“ये वक़्त अजीब है ” वक़्त बे-दर्द है थोड़ा है अजीब बस सताता ही चले जाता है कितनों को ये यहाँ तड़पाता है मौत भी देती सलामी इस को वक़्त ज़ालिम यहाँ देखे जिस को कितनी ख़्वाहिश जली दिल में मेरे कितने आँसू बहा करते हैं यहाँ मैं थका हारा यही कहता हूँ तू चले जाता है क्यूँ रुकता नहीं क्या अदावत है बड़ी तेरी कहीं जितना पाया दुनिया ने छीन कर तू ने यहाँ सब खा लिया हर दफ़ा पलकें बिछी रहती हैं दौड़के कब ख़ुशियाँ आ जाऍं ये किसी को नहीं मालूम इधर हर इंसाँ होता परेशाँ वक़्त गहरा दरिया है डूबने पर न मिले कोई निशाँ
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"मेरी दास्ताँ" वो दिन भी कितने अजीब थे जब हम दोनों क़रीब थे शबब-ए-हिज़्र न तू, न मैं सब अपने-अपने नसीब थे तू ही मेरी दुनिया थी मैं ही तेरा जहान था मुझे तेरे होने का ग़ुरूर था तुझे मेरे होने पर गुमान था तेरे साथ बिताए थे वो दिन वो राते कितनी हसीन थी उस कमरे में थी जन्नत सारी एक बिस्तर पर ही जमीन थी तेरी गोद में सर रख कर मैं गज़ले अपनी सुनाता था तू सुन कर शा'इरी सो जाती थी, मैं तेरी ख़ुशबू में खो जाता था मेरी कामयाबी की ख़बरें सुन मुझ सेे ज़्यादा झूमा करती थी वो बेवजह बातों-बातों में मेरा माथा चूमा करती थी मेरी हर परेशानी में वो मेरी हमदर्द थी,हम सेाया थी उस से बढ़कर कुछ न था बस वही एक सर्माया थी मुलाक़ात न हो तो कहती थी मैं कैसे आज सो पाऊंगी मुझे गले लगा कर कहती थी मैं तुम सेे जुदा ना हो पाऊंगी इक आईना थी वो मेरा उस सेे कुछ भी नहीं छुपा था हर चीज जानती थी मेरी मेरा सब कुछ उसे पता था यार वही चेहरे हैं अपने वही एहसास दिल में है फिर क्यूँ दूरियाँ बढ़ सी गई क्यूँ रिश्ते आज मुश्किल में है कई सवाल हैं दिल में एक-एक कर के सब सुनोगी क्या? मैं शुरू करता हूँ शुरू से अब सबका जवाब दोगी क्या क्यूँ लौटा दी अंगुठी मुझे? क्यूँ बदल गए सब इरादे तेरे? क्या हुआ तेरी सब क़समों का? अब कहाँ गए सब वादे तेरे? तेरे इन मेहंदी वाले हाथों में किसी ओर का अब नाम हैं इक हादसा हैं मेरे लिए ये माना तेरे लिए ईनाम हैं अपने हिज्र की वो पहली रात तब ख़याल तो मेरा आया होगा आई होगी सब यादें पुरानी मेरी बातों ने भी रुलाया होगा जैसे मुझ में कोई चीख रहा हैं मेरी रूह-रूह तक सो रही हैं मैं अपनी दास्तां लिख रहा हूँ और मेरी शा'इरी रो रही हैं बस यही इल्तिजा हैं ख़ुदा से कोई इतना भी प्यारा न बने कई सूरतें हो सामने नज़र के पर कोई हमारा ना बने
"Nadeem khan' Kaavish"
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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मर्द-ए-मोहब्बत उस की डिक्शनरी में मर्द का मतलब "ना-मर्द" लिखा हुआ है ख़ुश-क़िस्मत मर्द और औरतें एक दूसरे के दिल की पसंद होते हैं उस की बद-क़िस्मती की पोशाक पर सब से बड़ा दाग़ यही है के वो कुछ ना-मर्दों के निचले हिस्से को पसंद है! सिवाए एक मर्द के सिवाए एक शख़्स के उसे किसी मर्द के दिल ने नहीं चाहा जिस ने उसे उस लम्हें भी सिर्फ़ देखा जो लम्हा मर्द और ना-मर्द होने का फ़ैसला कर दिया करता है मर्द अपनी मोहब्बत के लिए बे-शुमार नज़्में