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"लेदर जैकेट" हँसी रुख़ पर ख़ुशी दिल में ज़बाँ पर बहुत नर्मी थी पिछली सर्दियों में तुम्हारे हाथ का स्वेटर पहन कर बहुत गर्मी थी पिछली सर्दियों में मैं यूँँही मुस्कुराया करता था तब कहीं जब ज़िक्र चलता था तुम्हारा वहीं दुनिया ठहर जाती थी सारी नहीं था वक़्त को चलना गवारा नहीं तब रात ढलती थी हमारी नहीं तब दिन ही चढ़ता था हमारा थे सुब्ह-ओ-शाम रहते साथ हम और हमेशा बात ही करते थे हम पर अधूरी ही रही हर बात वो जो हमें करनी थी पिछली सर्दियों में तुम्हारे हाथ का स्वेटर पहन कर बहुत गर्मी थी पिछली सर्दियों में कसौली और शिमला के हमारे ख़याली टूर बनते ख़ूब थे तब तुम्हारा सूट और कुर्ता मेरा वो हसीं ख़्वाबों के सुंदर रूप थे तब हमें चौबीस घंटे कम पड़े थे बड़ी जल्दी बढ़ी थी हर घड़ी तब ख़यालों में मिलन के जीते मरते हमें छोटी लगी थी ज़िंदगी तब कुनाल उस रात मुझ को सोने देना बहुत बेशर्मी थी मनमर्ज़ियों में तुम्हारे हाथ का स्वेटर पहन कर बहुत गर्मी थी पिछली सर्दियों में न ये रम थी न ये ग़म थे न ऐसे अधूरे और आधे से न हम थे तेरी लहराती थी ज़ुल्फ़ें हवा में नहीं इन में कहीं भी कोई ख़म थे वो कंटेसा बगल की सीट जिस पर तुम अक्सर बैठ कर लड़ती थी मुझ से वहाँ अब बैठता कोई नहीं है अब उस के नीचे इक बोतल पड़ी है जो कल तक चूर था तेरे नशे में उसे इस के नशे में सुध नहीं है वही आवारा था मैं साथ तेरे वही आवारा हूँ मैं बा'द तेरे बहुत ख़ुश-फ़हमी रहती थी मुझे पर उन आवारा हमारी गर्दियों में तुम्हारे हाथ का स्वेटर पहन कर बहुत गर्मी थी पिछली सर्दियों में

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"नज़्म" इक बरस और कट गया 'शारिक़' रोज़ साँसों की जंग लड़ते हुए सब को अपने ख़िलाफ़ करते हुए यार को भूलने से डरते हुए और सब से बड़ा कमाल है ये साँसें लेने से दिल नहीं भरता अब भी मरने को जी नहीं करता

Shariq Kaifi

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क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!

Raghav Ramkaran

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"उस की ख़ुशियाँ" सारी झीलें सूख गई हैं उस की आँखें सूख गई हैं पेड़ों पर पंछी भी चुप हैं उस को कोई दुख है शायद रस्ते सूने सूने हैं सब उस ने टहलना छोड़ दिया है सारी ग़ज़लें बेमानी हैं उस ने पढ़ना छोड़ दिया है वो भी हँसना भूल चुकी है गुलों ने खिलना छोड़ दिया है सावन का मौसम जारी है या'नी उस का ग़म जारी है बाक़ी मौसम टाल दिए हैं सुख कूएँ में डाल दिए हैं चाँद को छुट्टी दे दी गई है तारों को मद्धम रक्खा है आतिश-दान में फेंक दी ख़ुशियाँ दिल में बस इक ग़म रक्खा है खाना पीना छोड़ दिया है सब सेे रिश्ता तोड़ दिया है हाए क़यामत आने को है उस ने जीना छोड़ दिया है हर दिल ख़ुश हर चेहरा ख़ुश हो वो हो ख़ुश तो दुनिया ख़ुश हो वो अच्छी तो सब अच्छा है और दुनिया में क्या रक्खा है ये सब सुन कर ख़ुदा ने बोला बोल तेरी अब ख़्वाहिश क्या है मैं ने बोला मेरी ख़्वाहिश मेरी ख़्वाहिश उस की ख़ुशियाँ ख़ुदा ने बोला तेरी ख़्वाहिश मैं फिर बोला उस की ख़ुशियाँ इस के अलावा पूछ रहा हूँ मैं ने बोला उस की ख़ुशियाँ अपने लिए कुछ माँग ले पगले माँग लिया ना उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ

