कहीं इंसान ही पत्थर कहीं पत्थर की मूरत है कभी घर से निकलते हैं तो जादू देख लेते हैं
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किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा
Ahmad Faraz
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मैं चाहता हूँ मोहब्बत मेरा वो हाल करे कि ख़्वाब में भी दोबारा कभी मजाल न हो
Jawwad Sheikh
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पड़ी रहने दो इंसानों की लाशें ज़मीं का बोझ हल्का क्यूँँ करें हम
Jaun Elia
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लोग हर मोड़ पे रुक रुक के सँभलते क्यूँँ हैं इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यूँँ हैं मोड़ होता है जवानी का सँभलने के लिए और सब लोग यहीं आ के फिसलते क्यूँँ हैं
Rahat Indori
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मैं उन्हीं आबादियों में जी रहा होता कहीं तुम अगर हँसते नहीं उस दिन मेरी तक़दीर पर
Zia Mazkoor
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ख़ौफ़ खाता है क्यों ज़माने का तुझे तो फ़न है आज़माने का हया की हुस्न पर हुकूमत है है ये कलमा किसी दिवाने का
Anshika Shukla
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चाँद जुगनू से लड़ रहा है क्यूँ चाँद में ख़ुद की रौशनी है क्या
Anshika Shukla
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वो जिस हमदर्द को आँसू मिरे अश'आर लगते थे उसी बे-दर्द को मेरी हँसी अच्छी नहीं लगती
Anshika Shukla
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तू सिर्फ़ कह रहा है हम कभी मिलेंगे नहीं ज़बान दे रहा है तो नज़र उठा कर दे
Anshika Shukla
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ज़िंदगी हमक़दम रही लेकिन वक़्त से हमक़दम नहीं होती
Anshika Shukla
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