"फ़ासला" तुम्हारे इश्क़ ने बीमार कर दिया है मुझे है कितनी फ़िक्र मिरे जिस्म की पता है मुझे तिरे ख़यालों से फ़ुर्सत कभी मिली ही नहीं तिरा ख़याल भी सब सेे अलग दिखा है मुझे मकाँ-ए-दिल में तिरा इंतिज़ार रहता है मैं जैसा सोचता हूँ क्या तू सोचता है मुझे जहाँ भी देखता हूँ तेरा ही तसव्वुर है तिरी नज़र ने अँधेरे में भी छुआ है मुझे न सुब्ह मिरी हसीं होती है न रात कभी मैं ख़ुद को भूल गया हूँ ये क्या हुआ है मुझे तिरा ख़याल न मिटता न दूर होता है अजीब शख़्स से पाला इधर पड़ा है मुझे ग़ज़ब सितम हो रहा है यहाँ मिरे दिल पे ये आइना भी सर-ए-आम कह रहा है मुझे
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क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!
Raghav Ramkaran
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ये किस तरह याद आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो कि जैसे सच-मुच निगाह के सामने खड़ी मुस्कुरा रही हो ये जिस्म-ए-नाज़ुक, ये नर्म बाहें, हसीन गर्दन, सिडौल बाज़ू शगुफ़्ता चेहरा, सलोनी रंगत, घनेरा जूड़ा, सियाह गेसू नशीली आँखें, रसीली चितवन, दराज़ पलकें, महीन अबरू तमाम शोख़ी, तमाम बिजली, तमाम मस्ती, तमाम जादू हज़ारों जादू जगा रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो गुलाबी लब, मुस्कुराते आरिज़, जबीं कुशादा, बुलंद क़ामत निगाह में बिजलियों की झिल-मिल, अदाओं में शबनमी लताफ़त धड़कता सीना, महकती साँसें, नवा में रस, अँखड़ियों में अमृत हमा हलावत, हमा मलाहत, हमा तरन्नुम, हमा नज़ाकत लचक लचक गुनगुना रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो तो क्या मुझे तुम जला ही लोगी गले से अपने लगा ही लोगी जो फूल जूड़े से गिर पड़ा है तड़प के उस को उठा ही लोगी भड़कते शोलों, कड़कती बिजली से मेरा ख़िर्मन बचा ही लोगी घनेरी ज़ुल्फ़ों की छाँव में मुस्कुरा के मुझ को छुपा ही लोगी कि आज तक आज़मा रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो नहीं मोहब्बत की कोई क़ीमत जो कोई क़ीमत अदा करोगी वफ़ा की फ़ुर्सत न देगी दुनिया हज़ार अज़्म-ए-वफ़ा करोगी मुझे बहलने दो रंज-ओ-ग़म से सहारे कब तक दिया करोगी जुनूँ को इतना न गुदगुदाओ, पकड़ लूँ दामन तो क्या करोगी क़रीब बढ़ती ही आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो
Kaifi Azmi
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"मैं बिज़नेस-मैन हूँ जानम" मेरी शोहरत मेरा डंका मेरे ए'जाज़ का सुन कर कभी ये न समझ लेना मैं चोटी का लिखारी हूँ मैं बिज़नेस-मैन हूँ जानम मैं छोटा सा ब्योपारी हूँ मेरी आरत पे बरसों से जो महँगे दाम बिकता है वो तेरे ग़म का सौदा है तेरी आँखें तेरे आँसू तेरी चाहत तेरे जज़्बे यहाँ सेल्फों पे रखे हैं वही तो मैं ने बेचे हैं तुम्हारी बात छिड़ जाए तो बातें बेच देता हूँ ज़रूरत कुछ ज़ियादा हो तो यादें बेच देता हूँ तुम्हारे नाम के सदके बहुत पैसा कमाया है नई गाड़ी ख़रीदी है नया बँगला बनाया है मगर क्यूँँ मुझ को लगता है मेरे अंदर का ब्योपारी तुम्हीं को बेच आया है मैं बिज़नेस-मैन हूँ जानम मैं बिज़नेस-मैन हूँ जानम
Khalil Ur Rehman Qamar
