जो चराग़ सारे बुझा चुके उन्हें इंतिज़ार कहाँ रहा ये सुकूँ का दौर-ए-शदीद है कोई बे-क़रार कहाँ रहा
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मुफ़लिसी थी और हम थे घर के इकलौते चराग़ वरना ऐसी रौशनी करते कि दुनिया देखती
Kashif Sayyed
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माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतिज़ार देख
Allama Iqbal
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ज़ेहन से यादों के लश्कर जा चुके वो मेरी महफ़िल से उठ कर जा चुके मेरा दिल भी जैसे पाकिस्तान है सब हुकूमत कर के बाहर जा चुके
Tehzeeb Hafi
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अब मैं सारे जहाँ में हूँ बदनाम अब भी तुम मुझ को जानती हो क्या
Jaun Elia
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ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता
Mirza Ghalib
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वर्ना इंसान मर गया होता कोई बे-नाम जुस्तुजू है अभी
Ada Jafarey
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एक आईना रू-ब-रू है अभी उस की ख़ुश्बू से गुफ़्तुगू है अभी
Ada Jafarey
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आ देख कि मेरे आँसुओं में ये किस का जमाल आ गया है
Ada Jafarey
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कोई ताइर इधर नहीं आता कैसी तक़्सीर इस मकाँ से हुई
Ada Jafarey
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ख़ामुशी से हुई फ़ुग़ाँ से हुई इब्तिदा रंज की कहाँ से हुई
Ada Jafarey
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