"स्लीपिंग ब्यूटी" वो औरत कितनी बेगानी थी रोज़ाना हम बिस्तर होती थी नींद उस को शायद ही आती थी पर शब साथ हमेशा सोती थी यूँँ ही रोज़ गुजरता था हर दिन और हर रात बसर यूँँ होती थी इक रात शोर था सन्नाटे में मेरी नींद अचानक टूटी थी मैं उठ बैठा और देखा उस को वो मूर्छित हो ऐसे लेटी थी शिकन नहीं थी माथे पर उस के वो तो बेफ़िक्री से सोई थी उस रात उस ने मारे ख़र्राटे सीटी सी आवाज़ इक आती थी मैं मन ही मन में मुस्का बैठा दिल में लहर ख़ुशी की उठ्ठी थी फिर मैं ने उस का माथा चूमा कमरे में स्लीपिंग जो ब्यूटी थी मुझ को उस पल ये एहसास हुआ अब आज रात से वो अपनी थी
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"वो" वो किताब-ए-हुस्न वो इल्म ओ अदब की तालीबा वो मोहज़्ज़ब वो मुअद्दब वो मुक़द्दस राहिबा किस क़दर पैराया परवर और कितनी सादा-कार किस क़दर संजीदा ओ ख़ामोश कितनी बा-वक़ार गेसू-ए-पुर-ख़म सवाद-ए-दोश तक पहुँचे हुए और कुछ बिखरे हुए उलझे हुए सिमटे हुए रंग में उस के अज़ाब-ए-ख़ीरगी शामिल नहीं कैफ़-ए-एहसासात की अफ़्सुर्दगी शामिल नहीं वो मिरे आते ही उस की नुक्ता-परवर ख़ामुशी जैसे कोई हूर बन जाए यकायक फ़लसफ़ी मुझ पे क्या ख़ुद अपनी फ़ितरत पर भी वो खुलती नहीं ऐसी पुर-असरार लड़की मैं ने देखी ही नहीं दुख़तरान-ए-शहर की होती है जब महफ़िल कहीं वो तआ'रुफ़ के लिए आगे कभी बढ़ती नहीं
Jaun Elia
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कितना अर्सा लगा ना-उमीदी के पर्बत से पत्थर हटाते हुए एक बिफरी हुई लहर को राम करते हुए ना-ख़ुदाओं में अब पीछे कितने बचे हैं? रौशनी और अँधेरे की तफ़रीक़ में कितने लोगों ने आँखें गँवा दीं कितनी सदियाँ सफ़र में गुज़ारीं मगर आज फिर उस जगह हैं जहाँ से हमें अपनी माँओं ने रुख़्सत किया था अपने सब से बड़े ख़्वाब को अपनी आँखों के आगे उजड़ते हुए देखने से बुरा कुछ नहीं है तेरी क़ुर्बत में या तुझ से दूरी पे जितनी गुज़ारी तेरी चूड़ियों की क़सम ज़िंदगी दाएरों के सिवा कुछ नहीं है कुहनियों से हमें अपना मुँह ढाँप कर खाँसने को बड़ों ने कहा था तो हम उन पे हँसते थे और सोचते थे कि उन को टिशू-पेपरों की महक से एलर्जी है लेकिन हमें ये पता ही नहीं था कि उन पे वो आफ़ात टूटी हैं जिन का हमें इक सदी बा'द फिर सामना है वबा के दिनों में किसे होश रहता है किस हाथ को छोड़ना है किसे थामना है इक रियाज़ी के उस्ताद ने अपने हाथों में परकार ले कर ये दुनिया नहीं, दायरा खींचना था ख़ैर जो भी हुआ तुम भी पुरखों के नक़्श-ए-क़दम पर चलो और अपनी हिफ़ाज़त करो कुछ महीने तुम्हें अपने तस्में नहीं बाँधने इस से आगे तो तुम पे है तुम अपनी मंज़िल पे पहुँचो या फिर रास्तों में रहो इस से पहले कि तुम अपने महबूब को वेंटीलेटर पे देखो घरों में रहो
Tehzeeb Hafi
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"औरत की ज़िंदगी" कभी कभी दिल की बात भी बता नहीं पाते सबकी सुनने में अपनी ही सुना नहीं पाते सजाकर रखते हैं जिस घर की दीवारों को उस घर में ही खुलकर मुस्कुरा नहीं पाते अजीब ज़िंदगी है औरत की भी माँ बाप के घर में अपनी जगह बना नहीं पाते जिस घर को चुना है तकदीर ने हमारे लिए उस घर में जा कर घूँघट उठा नहीं पाते अब कौन देखता है चेहरे पे ग़म है या ख़ुशी सबके सामने आँसू भी अब बहा नहीं पाते
