“एक-तरफ़ा” पहली दफ़ा देखा तुम्हें मुड़के नहीं देखा मुझे तो दोस्त हॅंसने थे लगे बेचैनी बढ़ने थी लगी साँसें ये चढ़ने थी लगी मिलता तो सब सेे था ही मैं फिर इश्क़ सा वो क्यूँ हुआ आख़िर हुआ तो क्यूँ हुआ ख़ामोशी तेरी क्यूँ मुझे खाती है हर दम नोचकर मंज़िल है भटकी बरसों से कैसे चुनूँ अगला सफ़र इस रिश्ते को तुम नाम दो या फिर इसे आराम दो होती है कितनी उलझनें मालूम है ओ बे-ख़बर कब तक सताएगी मुझे मैं जल चुका पूरी तरह कब तक जलाएगी मुझे झुलसा हूँ तेरे इश्क़ में परवाने जैसे जलते हों आहट सुनी है जब कभी धड़का है दिल ज़ोरों से तब आगे जनम जब भी मिले उस का तो हो कोई सबब
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"मरियम" मैं आईनों से गुरेज़ करते हुए पहाड़ों की कोख में साँस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूँ तो सोचता हूँ कि मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम तुम्हारी बे-साख़्ता मोहब्बत ज़मीं पे फैले हुए समुंदर की वुसअतों से भी मावरा है मोहब्बतों के समंदरों में बस एक बहिरा-ए-हिज्र है जो बुरा है मरियम ख़ला-नवर्दों को जो सितारे मुआवज़े में मिले थे वो उन की रौशनी में ये सोचते हैं कि वक़्त ही तो ख़ुदा है मरियम और इस तअल्लुक़ की गठरियों में रुकी हुई सआतों से हटकर मेरे लिए और क्या है मरियम अभी बहुत वक़्त है कि हम वक़्त दे ज़रा इक दूसरे को मगर हम इक साथ रह कर भी ख़ुश न रह सके तो मुआ'फ़ करना कि मैं ने बचपन ही दुख की दहलीज़ पर गुज़ारा मैं उन चराग़ों का दुख हूँ जिन की लवे शब-ए-इंतज़ार में बुझ गई मगर उन सेे उठने वाला धुआँ ज़मान-ओ-मकाँ में फैला हुआ है अब तक मैं कोहसारों और उन के जिस्मों से बहने वाली उन आबशारों का दुख हूँ जिन को ज़मीं के चेहरों पर रेंगते रेंगते ज़माने गुज़र गए हैं जो लोग दिल से उतर गए हैं किताबें आँखों पे रख के सोए थे मर गए हैं मैं उन का दुख हूँ जो जिस्म ख़ुद-लज़्जती से उकता के आईनों की तसल्लिओं में पले बढ़े हैं मैं उन का दुख हूँ मैं घर से भागे हुओ का दुख हूँ मैं रात जागे हुओ का दुख हूँ मैं साहिलों से बँधी हुई कश्तियों का दुख हूँ मैं लापता लड़कियों का दुख हूँ खुली हुए खिड़कियों का दुख हूँ मिटी हुई तख़्तियों का दुख हूँ थके हुए बादलों का दुख हूँ जले हुए जंगलों का दुख हूँ जो खुल कर बरसी नहीं है, मैं उस घटा का दुख हूँ ज़मीं का दुख हूँ ख़ुदा का दुख हूँ बला का दुख हूँ जो शाख सावन में फूटती है वो शाख तुम हो जो पींग बारिश के बा'द बन बन के टूटती है वो पींग तुम हो तुम्हारे होंठों से सआतों ने समाअतों का सबक़ लिया है तुम्हारी ही शाख-ए-संदली से समंदरों ने नमक लिया है तुम्हारा मेरा मुआमला ही जुदा है मरियम तुम्हें तो सब कुछ पता है मरियम
Tehzeeb Hafi
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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"मेरी दास्ताँ" वो दिन भी कितने अजीब थे जब हम दोनों क़रीब थे शबब-ए-हिज़्र न तू, न मैं सब अपने-अपने नसीब थे तू ही मेरी दुनिया थी मैं ही तेरा जहान था मुझे तेरे होने का ग़ुरूर था तुझे मेरे होने पर गुमान था तेरे साथ बिताए थे वो दिन वो राते कितनी हसीन थी उस कमरे में थी जन्नत सारी एक बिस्तर पर ही जमीन थी तेरी गोद में सर रख कर मैं गज़ले अपनी सुनाता था तू सुन