ज़रा अपनी आँखें तो देना कि देखूँ तुम्हारी नज़र से जहान-ए-तमन्ना जहाँ लोग कहते हैं नर्गिस ने इक फूल फिर से जना है हज़ारों बरस की सज़ा झेल कर गुमाँ और अफ़्शाँ के रंगों में फिर से बहारों की ख़ुशबू सफ़र कर रही है कि लम्हों की लहरों पे हर सू नई आरज़ू पुर-फ़िशाँ है तमन्ना की तन्हाइयाँ मुंतज़िर हैं कि शायद वही वक़्त का क़ाफ़िला फिर मिले जो उन को सुला कर बताए बिना चल दिया था शुक्रिया अपनी आँखें तो लो हमें अपनी बे-नूरी अच्छी हमें क्या मिला हज़ारों बरस का सफ़र और फिर दीदा-वर ख़ुद-नज़र ख़ुद-गिरफ़्ता ये पानी के तख़्ते पे लटका हुआ फूल गुमाँ और अफ़्शाँ के रंगों की हिजरत का ताज़ा निशाँ दे गया दाग़-ए-हिजरत की इक दुख भरी दास्ताँ ये चश्म-ए-तमन्ना ख़ुदाया ख़ुदी थी कि थी ख़ुद-नुमाई ये फूलों की दुनिया भी अंधेर नगरी है अंधों की दुनिया है बे-नूर-ओ-बे-ख़ौफ़ इंसाफ़ अंधा है फूलों को फाँसी के फँदे
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"दरीचा-हा-ए-ख़याल" चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ये सब दरीचा-हा-ए-ख़याल जो तुम्हारी ही सम्त खुलते हैं बंद कर दूँ कुछ इस तरह कि यहाँ याद की इक किरन भी आ न सके चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ख़ुद भी न याद आऊँ तुम्हें जैसे तुम सिर्फ़ इक कहानी थीं जैसे मैं सिर्फ़ इक फ़साना था
Jaun Elia
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"मेरी दास्ताँ" वो दिन भी कितने अजीब थे जब हम दोनों क़रीब थे शबब-ए-हिज़्र न तू, न मैं सब अपने-अपने नसीब थे तू ही मेरी दुनिया थी मैं ही तेरा जहान था मुझे तेरे होने का ग़ुरूर था तुझे मेरे होने पर गुमान था तेरे साथ बिताए थे वो दिन वो राते कितनी हसीन थी उस कमरे में थी जन्नत सारी एक बिस्तर पर ही जमीन थी तेरी गोद में सर रख कर मैं गज़ले अपनी सुनाता था तू सुन कर शा'इरी सो जाती थी, मैं तेरी ख़ुशबू में खो जाता था मेरी कामयाबी की ख़बरें सुन मुझ सेे ज़्यादा झूमा करती थी वो बेवजह बातों-बातों में मेरा माथा चूमा करती थी मेरी हर परेशानी में वो मेरी हमदर्द थी,हम सेाया थी उस से बढ़कर कुछ न था बस वही एक सर्माया थी मुलाक़ात न हो तो कहती थी मैं कैसे आज सो पाऊंगी मुझे गले लगा कर कहती थी मैं तुम सेे जुदा ना हो पाऊंगी इक आईना थी वो मेरा उस सेे कुछ भी नहीं छुपा था हर चीज जानती थी मेरी मेरा सब कुछ उसे पता था यार वही चेहरे हैं अपने वही एहसास दिल में है फिर क्यूँ दूरियाँ बढ़ सी गई क्यूँ रिश्ते आज मुश्किल में है कई सवाल हैं दिल में एक-एक कर के सब सुनोगी क्या? मैं शुरू करता हूँ शुरू से अब सबका जवाब दोगी क्या क्यूँ लौटा दी अंगुठी मुझे? क्यूँ बदल गए सब इरादे तेरे? क्या हुआ तेरी सब क़समों का? अब कहाँ गए सब वादे तेरे? तेरे इन मेहंदी वाले हाथों में किसी ओर का अब नाम हैं इक हादसा हैं मेरे लिए ये माना तेरे लिए ईनाम हैं अपने हिज्र की वो पहली रात तब ख़याल तो मेरा आया होगा आई होगी सब यादें पुरानी मेरी बातों ने भी रुलाया होगा जैसे मुझ में कोई चीख रहा हैं मेरी रूह-रूह तक सो रही हैं मैं अपनी दास्तां लिख रहा हूँ और मेरी शा'इरी रो रही हैं बस यही इल्तिजा हैं ख़ुदा से कोई इतना भी प्यारा न बने कई सूरतें हो सामने नज़र के पर कोई हमारा ना बने
"Nadeem khan' Kaavish"
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है
Sahir Ludhianvi
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करम योगी है पैकर-ए-जिस्म में रहता है मिरे साथ उस की आवाज़ मिरे दिल से निकल कर फूँकती है मिरी रूह में नग़्मों का ख़ुमार फूल खिलते हैं सितारों के मिरे आँगन में मेरी सखियाँ मेरी हमजोलियाँ आती हैं मुझे मिलने तो वो मिल बैठता है उस की आसूदगी-ए-दिल दर-ओ-दीवार से बाहर किसी महकी हुई ख़ुशबू की तरह फैलती है फैल कर चूमती है हर कस-ओ-ना-कस के क़दम क्या करूँँ दिल मिरा दीवाना है पैकर-ए-जिस्म में रहता हुआ योगी है वफ़ा की तस्वीर अपनी ता'बीर को ख़्वाबों में बसा लेती हूँ कोई आज़ुर्दा-बदन कोई ख़िज़ाँ-दीदा चमन उस की फैली हुई ख़ुशबू से अगर जाग उठे तो मुझे ग़म होता है
