अब 'अख़्तर' तुम्हें कैसे मनाएं तुम हर बात पर ही बिगड़ रही हो अच्छा! तो तुम को भी इश्क़ है मुझ से देखो तुम सच मुच मुझ से झगड़ रही हो
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कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा
Allama Iqbal
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जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है
Shabeena Adeeb
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तुम्हें हम भी सताने पर उतर आएँ तो क्या होगा तुम्हारा दिल दुखाने पर उतर आएँ तो क्या होगा हमें बदनाम करते फिर रहे हो अपनी महफ़िल में अगर हम सच बताने पर उतर आएँ तो क्या होगा
Santosh S Singh
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तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
Faiz Ahmad Faiz
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ये अलग बात कि ख़ामोश खड़े रहते हैं फिर भी जो लोग बड़े हैं, वो बड़े रहते हैं
Rahat Indori
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वो शम्अ' के मानिंद हर वक़्त जलती रहती थी फिर मैं भी अपनी ज़ात का परवाना हो गया
Parwez Akhtar
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तू ने इतनी भी चोटें नहीं खाई हैं 'अख़्तर' दिल किसी और से तू भी तो लगा सकता है
Parwez Akhtar
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अपने किरदार को कहानी में पिरोलो वरना ये जो किरदार है कहानी से रूठ जाएगा
Parwez Akhtar
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एक बार बसा लें अगर कुछ अपने दिल में फिर दर्द हो या तू हो निकलने नहीं देंगे
Parwez Akhtar
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देखा कि पहले शहर में मज़लूम कितने हैं फिर मुझ को इंतिख़ाब कर रुसवा किया गया
Parwez Akhtar
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