कर शा'इरी सो जाती थी, मैं तेरी ख़ुशबू में खो जाता था मेरी कामयाबी की ख़बरें सुन मुझ सेे ज़्यादा झूमा करती थी वो बेवजह बातों-बातों में मेरा माथा चूमा करती थी मेरी हर परेशानी में वो मेरी हमदर्द थी,हम सेाया थी उस से बढ़कर कुछ न था बस वही एक सर्माया थी मुलाक़ात न हो तो कहती थी मैं कैसे आज सो पाऊंगी मुझे गले लगा कर कहती थी मैं तुम सेे जुदा ना हो पाऊंगी इक आईना थी वो मेरा उस सेे कुछ भी नहीं छुपा था हर चीज जानती थी मेरी मेरा सब कुछ उसे पता था यार वही चेहरे हैं अपने वही एहसास दिल में है फिर क्यूँ दूरियाँ बढ़ सी गई क्यूँ रिश्ते आज मुश्किल में है कई सवाल हैं दिल में एक-एक कर के सब सुनोगी क्या? मैं शुरू करता हूँ शुरू से अब सबका जवाब दोगी क्या क्यूँ लौटा दी अंगुठी मुझे? क्यूँ बदल गए सब इरादे तेरे? क्या हुआ तेरी सब क़समों का? अब कहाँ गए सब वादे तेरे? तेरे इन मेहंदी वाले हाथों में किसी ओर का अब नाम हैं इक हादसा हैं मेरे लिए ये माना तेरे लिए ईनाम हैं अपने हिज्र की वो पहली रात तब ख़याल तो मेरा आया होगा आई होगी सब यादें पुरानी मेरी बातों ने भी रुलाया होगा जैसे मुझ में कोई चीख रहा हैं मेरी रूह-रूह तक सो रही हैं मैं अपनी दास्तां लिख रहा हूँ और मेरी शा'इरी रो रही हैं बस यही इल्तिजा हैं ख़ुदा से कोई इतना भी प्यारा न बने कई सूरतें हो सामने नज़र के पर कोई हमारा ना बने
"Nadeem khan' Kaavish"
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"यार" यार था मैं तुम्हारा या महज़ कोई सीढ़ी मंज़िल तक पहूँच गए, पीछे देखा तक नहीं जो सीख किसी ने नहीं वो सीख पेड़ों ने दी छाओं लेते रहे मगर तुम्हारी आरी रुकी नहीं बचपन में खेला करते साथ हम साँप सीढ़ी उतरा ये ज़िंदगी में कब, भनक तक लगी नहीं सपने भी साथ बुने थे बहुत उमीदें भी थी कई बादलों की सैर पर निकल गए तुम, पर मैं नहीं अगर रुकसत की होती ख़बर ज़रा सी भी तब माँ से दो रोटी ज़्यादा, बनवाता नहीं ‘अर्पित’ मैं ने घूम फिर कर यही बात है मानी कई मिलेंगे इन के जैसे, ये ज़ालिम अकेले नहीं
Arpit Sharma
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"दरीचा-हा-ए-ख़याल" चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ये सब दरीचा-हा-ए-ख़याल जो तुम्हारी ही सम्त खुलते हैं बंद कर दूँ कुछ इस तरह कि यहाँ याद की इक किरन भी आ न सके चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ख़ुद भी न याद आऊँ तुम्हें जैसे तुम सिर्फ़ इक कहानी थीं जैसे मैं सिर्फ़ इक फ़साना था
Jaun Elia
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“तेवर “ मैं कमज़ोर इतना नहीं हूँ कि हर एक का ज़ुल्म सह लूँ यही तो शराफ़त है मेरी जिसे जानते भी नहीं हो मैं बुज़दिल नहीं हूँ जो मैदान को छोड़कर दूर चल दूँ मुझे आज़मा लो अगर शक़ हो तुम को मैं कंकड़ नहीं हूँ जिसे कोई भी दूर लुढ़का के चल दे मैं हूँ एक चट्टान जैसा तुम्हें सिर झुकाना ही होगा सभी से अलग मेरे तेवर ज़माने से हट कर रहा हूँ विरासत में हिम्मत मिली है बड़ों से मुहब्बत मिली है अलग ही है तहज़ीब मुझ में ज़रा तुम क़रीब आ के देखो मैं कैसे रहा हूँ मैं हम सा रहा हूँ ज़माने में अब के नए सोच वाला मैं लड़का नया हूँ
sahllucknowi
