इमारतों से शहर भर गया है अब न बच सका कोई भी इंसाँ शहर में
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बिछड़ कर उस का दिल लग भी गया तो क्या लगेगा वो थक जाएगा और मेरे गले से आ लगेगा मैं मुश्किल में तुम्हारे काम आऊँ या ना आऊँ मुझे आवाज़ दे लेना तुम्हें अच्छा लगेगा
Tehzeeb Hafi
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किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा
Ahmad Faraz
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ये शहर-ए-अजनबी में अब किसे जा कर बताएँ हम कहाँ के रहने वाले हैं कहाँ की याद आती है
Ashu Mishra
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वो ज़माना गुज़र गया कब का था जो दीवाना मर गया कब का
Javed Akhtar
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मुझ से मत पूछो के उस शख़्स में क्या अच्छा है अच्छे अच्छों से मुझे मेरा बुरा अच्छा है किस तरह मुझ से मुहब्बत में कोई जीत गया ये न कह देना के बिस्तर में बड़ा अच्छा है
Tehzeeb Hafi
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साथ हँसने लगे वो हँसी चाहिए उम्र भर के लिए बस यही चाहिए बिन तेरे हो अगर चार दिन ज़िंदगी एक पल भी नहीं ज़िंदगी चाहिए
Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
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बात कहनी थी ये बस उसी का हूँ मैं हर घड़ी याद में उस की रोता हूँ मैं सुन रही हो इसी भीड़ में वो मुझे बस इसी आस में गीत गाता हूँ मैं
Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
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जिस तरह से निकाले गए आज हम दर्द अपना कहें तो किसे आज हम ज़िंदगी के सिखाए थे मतलब जिन्हें क़त्ल उन के ही हाथों हुए आज हम
Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
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बेटे जो भेजे हैं सरहद से बुला लो साहब कोख माँओं की उजड़ने से बचा लो साहब
Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
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ज़िंदगी के खाते से इक साल और कम हो गया है और बधाई दे रहे हैं लोग इक दूजे को इस की
Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
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