alag baithe the phir bhi aankh saqi ki padi hum par agar hai tishnagi kaamil to paimane bhi aaenge
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ज़रा ठहरो कि शब फीकी बहुत है तुम्हें घर जाने की जल्दी बहुत है ज़रा नज़दीक आ कर बैठ जाओ तुम्हारे शहर में सर्दी बहुत है
Zubair Ali Tabish
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हम को यारों ने याद भी न रखा 'जौन' यारों के यार थे हम तो
Jaun Elia
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नाम पे हम क़ुर्बान थे उस के लेकिन फिर ये तौर हुआ उस को देख के रुक जाना भी सब से बड़ी क़ुर्बानी थी मुझ से बिछड़ कर भी वो लड़की कितनी ख़ुश ख़ुश रहती है उस लड़की ने मुझ से बिछड़ कर मर जाने की ठानी थी
Jaun Elia
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हम को दिल से भी निकाला गया फिर शहर से भी हम को पत्थर से भी मारा गया फिर ज़हरस भी
Azm Shakri
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किसी गली में किराए पे घर लिया उस ने फिर उस गली में घरों के किराए बढ़ने लगे
Umair Najmi
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इस बाग़ में वो संग के क़ाबिल कहा न जाए जब तक किसी समर को मेरा दिल कहा न जाए
Majrooh Sultanpuri
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बहाने और भी होते जो ज़िंदगी के लिए हम एक बार तेरी आरज़ू भी खो देते
Majrooh Sultanpuri
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सुनते हैं कि काँटे से गुल तक हैं राह में लाखों वीराने कहता है मगर ये अज़्म-ए-जुनूँ सहरा से गुलिस्ताँ दूर नहीं
Majrooh Sultanpuri
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सुतून-ए-दार पे रखते चलो सरों के चराग़ जहाँ तलक ये सितम की सियाह रात चले
Majrooh Sultanpuri
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'मजरूह' क़ाफ़िले की मिरे दास्ताँ ये है रहबर ने मिल के लूट लिया राहज़न के साथ
Majrooh Sultanpuri
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