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"सबब तो होगा ही" दहकते हैं शरारे मेरे सीने में इन्हें सुलगा रहा है कोई कोहरे में अब उन रस्तों के साए छोड़ आया हूँ मगर इक आग है जिस को बुझाता हूँ मैं तन्हा ज़िक्र करता हूँ मैं थोड़ा थोड़ा डरता हूँ इसी का नाम है क्या ज़िंदगी जो आज यहाँ मैं जी रहा हूँ सिर्फ़ मिरी इस साँस का चलने का कोई तो सबब होगा ये पहले ऐसी चलती थोड़ी थी मेरी न डर था तब न चाहत थी न कोई ख़्वाब था मेरा पर अब डर ख़्वाब और चाहत सभी कुछ मुझ में शामिल हैं पर अब ज़िंदा ही रहने से ये दिल ख़ुश है अगर है तो भला कितना तवक़्क़ो है अगर तो क्यूँँ यही हैं कुछ सवालात अब जो साँसें चल रही हैं आज सबब तो एक होगा ही अगर है तो भला क्यूँँ है ये पेशानी पे जो सीधी लकीरें हैं इन्हें सीधा ही रहने का किसी ने जैसे दे रक्खा हो कोई हुक्म अगर दे रक्खा है तो क्यूँँ सबब इस का तो होगा ही मगर है कब तलक आख़िर कभी तो इस जगह से ही निकल के देख मुनासिब गर लगे तो ज़ख़्म कल के देख
sahllucknowi
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"फ़ासला" तुम्हारे इश्क़ ने बीमार कर दिया है मुझे है कितनी फ़िक्र मिरे जिस्म की पता है मुझे तिरे ख़यालों से फ़ुर्सत कभी मिली ही नहीं तिरा ख़याल भी सब सेे अलग दिखा है मुझे मकाँ-ए-दिल में तिरा इंतिज़ार रहता है मैं जैसा सोचता हूँ क्या तू सोचता है मुझे जहाँ भी देखता हूँ तेरा ही तसव्वुर है तिरी नज़र ने अँधेरे में भी छुआ है मुझे न सुब्ह मिरी हसीं होती है न रात कभी मैं ख़ुद को भूल गया हूँ ये क्या हुआ है मुझे तिरा ख़याल न मिटता न दूर होता है अजीब शख़्स से पाला इधर पड़ा है मुझे ग़ज़ब सितम हो रहा है यहाँ मिरे दिल पे ये आइना भी सर-ए-आम कह रहा है मुझे
sahllucknowi
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“अधूरी प्यास” आदत नहीं जाती मिरी मैं देखता हूँ तेरे घर को आज भी है एक आदत मुझ में अब भी बाक़ी सी कुछ देर तकता हूँ चले जाता हूँ फिर सब पूछते क्या है भला दिल में तिरे ख़ामोश आता जाता है क्यूँँ हर दफ़ा तस्वीर देखा करता है वो जा चुकी है फिर भी ये दिल मानता बिल्कुल नहीं क्यूँँ चैन भी पड़ता नहीं आख़िर करूँ तो क्या करूँ ख़ुद से ही बातें करता हूँ वो लम्स वो लम्हें मुझे अब भी हैं याद बरसात का मौसम था और तू हाथ मेरा थाम के चलती गई बिन मुस्कुराए बात करते ही नहीं थे हम कभी फिर कैसा मेरे वक़्त ने ये खेल रचकर बे-सबब क्यूँँ ग़म दिया अब उलझा ही रहता हूँ मैं रेशम की कोई डोर सा है एक आदत जो नहीं जाएगी अब है इक अधूरी प्यास कुछ आसानी से बुझने नहीं वाली मिरी
sahllucknowi
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“ये वक़्त अजीब है ” वक़्त बे-दर्द है थोड़ा है अजीब बस सताता ही चले जाता है कितनों को ये यहाँ तड़पाता है मौत भी देती सलामी इस को वक़्त ज़ालिम यहाँ देखे जिस को कितनी ख़्वाहिश जली दिल में मेरे कितने आँसू बहा करते हैं यहाँ मैं थका हारा यही कहता हूँ तू चले जाता है क्यूँ रुकता नहीं क्या अदावत है बड़ी तेरी कहीं जितना पाया दुनिया ने छीन कर तू ने यहाँ सब खा लिया हर दफ़ा पलकें बिछी रहती हैं दौड़के कब ख़ुशियाँ आ जाऍं ये किसी को नहीं मालूम इधर हर इंसाँ होता परेशाँ वक़्त गहरा दरिया है डूबने पर न मिले कोई निशाँ
sahllucknowi
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