Ghalib Ahmad
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दोस्त रुख़्सत हो गए उन से मुलाक़ातें गईं बातें गईं शहर था आबाद जिन के दम-क़दम से वो हमारी चाँदनी रातें गईं मरने वाले मर गए ज़िंदा मगर हम भी नहीं वो तो ग़ुस्ल-ए-आख़िरी ले कर हुए फिर ताज़गी से आश्ना निथरे सुथरे ओढ़ कर अपनी सफ़ेदी के कफ़न काफ़ूर की ख़ुशबू को नथुनों में समाए सो गए आराम से ठंडे बदन अपनी अपनी क़ब्र पर तकिया किए वो थकन की इस मुसलसल सरसराहट से तो अब आज़ाद हैं साँस की ज़ंजीर से लटके हुए जागते रहने की काविश और लगन इस तग-ओ-दौ से परे आबाद हैं और हम जो इस किनारे पर खड़े रोज़-ओ-शब लहरों का करते हैं शुमार आप-बीती रोज़ सुनते हैं मगर ख़ामोश हैं ख़ामुशी से बहता पानी रोज़ बहता देखते हैं डूब जाने की मगर हिम्मत नहीं कौन जाने डूब ही जाएँ कहीं डूब जाओ या चले आओ इधर बाज़ आओ और फिर ज़िंदा रहो सातवाँ दर भी खुला है मुंतज़िर दाग़-ए-हिजरत दे गए ख़ुशबू के फूल कौन अब बन कर चराग़-ए-राह तुम को हाथ से उँगली पकड़ कर तिफ़्ल-ए-मकतब की तरह ले कर बढ़े और ये कहे मौत का लम्हा हमारी ज़िंदगी का आ गया जिस्म की ठंडक तो दस्तक दे रही है आओ कुछ बातें करें और फिर चलें दोस्त रुख़्सत हो गए
Ghalib Ahmad
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दरख़्तों से पत्ते तो हर साल गिरते हैं मिट्टी में मिलने की ख़्वाहिश लिए मगर उन को गिन गिन के रखता है कौन सफ़र की थकन से सरासीमा पत्ता जो गिरता है लम्हे की दीवार कर के उबूर बहुत दूर से आ के लेता है मिट्टी की ख़ुशबू की ख़ुशियाँ मगर ज़र्द रंगों के ज़ेवर से आरास्ता ये ख़िज़ाँ की दुल्हन जिस की क़िस्मत के तारे शब-ओ-रोज़ गिरते हैं धरती की आग़ोश पर हैं ये किस के इशारे इन्ही ज़र्द रंगों की ख़ुशबू में शायद नई ख़्वाहिशों के उफ़ुक़ हैं नए चाँद तारे
Ghalib Ahmad
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चश्म-ए-तमन्ना जिसे नींद आई थी सदियों की बीमारियों की थकन से जाग उट्ठी है शायद बदन में नया दिन शगूफ़े की मानिंद उभरा शफ़क़-ज़ार बन कर दिल की आग़ोश में आ बसा है नज़ारे में मसहूर रहने की ख़्वाहिश जनम ले रही है बसा कर उसे अपनी नज़रों में शादाब आँखों में रहने को जी चाहता है वही रंग-ओ-बू की हरारत की हल्की लकीरें तमाज़त के झोंके बदन छू रहे हैं बहार आ गई याद की वादियों में सफ़र के इरादों से मायूस कश्ती किनारे पे यूँँ आ लगी है कि ठहरी हुई झील की रौशनी में नया घर बसा है ये चश्म-ए-तमन्ना की कश्ती बनी है नया आशियाना नीलगूँ रौशनी तैरती है मगर ये खड़ी है ज़माने मोहब्बत के फिर लौट आए हैं शायद वक़्त के ठहर जाने की शायद घड़ी है क़यामत कड़ी है
Ghalib Ahmad
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कौन आया है ये किस ने फूँक कर रखे क़दम दहलीज़ पर चुप-चाप चोरों की तरह रात की तारीकियों में सरसराहट साँप की साँस को सीने के अंदर रोक लो सुन न ले क़दमों की आहट दिल की धड़कन को कहो चुप साध ले दिल का दर वा तो न था पर वो तो दरवाज़े से अंदर आ गया उस ने दस्तक भी न दी एक साए की तरह है साथ साथ क्या करें किस को बुलाएँ क्या कहें ये कौन है चुप-चाप बे-आवाज़ गुम-सुम सामने बैठा हुआ यूँँ तो सब कुछ है अगर सोचो तो ये कुछ भी नहीं वहम-ओ-गुमाँ कौन अब ढूँडे उसे वो तो आ कर रात की तारीकियों में इस तरह घुल-मिल गया जैसे अपना जिस्म हो उस का लिबास हम ने देखा है उसे जो ख़ुद से भी रू-पोश है वो हमारी रूह की गर्दिश में है और हमारे जिस्म से सैराब है अब अगर तुम सो सको तो सो रहो अब वो जाएगा कहाँ अब वो शायद फिर न आएगा कभी
Ghalib Ahmad
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