Muskan Singh
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“ख़्वाबों के बुलबुले” एक बुलबुले सा था मेरा ख़्वाब कोशिश की दिल ने छूने की फूट गया अच्छा होता उस शाम बारिश ही न होती अच्छा होता ख़्वाबों के बुलबुले ही न बनते कि जब मेरे मुक़द्दर में ख़्वाब मुकम्मल होना न था और दिल को शब-ए-बेकशी में सोना न था आरज़ू थी कि कोई बुलबुलों को फूटने से बचाए और वो प्यार से देखे उन को फिर गले लगाए पर हवाओं को भला दिल के अरमानों की क्या फ़िक्र जाने कहाँ ले गईं वो ख़्वाबों को मुझ सेे दूर कितनी मर्तबा समझाया मैं ने मगर दिल अब भी बे-क़रार है वो आएँगे नहीं शायद फिर भी उन का इंतिज़ार है इस हिज्र में ये दिल अब टूट के बिखर न जाए बिना कश्ती कहीं यादों के समुंदर में उतर न जाए अच्छा होता उस शाम बारिश ही न होती अच्छा होता ख़्वाबों के बुलबुले ही न बनते
Prakash Pandey
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"तेरी आँखें" यार तेरी आँखों की तस्वीर बनाना मुश्किल है और फिर उस पर कोई ग़ज़ल सुनाना मुश्किल है कोई कहता है शराब सी नशीली है तेरी आँखें कोई कहता है साफ पानी सी नीली हैं तेरी आँखें अरे मुझ सेे पूछो उस की आँखों में कितनी गहराई हैं जैसे कोई सुरंग है जैसे कोई खाई है अगर देखी होती तेरी आँखें तो इतने मक़बूल नहीं होते न्यूटन के ये सारे लॉ ये कोई रूल नहीं होते किरचौफ के वो रूल वो थ्योरी ये बताती है कैसे सारी आँखें तेरी आँखों पर रुक जाती हैं आर्यभट्ट ने जब बताया था ये पृथ्वी गोल है इस बात में तेरी आँखों का बेहतरीन रोल हैं रदरफोर्ड का परमाणु मॉडल इस बात को दर्शाता है तेरी आँखों में हैं धन आवेश जिस में ये ऋणावेश जाता है एक बात बताओ ये पीरियोडिक टेबल क्यूँ पढ़ते हो यारों उस की आँखें ही रंगीन हैं और उस में साल्ट हैं हजारों ख़ुदा तेरी आँखें अगर बहुत पहले ही बना देता तो रामानुजन सारे फॉर्मूले तेरी आँखों में ही बता देता तेरी आँखों में ही खोये रहते ये दुनिया ईजाद करने वाले ख़ामोश देखते ही रहते ये नेता बात करने वाले इस के आगे कैसे लिखूँ वो सामने आ बैठी है मैं भूल गया ये इंदौर है या लखनऊ है या अमेठी है हाँ याद आया तेरी आँखों की तस्वीर बनाना मुश्किल है और फिर उस पर कोई ग़ज़ल सुनाना मुश्किल है
"Nadeem khan' Kaavish"
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"डू इट" मैं निकल एक दिन घर से बस चल पड़ा सोचा समझा न कुछ बस मैं आगे बढ़ा जब मैं चलते हुए थोड़ा थक सा गया फिर ठहरने को मन मेरा करने लगा और चलने की हिम्मत नहीं जब रही मुझ को थोड़ी सी दूरी पे झील इक दिखी फिर मैं उस झील की ओर बढ़ने लगा झील पर जैसे तैसे मैं पहुँचा भला मैं किनारे पे अब झील के था खड़ा और कई देर तक बस खड़ा ही रहा मेरे अंदर का बच्चा बड़ा दोनों ही मुझ को इक साथ कहते रहे कूद जा
KUNAL