लिख सकता है मगर एक बार भी अपनी मोहब्बत को गाली नहीं दे सकता भले उस की महबूबा जिस्म-फ़रोश ही क्यूँ ना हो मर्द के लिए देवी होती है अज़ीम लड़कियों और इज़्ज़त मंद मर्दों के दिल सलामत रहें जो धोके की तलवारों से काट दिए गए मगर अपनी मोहब्बत की बे-हुर्मती पर तैयार न हुआ एक मर्द का लहू-लुहान दिल जिसे बद-दुआ की पूरी इजाज़त है वो फिर भी दुआ में यही कहता है मौला उसे उस के नाम का साया नसीब कर वो समझ सके कि मोहब्बत और मर्द की "मीम" एक ही मिट्टी से बनी है मोहब्बत और मर्द के सात हुरूफ़ मिल कर "साथ" बनाते हैं लेकिन उसे ये रम्ज़ कोई मर्द ही बता सकता है उस की डिक्शनरी और ज़िन्दगी में कोई मर्द नहीं है
Ali Zaryoun
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"मरियम" मैं आईनों से गुरेज़ करते हुए पहाड़ों की कोख में साँस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूँ तो सोचता हूँ कि मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम तुम्हारी बे-साख़्ता मोहब्बत ज़मीं पे फैले हुए समुंदर की वुसअतों से भी मावरा है मोहब्बतों के समंदरों में बस एक बहिरा-ए-हिज्र है जो बुरा है मरियम ख़ला-नवर्दों को जो सितारे मुआवज़े में मिले थे वो उन की रौशनी में ये सोचते हैं कि वक़्त ही तो ख़ुदा है मरियम और इस तअल्लुक़ की गठरियों में रुकी हुई सआतों से हटकर मेरे लिए और क्या है मरियम अभी बहुत वक़्त है कि हम वक़्त दे ज़रा इक दूसरे को मगर हम इक साथ रह कर भी ख़ुश न रह सके तो मुआ'फ़ करना कि मैं ने बचपन ही दुख की दहलीज़ पर गुज़ारा मैं उन चराग़ों का दुख हूँ जिन की लवे शब-ए-इंतज़ार में बुझ गई मगर उन सेे उठने वाला धुआँ ज़मान-ओ-मकाँ में फैला हुआ है अब तक मैं कोहसारों और उन के जिस्मों से बहने वाली उन आबशारों का दुख हूँ जिन को ज़मीं के चेहरों पर रेंगते रेंगते ज़माने गुज़र गए हैं जो लोग दिल से उतर गए हैं किताबें आँखों पे रख के सोए थे मर गए हैं मैं उन का दुख हूँ जो जिस्म ख़ुद-लज़्जती से उकता के आईनों की तसल्लिओं में पले बढ़े हैं मैं उन का दुख हूँ मैं घर से भागे हुओ का दुख हूँ मैं रात जागे हुओ का दुख हूँ मैं साहिलों से बँधी हुई कश्तियों का दुख हूँ मैं लापता लड़कियों का दुख हूँ खुली हुए खिड़कियों का दुख हूँ मिटी हुई तख़्तियों का दुख हूँ थके हुए बादलों का दुख हूँ जले हुए जंगलों का दुख हूँ जो खुल कर बरसी नहीं है, मैं उस घटा का दुख हूँ ज़मीं का दुख हूँ ख़ुदा का दुख हूँ बला का दुख हूँ जो शाख सावन में फूटती है वो शाख तुम हो जो पींग बारिश के बा'द बन बन के टूटती है वो पींग तुम हो तुम्हारे होंठों से सआतों ने समाअतों का सबक़ लिया है तुम्हारी ही शाख-ए-संदली से समंदरों ने नमक लिया है तुम्हारा मेरा मुआमला ही जुदा है मरियम तुम्हें तो सब कुछ पता है मरियम
Tehzeeb Hafi