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"रायगानी-2" जो बात गिनती के कुछ दिनों से शुरू थी वो साल-हा-साल तक चली है कई ज़मानों में बँट गई है मैं इन ज़मानों में लम्हा लम्हा तुम्हारी नज़रों के बिन रहा हूँ मैं अब तलक भी तुम्हारे जाने का बाक़ी नुक़सान गिन रहा हूँ मुझे ज़माना ये कह रहा था कि राइगानी मुबालगा है भला तुम्हारी जुदाई का दुख ज़माँ मकाँ को हिला रहा है भला रिलेटिविटी की साइंस किसी के मुड़ने से मुंसलिक है इन्हें बताओ तुम्हारे जाने का दुख उठा कर फ़क़त अकेला वो मैं नहीं था जो ज़र्रा ज़र्रा बिखर गया था तुम्हारे जाने के कुछ दिनों में हमारा हॉकिंग भी मर गया था और उस की थ्योरी के काले गड्ढे जिन्हें हमेशा तुम्हारी आँखों में देखना था वो मेरे चेहरे पे पड़ गए हैं, वो मेरी आँखों में गड़ गए हैं तुम्हारे जाने के बा'द सब कुछ ही एक अस्सी के ज़ाविए पर पलट गया है कि मेरा होना तुम्हारे होने से मुंसलिक था तुम्हारी आँखों की रौशनी थी तो मैं भी दुनिया में हो रहा था तुम्हारे लहजे के सुर मिले थे तो मैं बना था तुम्हारे हाथों का लम्स हाथों को मिल रहा था तो देखता था हमारे हाथों में एटमों की दफ़ा की कुव्वत कशिश में कैसे बदल रही है पर अब तुम्हारी नज़र कहीं है तुम्हारा लहजा भी अब नहीं है तो तुम बताओ मैं किस तरीक़े से अपनी हस्ती को नैस्ती से जुदा करूँँगा मैं दंग आँखों से सारी दुनिया को देखता हूँ और अपने होने की कोई इल्लत तलाशता हूँ अजीब तरह का बे-निशान बे-मक़ाम दुख है समझने वाले समझ गए थे ये राइगानी है राइगानी तमाम सदियों का ख़ाम दुख है मैं अब हक़ीक़त समझ रहा हूँ तमाम दुख था तमाम दुख है तुम्हें बताऊँ किसी के होने का कोई मक़सद कोई मआ'नी कहीं नहीं है अगर तो नीत्शे नहीं मरा है तो उस से पूछा क्या करेंगे ज़मीं पे रह के पले बढ़ेंगे बका की ख़ातिर लड़े मरेंगे फिर अपने जैसे कई जनेंगे और इस जहाँ से निकल पड़ेंगे जिन्हे जनेंगे वो सब के सब भी यही करेंगे पले बढ़ेंगे लड़े मरेंगे फिर उन के बच्चे और उन के बच्चे ये क्या तमाशा-ए-हा-ओ-हू है ये ज़िंदगी है तो आख थू है
Sohaib Mugheera Siddiqi
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उर्दू है मिरा नाम मैं 'ख़ुसरव' की पहेली मैं 'मीर' की हमराज़ हूँ 'ग़ालिब' की सहेली दक्कन के 'वली' ने मुझे गोदी में खेलाया 'सौदा' के क़सीदों ने मिरा हुस्न बढ़ाया है 'मीर' की अज़्मत कि मुझे चलना सिखाया मैं दाग़ के आंगन में खिली बन के चमेली उर्दू है मिरा नाम मैं 'ख़ुसरव' की पहेली 'ग़ालिब' ने बुलंदी का सफ़र मुझ को सिखाया 'हाली' ने मुरव्वत का सबक़ याद दिलाया 'इक़बाल' ने आईना-ए-हक़ मुझ को दिखाया 'मोमिन' ने सजाई मिरे ख़्वाबों की हवेली उर्दू है मिरा नाम मैं 'ख़ुसरव' की पहेली है 'ज़ौक़' की अज़्मत कि दिए मुझ को सहारे 'चकबस्त' की उल्फ़त ने मिरे ख़्वाब सँवारे 'फ़ानी' ने सजाए मिरी पलकों पे सितारे 'अकबर' ने रचाई मिरी बे-रंग हथेली उर्दू है मिरा नाम मैं 'ख़ुसरव' की पहेली क्यूँ मुझ को बनाते हो तअस्सुब का निशाना मैं ने तो कभी ख़ुद को मुसलमां नहीं माना देखा था कभी मैं ने भी ख़ुशियों का ज़माना अपने ही वतन में हूँ मगर आज अकेली उर्दू है मिरा नाम मैं 'ख़ुसरव' की पहेली
Iqbal Ashhar
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“एक-तरफ़ा” पहली दफ़ा देखा तुम्हें मुड़के नहीं देखा मुझे तो दोस्त हॅंसने थे लगे बेचैनी बढ़ने थी लगी साँसें ये चढ़ने थी लगी मिलता तो सब सेे था ही मैं फिर इश्क़ सा वो क्यूँ हुआ आख़िर हुआ तो क्यूँ हुआ ख़ामोशी तेरी क्यूँ मुझे खाती है हर दम नोचकर मंज़िल है भटकी बरसों से कैसे चुनूँ अगला सफ़र इस रिश्ते को तुम नाम दो या फिर इसे आराम दो होती है कितनी उलझनें मालूम है ओ बे-ख़बर कब तक सताएगी मुझे मैं जल चुका पूरी तरह कब तक जलाएगी मुझे झुलसा हूँ तेरे इश्क़ में परवाने जैसे जलते हों आहट सुनी है जब कभी धड़का है दिल ज़ोरों से तब आगे जनम जब भी मिले उस का तो हो कोई सबब