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"अनबोदर्ड" अब फ़र्क नहीं पड़ता मुझ को तेरे होने से न होने से इक याद सी दिल में बस्ती है तू जिस में खुल के हँसती है माना कि मेरी ये ज़िंदगी अब उस एक हँसी को तरसती है इक जैसा ही दुख लगता है तेरे हँसने से या रोने से अब फ़र्क नहीं पड़ता मुझ को तेरे होने से न होने से बीती बातों को याद करूँँ पाने की तुझे फ़रियाद करूँँ जो ठीक लगा वो किया तू ने मैं क्यूँँ ख़ुद को बर्बाद करूँँ मैं निकाल रहा हूँ अब तुझ को इस दिल के कोने कोने से अब फ़र्क नहीं पड़ता मुझ को तेरे होने से न होने से मैं अजीब परेशाँ बैठा हूँ ये कौन हूँ मैं और कैसा हूँ धोखा तेरा शर्मिंदा मैं मैं अब भी पहले जैसा हूँ तू खेली तोड़ दिया तो क्या दिल होते ही हैं खिलौने से अब फ़र्क नहीं पड़ता मुझ को तेरे होने से न होने से
KUNAL
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"लेदर जैकेट" हँसी रुख़ पर ख़ुशी दिल में ज़बाँ पर बहुत नर्मी थी पिछली सर्दियों में तुम्हारे हाथ का स्वेटर पहन कर बहुत गर्मी थी पिछली सर्दियों में मैं यूँँही मुस्कुराया करता था तब कहीं जब ज़िक्र चलता था तुम्हारा वहीं दुनिया ठहर जाती थी सारी नहीं था वक़्त को चलना गवारा नहीं तब रात ढलती थी हमारी नहीं तब दिन ही चढ़ता था हमारा थे सुब्ह-ओ-शाम रहते साथ हम और हमेशा बात ही करते थे हम पर अधूरी ही रही हर बात वो जो हमें करनी थी पिछली सर्दियों में तुम्हारे हाथ का स्वेटर पहन कर बहुत गर्मी थी पिछली सर्दियों में कसौली और शिमला के हमारे ख़याली टूर बनते ख़ूब थे तब तुम्हारा सूट और कुर्ता मेरा वो हसीं ख़्वाबों के सुंदर रूप थे तब हमें चौबीस घंटे कम पड़े थे बड़ी जल्दी बढ़ी थी हर घड़ी तब ख़यालों में मिलन के जीते मरते हमें छोटी लगी थी ज़िंदगी तब कुनाल उस रात मुझ को सोने देना बहुत बेशर्मी थी मनमर्ज़ियों में तुम्हारे हाथ का स्वेटर पहन कर बहुत गर्मी थी पिछली सर्दियों में न ये रम थी न ये ग़म थे न ऐसे अधूरे और आधे से न हम थे तेरी लहराती थी ज़ुल्फ़ें हवा में नहीं इन में कहीं भी कोई ख़म थे वो कंटेसा बगल की सीट जिस पर तुम अक्सर बैठ कर लड़ती थी मुझ से वहाँ अब बैठता कोई नहीं है अब उस के नीचे इक बोतल पड़ी है जो कल तक चूर था तेरे नशे में उसे इस के नशे में सुध नहीं है वही आवारा था मैं साथ तेरे वही आवारा हूँ मैं बा'द तेरे बहुत ख़ुश-फ़हमी रहती थी मुझे पर उन आवारा हमारी गर्दियों में तुम्हारे हाथ का स्वेटर पहन कर बहुत गर्मी थी पिछली सर्दियों में
KUNAL
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"ऊपर पंखा चलता है" वो ऊपर पंखा चलता है और नीचे बेबी सोता है जब पंखा बंद ये होता है तब बेबी जाग उठ रोता है फिर इक दिन ऐसा आएगा बेबी ये बड़ा हो जाएगा इसे दुनिया समझ आ जाएगी कोई बात बड़ा इसे खाएगी कुछ दिन तो ये बस रो लेगा दुनिया के माफ़िक हो लेगा कुछ हद तक तो ये सह लेगा कुछ दिन तन्हा भी रह लेगा ये दुख तकलीफ़ें झेलेगा पर मुँह से कुछ नहीं बोलेगा जब ग़म हद से बढ़ जाएगा ये कुछ भी सह नहीं पाएगा जब हर दिन इस को खटकेगा ये बैठा बैठा भटकेगा फिर इक दिन यूँँ ही बे-मतलब ये घर की छत को देखेगा फिर छत से हटकर ध्यान इस का आ कर पंखे पर अटकेगा ये तब पंखे पर लटकेगा तब पंखा चलता जाएगा बेबी सोता रह जाएगा तब लाख करो पंखे को बंद फिर बेबी उठ नहीं पाएगा सब बैठ के इस को रोएँगे और बेबी चुप हो जाएगा ये खेल अज़ल से चलता है सदियों से यही सब होता है वो ऊपर पंखा चलता है और नीचे बेबी सोता है
KUNAL
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