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लोग औरत को फ़क़त जिस्म समझ लेते हैं लोग औरत को फ़क़त जिस्म समझ लेते हैं रूह भी होती है उस में ये कहाँ सोचते हैं रूह क्या होती है इस से उन्हें मतलब ही नहीं वो तो बस तन के तक़ाज़ों का कहा मानते हैं रूह मर जाते हैं तो ये जिस्म है चलती हुई लाश इस हक़ीक़त को न समझते हैं न पहचानते हैं कितनी सदियों से ये वहशत का चलन जारी है कितनी सदियों से है क़ाएम ये गुनाहों का रिवाज लोग औरत की हर इक चीख़ को नग़्मा समझे वो क़बीलों का ज़माना हो कि शहरों का रिवाज जब्र से नस्ल बढ़े ज़ुल्म से तन मेल करें ये अमल हम में है बे-इल्म परिंदों में नहीं हम जो इंसानों की तहज़ीब लिए फिरते हैं हम सा वहशी कोई जंगल के दरिंदों में नहीं इक बुझी रूह लुटे जिस्म के ढांचे में लिए सोचती हूँ मैं कहाँ जा के मुक़द्दर फोड़ूं मैं न ज़िंदा हूँ कि मरने का सहारा ढूंढ़ूं और न मुर्दा हूँ कि जीने के ग़मों से छूटूं कौन बतलाएगा मुझ को किसे जा कर पूछूँ ज़िंदगी क़हर के सांचों में ढलेगी कब तक कब तलक आँख न खोलेगा ज़माने का ज़मीर ज़ुल्म और जब्र की ये रीत चलेगी कब तक औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया जब जी चाहा मसला कुचला जब जी चाहा धुत्कार दिया तुलती है कहीं दीनारों में बिकती है कहीं बाज़ारों में नंगी नचवाई जाती है अय्याशों के दरबारों में ये वो बे-इज़्ज़त चीज़ है जो बट जाती है इज़्ज़त-दारों में औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया मर्दों के लिए हर ज़ुल्म रवा औरत के लिए रोना भी ख़ता मर्दों के लिए हर ऐश का हक़ औरत के लिए जीना भी सज़ा मर्दों के लिए लाखों सेजें, औरत के लिए बस एक चिता औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया जिन सीनों ने इन को दूध दिया उन सीनों को बेवपार किया जिस कोख में इन का जिस्म ढला उस कोख का कारोबार किया जिस तन से उगे कोंपल बन कर उस तन को ज़लील-ओ-ख़्वार किया संसार की हर इक बे-शर्मी ग़ुर्बत की गोद में पलती है चकलों ही में आ कर रुकती है फ़ाक़ों से जो राह निकलती है मर्दों की हवस है जो अक्सर औरत के पाप में ढलती है औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया औरत संसार की क़िस्मत है फिर भी तक़दीर की हेटी है अवतार पयम्बर जनती है फिर भी शैतान की बेटी है ये वो बद-क़िस्मत मां है जो बेटों की सेज पे लेटी है औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया
Sahir Ludhianvi
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"सबब तो होगा ही" दहकते हैं शरारे मेरे सीने में इन्हें सुलगा रहा है कोई कोहरे में अब उन रस्तों के साए छोड़ आया हूँ मगर इक आग है जिस को बुझाता हूँ मैं तन्हा ज़िक्र करता हूँ मैं थोड़ा थोड़ा डरता हूँ इसी का नाम है क्या ज़िंदगी जो आज यहाँ मैं जी रहा हूँ सिर्फ़ मिरी इस साँस का चलने का कोई तो सबब होगा ये पहले ऐसी चलती थोड़ी थी मेरी न डर था तब न चाहत थी न कोई ख़्वाब था मेरा पर अब डर ख़्वाब और चाहत सभी कुछ मुझ में शामिल हैं पर अब ज़िंदा ही रहने से ये दिल ख़ुश है अगर है तो भला कितना तवक़्क़ो है अगर तो क्यूँँ यही हैं कुछ सवालात अब जो साँसें चल रही हैं आज सबब तो एक होगा ही अगर है तो भला क्यूँँ है ये पेशानी पे जो सीधी लकीरें हैं इन्हें सीधा ही रहने का किसी ने जैसे दे रक्खा हो कोई हुक्म अगर दे रक्खा है तो क्यूँँ सबब इस का तो होगा ही मगर है कब तलक आख़िर कभी तो इस जगह से ही निकल के देख मुनासिब गर लगे तो ज़ख़्म कल के देख
