वो हसीं ख़्वाबों के सुंदर रूप थे तब हमें चौबीस घंटे कम पड़े थे बड़ी जल्दी बढ़ी थी हर घड़ी तब ख़यालों में मिलन के जीते मरते हमें छोटी लगी थी ज़िंदगी तब कुनाल उस रात मुझ को सोने देना बहुत बेशर्मी थी मनमर्ज़ियों में तुम्हारे हाथ का स्वेटर पहन कर बहुत गर्मी थी पिछली सर्दियों में न ये रम थी न ये ग़म थे न ऐसे अधूरे और आधे से न हम थे तेरी लहराती थी ज़ुल्फ़ें हवा में नहीं इन में कहीं भी कोई ख़म थे वो कंटेसा बगल की सीट जिस पर तुम अक्सर बैठ कर लड़ती थी मुझ से वहाँ अब बैठता कोई नहीं है अब उस के नीचे इक बोतल पड़ी है जो कल तक चूर था तेरे नशे में उसे इस के नशे में सुध नहीं है वही आवारा था मैं साथ तेरे वही आवारा हूँ मैं बा'द तेरे बहुत ख़ुश-फ़हमी रहती थी मुझे पर उन आवारा हमारी गर्दियों में तुम्हारे हाथ का स्वेटर पहन कर बहुत गर्मी थी पिछली सर्दियों में

KUNAL

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"ऊपर पंखा चलता है" वो ऊपर पंखा चलता है और नीचे बेबी सोता है जब पंखा बंद ये होता है तब बेबी जाग उठ रोता है फिर इक दिन ऐसा आएगा बेबी ये बड़ा हो जाएगा इसे दुनिया समझ आ जाएगी कोई बात बड़ा इसे खाएगी कुछ दिन तो ये बस रो लेगा दुनिया के माफ़िक हो लेगा कुछ हद तक तो ये सह लेगा कुछ दिन तन्हा भी रह लेगा ये दुख तकलीफ़ें झेलेगा पर मुँह से कुछ नहीं बोलेगा जब ग़म हद से बढ़ जाएगा ये कुछ भी सह नहीं पाएगा जब हर दिन इस को खटकेगा ये बैठा बैठा भटकेगा फिर इक दिन यूँँ ही बे-मतलब ये घर की छत को देखेगा फिर छत से हटकर ध्यान इस का आ कर पंखे पर अटकेगा ये तब पंखे पर लटकेगा तब पंखा चलता जाएगा बेबी सोता रह जाएगा तब लाख करो पंखे को बंद फिर बेबी उठ नहीं पाएगा सब बैठ के इस को रोएँगे और बेबी चुप हो जाएगा ये खेल अज़ल से चलता है सदियों से यही सब होता है वो ऊपर पंखा चलता है और नीचे बेबी सोता है

KUNAL

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"स्लीपिंग ब्यूटी" वो औरत कितनी बेगानी थी रोज़ाना हम बिस्तर होती थी नींद उस को शायद ही आती थी पर शब साथ हमेशा सोती थी यूँँ ही रोज़ गुजरता था हर दिन और हर रात बसर यूँँ होती थी इक रात शोर था सन्नाटे में मेरी नींद अचानक टूटी थी मैं उठ बैठा और देखा उस को वो मूर्छित हो ऐसे लेटी थी शिकन नहीं थी माथे पर उस के वो तो बेफ़िक्री से सोई थी उस रात उस ने मारे ख़र्राटे सीटी सी आवाज़ इक आती थी मैं मन ही मन में मुस्का बैठा दिल में लहर ख़ुशी की उठ्ठी थी फिर मैं ने उस का माथा चूमा कमरे में स्लीपिंग जो ब्यूटी थी मुझ को उस पल ये एहसास हुआ अब आज रात से वो अपनी थी

KUNAL

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