nazmKuch Alfaaz

“अधूरी प्यास” आदत नहीं जाती मिरी मैं देखता हूँ तेरे घर को आज भी है एक आदत मुझ में अब भी बाक़ी सी कुछ देर तकता हूँ चले जाता हूँ फिर सब पूछते क्या है भला दिल में तिरे ख़ामोश आता जाता है क्यूँँ हर दफ़ा तस्वीर देखा करता है वो जा चुकी है फिर भी ये दिल मानता बिल्कुल नहीं क्यूँँ चैन भी पड़ता नहीं आख़िर करूँ तो क्या करूँ ख़ुद से ही बातें करता हूँ वो लम्स वो लम्हें मुझे अब भी हैं याद बरसात का मौसम था और तू हाथ मेरा थाम के चलती गई बिन मुस्कुराए बात करते ही नहीं थे हम कभी फिर कैसा मेरे वक़्त ने ये खेल रचकर बे-सबब क्यूँँ ग़म दिया अब उलझा ही रहता हूँ मैं रेशम की कोई डोर सा है एक आदत जो नहीं जाएगी अब है इक अधूरी प्यास कुछ आसानी से बुझने नहीं वाली मिरी

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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइ‌नात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है

Divya 'Kumar Sahab'

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"तुम हो" तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो मैं होश में बाहोश में मिरे जिस्म का तुम ख़ून हो तुम सर्द हो बरसात भी मिरी गर्मियों की तुम जून हो तुम ग़ज़ल हो हो तुम शा'इरी मिरी लिखी नज़्म की धुन हो मिरी हँसी भी तुम मिरी ख़ुशी भी तुम मिरे इस हयात की मम्नून हो तुम धूप हो मिरी छाँव भी तुम सियाह रात का मून हो तुम सिन हो तुम काफ़ भी तुम वाओ के बा'द की नून हो तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो

ZafarAli Memon

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

Faiz Ahmad Faiz

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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं

Tehzeeb Hafi

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“एक-तरफ़ा” पहली दफ़ा देखा तुम्हें मुड़के नहीं देखा मुझे तो दोस्त हॅंसने थे लगे बेचैनी बढ़ने थी लगी साँसें ये चढ़ने थी लगी मिलता तो सब सेे था ही मैं फिर इश्क़ सा वो क्यूँ हुआ आख़िर हुआ तो क्यूँ हुआ ख़ामोशी तेरी क्यूँ मुझे खाती है हर दम नोचकर मंज़िल है भटकी बरसों से कैसे चुनूँ अगला सफ़र इस रिश्ते को तुम नाम दो या फिर इसे आराम दो होती है कितनी उलझनें मालूम है ओ बे-ख़बर कब तक सताएगी मुझे मैं जल चुका पूरी तरह कब तक जलाएगी मुझे झुलसा हूँ तेरे इश्क़ में परवाने जैसे जलते हों आहट सुनी है जब कभी धड़का है दिल ज़ोरों से तब आगे जनम जब भी मिले उस का तो हो कोई सबब

sahllucknowi

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"सबब तो होगा ही" दहकते हैं शरारे मेरे सीने में इन्हें सुलगा रहा है कोई कोहरे में अब उन रस्तों के साए छोड़ आया हूँ मगर इक आग है जिस को बुझाता हूँ मैं तन्हा ज़िक्र करता हूँ मैं थोड़ा थोड़ा डरता हूँ इसी का नाम है क्या ज़िंदगी जो आज यहाँ मैं जी रहा हूँ सिर्फ़ मिरी इस साँस का चलने का कोई तो सबब होगा ये पहले ऐसी चलती थोड़ी थी मेरी न डर था तब न चाहत थी न कोई ख़्वाब था मेरा पर अब डर ख़्वाब और चाहत सभी कुछ मुझ में शामिल हैं पर अब ज़िंदा ही रहने से ये दिल ख़ुश है अगर है तो भला कितना तवक़्क़ो है अगर तो क्यूँँ यही हैं कुछ सवालात अब जो साँसें चल रही हैं आज सबब तो एक होगा ही अगर है तो भला क्यूँँ है ये पेशानी पे जो सीधी लकीरें हैं इन्हें सीधा ही रहने का किसी ने जैसे दे रक्खा हो कोई हुक्म अगर दे रक्खा है तो क्यूँँ सबब इस का तो होगा ही मगर है कब तलक आख़िर कभी तो इस जगह से ही निकल के देख मुनासिब गर लगे तो ज़ख़्म कल के देख

sahllucknowi

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“ये वक़्त अजीब है ” वक़्त बे-दर्द है थोड़ा है अजीब बस सताता ही चले जाता है कितनों को ये यहाँ तड़पाता है मौत भी देती सलामी इस को वक़्त ज़ालिम यहाँ देखे जिस को कितनी ख़्वाहिश जली दिल में मेरे कितने आँसू बहा करते हैं यहाँ मैं थका हारा यही कहता हूँ तू चले जाता है क्यूँ रुकता नहीं क्या अदावत है बड़ी तेरी कहीं जितना पाया दुनिया ने छीन कर तू ने यहाँ सब खा लिया हर दफ़ा पलकें बिछी रहती हैं दौड़के कब ख़ुशियाँ आ जाऍं ये किसी को नहीं मालूम इधर हर इंसाँ होता परेशाँ वक़्त गहरा दरिया है डूबने पर न मिले कोई निशाँ

sahllucknowi

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“तेवर “ मैं कमज़ोर इतना नहीं हूँ कि हर एक का ज़ुल्म सह लूँ यही तो शराफ़त है मेरी जिसे जानते भी नहीं हो मैं बुज़दिल नहीं हूँ जो मैदान को छोड़कर दूर चल दूँ मुझे आज़मा लो अगर शक़ हो तुम को मैं कंकड़ नहीं हूँ जिसे कोई भी दूर लुढ़का के चल दे मैं हूँ एक चट्टान जैसा तुम्हें सिर झुकाना ही होगा सभी से अलग मेरे तेवर ज़माने से हट कर रहा हूँ विरासत में हिम्मत मिली है बड़ों से मुहब्बत मिली है अलग ही है तहज़ीब मुझ में ज़रा तुम क़रीब आ के देखो मैं कैसे रहा हूँ मैं हम सा रहा हूँ ज़माने में अब के नए सोच वाला मैं लड़का नया हूँ

sahllucknowi

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"फ़ासला" तुम्हारे इश्क़ ने बीमार कर दिया है मुझे है कितनी फ़िक्र मिरे जिस्म की पता है मुझे तिरे ख़यालों से फ़ुर्सत कभी मिली ही नहीं तिरा ख़याल भी सब सेे अलग दिखा है मुझे मकाँ-ए-दिल में तिरा इंतिज़ार रहता है मैं जैसा सोचता हूँ क्या तू सोचता है मुझे जहाँ भी देखता हूँ तेरा ही तसव्वुर है तिरी नज़र ने अँधेरे में भी छुआ है मुझे न सुब्ह मिरी हसीं होती है न रात कभी मैं ख़ुद को भूल गया हूँ ये क्या हुआ है मुझे तिरा ख़याल न मिटता न दूर होता है अजीब शख़्स से पाला इधर पड़ा है मुझे ग़ज़ब सितम हो रहा है यहाँ मिरे दिल पे ये आइना भी सर-ए-आम कह रहा है मुझे

sahllucknowi

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