sahllucknowi
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“तेवर “ मैं कमज़ोर इतना नहीं हूँ कि हर एक का ज़ुल्म सह लूँ यही तो शराफ़त है मेरी जिसे जानते भी नहीं हो मैं बुज़दिल नहीं हूँ जो मैदान को छोड़कर दूर चल दूँ मुझे आज़मा लो अगर शक़ हो तुम को मैं कंकड़ नहीं हूँ जिसे कोई भी दूर लुढ़का के चल दे मैं हूँ एक चट्टान जैसा तुम्हें सिर झुकाना ही होगा सभी से अलग मेरे तेवर ज़माने से हट कर रहा हूँ विरासत में हिम्मत मिली है बड़ों से मुहब्बत मिली है अलग ही है तहज़ीब मुझ में ज़रा तुम क़रीब आ के देखो मैं कैसे रहा हूँ मैं हम सा रहा हूँ ज़माने में अब के नए सोच वाला मैं लड़का नया हूँ
sahllucknowi
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“एक-तरफ़ा” पहली दफ़ा देखा तुम्हें मुड़के नहीं देखा मुझे तो दोस्त हॅंसने थे लगे बेचैनी बढ़ने थी लगी साँसें ये चढ़ने थी लगी मिलता तो सब सेे था ही मैं फिर इश्क़ सा वो क्यूँ हुआ आख़िर हुआ तो क्यूँ हुआ ख़ामोशी तेरी क्यूँ मुझे खाती है हर दम नोचकर मंज़िल है भटकी बरसों से कैसे चुनूँ अगला सफ़र इस रिश्ते को तुम नाम दो या फिर इसे आराम दो होती है कितनी उलझनें मालूम है ओ बे-ख़बर कब तक सताएगी मुझे मैं जल चुका पूरी तरह कब तक जलाएगी मुझे झुलसा हूँ तेरे इश्क़ में परवाने जैसे जलते हों आहट सुनी है जब कभी धड़का है दिल ज़ोरों से तब आगे जनम जब भी मिले उस का तो हो कोई सबब
sahllucknowi
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"फ़ासला" तुम्हारे इश्क़ ने बीमार कर दिया है मुझे है कितनी फ़िक्र मिरे जिस्म की पता है मुझे तिरे ख़यालों से फ़ुर्सत कभी मिली ही नहीं तिरा ख़याल भी सब सेे अलग दिखा है मुझे मकाँ-ए-दिल में तिरा इंतिज़ार रहता है मैं जैसा सोचता हूँ क्या तू सोचता है मुझे जहाँ भी देखता हूँ तेरा ही तसव्वुर है तिरी नज़र ने अँधेरे में भी छुआ है मुझे न सुब्ह मिरी हसीं होती है न रात कभी मैं ख़ुद को भूल गया हूँ ये क्या हुआ है मुझे तिरा ख़याल न मिटता न दूर होता है अजीब शख़्स से पाला इधर पड़ा है मुझे ग़ज़ब सितम हो रहा है यहाँ मिरे दिल पे ये आइना भी सर-ए-आम कह रहा है मुझे
sahllucknowi
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“अधूरी प्यास” आदत नहीं जाती मिरी मैं देखता हूँ तेरे घर को आज भी है एक आदत मुझ में अब भी बाक़ी सी कुछ देर तकता हूँ चले जाता हूँ फिर सब पूछते क्या है भला दिल में तिरे ख़ामोश आता जाता है क्यूँँ हर दफ़ा तस्वीर देखा करता है वो जा चुकी है फिर भी ये दिल मानता बिल्कुल नहीं क्यूँँ चैन भी पड़ता नहीं आख़िर करूँ तो क्या करूँ ख़ुद से ही बातें करता हूँ वो लम्स वो लम्हें मुझे अब भी हैं याद बरसात का मौसम था और तू हाथ मेरा थाम के चलती गई बिन मुस्कुराए बात करते ही नहीं थे हम कभी फिर कैसा मेरे वक़्त ने ये खेल रचकर बे-सबब क्यूँँ ग़म दिया अब उलझा ही रहता हूँ मैं रेशम की कोई डोर सा है एक आदत जो नहीं जाएगी अब है इक अधूरी प्यास कुछ आसानी से बुझने नहीं वाली मिरी
sahllucknowi
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