sahllucknowi
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"सबब तो होगा ही" दहकते हैं शरारे मेरे सीने में इन्हें सुलगा रहा है कोई कोहरे में अब उन रस्तों के साए छोड़ आया हूँ मगर इक आग है जिस को बुझाता हूँ मैं तन्हा ज़िक्र करता हूँ मैं थोड़ा थोड़ा डरता हूँ इसी का नाम है क्या ज़िंदगी जो आज यहाँ मैं जी रहा हूँ सिर्फ़ मिरी इस साँस का चलने का कोई तो सबब होगा ये पहले ऐसी चलती थोड़ी थी मेरी न डर था तब न चाहत थी न कोई ख़्वाब था मेरा पर अब डर ख़्वाब और चाहत सभी कुछ मुझ में शामिल हैं पर अब ज़िंदा ही रहने से ये दिल ख़ुश है अगर है तो भला कितना तवक़्क़ो है अगर तो क्यूँँ यही हैं कुछ सवालात अब जो साँसें चल रही हैं आज सबब तो एक होगा ही अगर है तो भला क्यूँँ है ये पेशानी पे जो सीधी लकीरें हैं इन्हें सीधा ही रहने का किसी ने जैसे दे रक्खा हो कोई हुक्म अगर दे रक्खा है तो क्यूँँ सबब इस का तो होगा ही मगर है कब तलक आख़िर कभी तो इस जगह से ही निकल के देख मुनासिब गर लगे तो ज़ख़्म कल के देख
sahllucknowi
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“ये वक़्त अजीब है ” वक़्त बे-दर्द है थोड़ा है अजीब बस सताता ही चले जाता है कितनों को ये यहाँ तड़पाता है मौत भी देती सलामी इस को वक़्त ज़ालिम यहाँ देखे जिस को कितनी ख़्वाहिश जली दिल में मेरे कितने आँसू बहा करते हैं यहाँ मैं थका हारा यही कहता हूँ तू चले जाता है क्यूँ रुकता नहीं क्या अदावत है बड़ी तेरी कहीं जितना पाया दुनिया ने छीन कर तू ने यहाँ सब खा लिया हर दफ़ा पलकें बिछी रहती हैं दौड़के कब ख़ुशियाँ आ जाऍं ये किसी को नहीं मालूम इधर हर इंसाँ होता परेशाँ वक़्त गहरा दरिया है डूबने पर न मिले कोई निशाँ
sahllucknowi
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“तेवर “ मैं कमज़ोर इतना नहीं हूँ कि हर एक का ज़ुल्म सह लूँ यही तो शराफ़त है मेरी जिसे जानते भी नहीं हो मैं बुज़दिल नहीं हूँ जो मैदान को छोड़कर दूर चल दूँ मुझे आज़मा लो अगर शक़ हो तुम को मैं कंकड़ नहीं हूँ जिसे कोई भी दूर लुढ़का के चल दे मैं हूँ एक चट्टान जैसा तुम्हें सिर झुकाना ही होगा सभी से अलग मेरे तेवर ज़माने से हट कर रहा हूँ विरासत में हिम्मत मिली है बड़ों से मुहब्बत मिली है अलग ही है तहज़ीब मुझ में ज़रा तुम क़रीब आ के देखो मैं कैसे रहा हूँ मैं हम सा रहा हूँ ज़माने में अब के नए सोच वाला मैं लड़का नया हूँ
sahllucknowi
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“अधूरी प्यास” आदत नहीं जाती मिरी मैं देखता हूँ तेरे घर को आज भी है एक आदत मुझ में अब भी बाक़ी सी कुछ देर तकता हूँ चले जाता हूँ फिर सब पूछते क्या है भला दिल में तिरे ख़ामोश आता जाता है क्यूँँ हर दफ़ा तस्वीर देखा करता है वो जा चुकी है फिर भी ये दिल मानता बिल्कुल नहीं क्यूँँ चैन भी पड़ता नहीं आख़िर करूँ तो क्या करूँ ख़ुद से ही बातें करता हूँ वो लम्स वो लम्हें मुझे अब भी हैं याद बरसात का मौसम था और तू हाथ मेरा थाम के चलती गई बिन मुस्कुराए बात करते ही नहीं थे हम कभी फिर कैसा मेरे वक़्त ने ये खेल रचकर बे-सबब क्यूँँ ग़म दिया अब उलझा ही रहता हूँ मैं रेशम की कोई डोर सा है एक आदत जो नहीं जाएगी अब है इक अधूरी प्यास कुछ आसानी से बुझने नहीं वाली मिरी
sahllucknowi
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