हफ़ीज़' अपनी बोली मोहब्बत की बोली न उर्दू न हिन्दी न हिन्दोस्तानी
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हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा
Allama Iqbal
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हम अपनी जान के दुश्मन को अपनी जान कहते हैं मोहब्बत की इसी मिट्टी को हिंदुस्तान कहते हैं
Rahat Indori
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अगर तुम हो तो घबराने की कोई बात थोड़ी है ज़रा सी बूँदा-बाँदी है बहुत बरसात थोड़ी है ये राह-ए-इश्क़ है इस में क़दम ऐसे ही उठते हैं मोहब्बत सोचने वालों के बस की बात थोड़ी है
Abrar Kashif
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ये उस की मोहब्बत है कि रुकता है तेरे पास वरना तेरी दौलत के सिवा क्या है तेरे पास
Zia Mazkoor
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मुझे पहले पहल लगता था ज़ाती मसअला है मैं फिर समझा मोहब्बत क़ायनाती मसअला है परिंदे क़ैद हैं तुम चहचहाहट चाहते हो तुम्हें तो अच्छा ख़ासा नफ़सियाती मसअला है
Umair Najmi
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देखा जो खा के तीर कमीं-गाह की तरफ़ अपने ही दोस्तों से मुलाक़ात हो गई
Hafeez Jalandhari
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नहीं इताब-ए-ज़माना ख़िताब के क़ाबिल तिरा जवाब यही है कि मुस्कुराए जा
Hafeez Jalandhari
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इलाही एक ग़म-ए-रोज़गार क्या कम था कि इश्क़ भेज दिया जान-ए-मुब्तला के लिए
Hafeez Jalandhari
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जिस ने इस दौर के इंसान किए हैं पैदा वही मेरा भी ख़ुदा हो मुझे मंज़ूर नहीं
Hafeez Jalandhari
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आने वाले जाने वाले हर ज़माने के लिए आदमी मज़दूर है राहें बनाने के लिए
Hafeez Jalandhari
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