Varun Anand

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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।

Divya 'Kumar Sahab'

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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो

Rakesh Mahadiuree

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"डू इट" मैं निकल एक दिन घर से बस चल पड़ा सोचा समझा न कुछ बस मैं आगे बढ़ा जब मैं चलते हुए थोड़ा थक सा गया फिर ठहरने को मन मेरा करने लगा और चलने की हिम्मत नहीं जब रही मुझ को थोड़ी सी दूरी पे झील इक दिखी फिर मैं उस झील की ओर बढ़ने लगा झील पर जैसे तैसे मैं पहुँचा भला मैं किनारे पे अब झील के था खड़ा और कई देर तक बस खड़ा ही रहा मेरे अंदर का बच्चा बड़ा दोनों ही मुझ को इक साथ कहते रहे कूद जा

KUNAL

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"अनबोदर्ड" अब फ़र्क नहीं पड़ता मुझ को तेरे होने से न होने से इक याद सी दिल में बस्ती है तू जिस में खुल के हँसती है माना कि मेरी ये ज़िंदगी अब उस एक हँसी को तरसती है इक जैसा ही दुख लगता है तेरे हँसने से या रोने से अब फ़र्क नहीं पड़ता मुझ को तेरे होने से न होने से बीती बातों को याद करूँँ पाने की तुझे फ़रियाद करूँँ जो ठीक लगा वो किया तू ने मैं क्यूँँ ख़ुद को बर्बाद करूँँ मैं निकाल रहा हूँ अब तुझ को इस दिल के कोने कोने से अब फ़र्क नहीं पड़ता मुझ को तेरे होने से न होने से मैं अजीब परेशाँ बैठा हूँ ये कौन हूँ मैं और कैसा हूँ धोखा तेरा शर्मिंदा मैं मैं अब भी पहले जैसा हूँ तू खेली तोड़ दिया तो क्या दिल होते ही हैं खिलौने से अब फ़र्क नहीं पड़ता मुझ को तेरे होने से न होने से

KUNAL

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"ऊपर पंखा चलता है" वो ऊपर पंखा चलता है और नीचे बेबी सोता है जब पंखा बंद ये होता है तब बेबी जाग उठ रोता है फिर इक दिन ऐसा आएगा बेबी ये बड़ा हो जाएगा इसे दुनिया समझ आ जाएगी कोई बात बड़ा इसे खाएगी कुछ दिन तो ये बस रो लेगा दुनिया के माफ़िक हो लेगा कुछ हद तक तो ये सह लेगा कुछ दिन तन्हा भी रह लेगा ये दुख तकलीफ़ें झेलेगा पर मुँह से कुछ नहीं बोलेगा जब ग़म हद से बढ़ जाएगा ये कुछ भी सह नहीं पाएगा जब हर दिन इस को खटकेगा ये बैठा बैठा भटकेगा फिर इक दिन यूँँ ही बे-मतलब ये घर की छत को देखेगा फिर छत से हटकर ध्यान इस का आ कर पंखे पर अटकेगा ये तब पंखे पर लटकेगा तब पंखा चलता जाएगा बेबी सोता रह जाएगा तब लाख करो पंखे को बंद फिर बेबी उठ नहीं पाएगा सब बैठ के इस को रोएँगे और बेबी चुप हो जाएगा ये खेल अज़ल से चलता है सदियों से यही सब होता है वो ऊपर पंखा चलता है और नीचे बेबी सोता है

KUNAL

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"स्लीपिंग ब्यूटी" वो औरत कितनी बेगानी थी रोज़ाना हम बिस्तर होती थी नींद उस को शायद ही आती थी पर शब साथ हमेशा सोती थी यूँँ ही रोज़ गुजरता था हर दिन और हर रात बसर यूँँ होती थी इक रात शोर था सन्नाटे में मेरी नींद अचानक टूटी थी मैं उठ बैठा और देखा उस को वो मूर्छित हो ऐसे लेटी थी शिकन नहीं थी माथे पर उस के वो तो बेफ़िक्री से सोई थी उस रात उस ने मारे ख़र्राटे सीटी सी आवाज़ इक आती थी मैं मन ही मन में मुस्का बैठा दिल में लहर ख़ुशी की उठ्ठी थी फिर मैं ने उस का माथा चूमा कमरे में स्लीपिंग जो ब्यूटी थी मुझ को उस पल ये एहसास हुआ अब आज रात से वो अपनी थी

KUNAL

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