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किसी से बन गया है रिश्ता उस तन का नज़र आने लगा है दाग़ गर्दन का हक़ीक़त मान लूँ इन क़समों को कैसे यक़ीं कैसे करूँ मैं अपनी दुल्हन का

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ज़िंदगी ही नहीं चलती किसी आदत के बिना इस लिए हम नहीं रह पाते मोहब्बत के बिना दुनिया से भी परे लगता है हमें उस का नूर या'नी रब मिल गया है हम को इबादत के बिना

Bhuwan Singh

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शौक़ अच्छा नहीं दवा का भी नाम लेते रहो ख़ुदा का भी तुम मोहब्बत में हार जाओगे इश्क़ है खेल बे-वफ़ा का भी

Bhuwan Singh

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वो एक लड़की मुझे लोरियाँ सुनाती थी मुझे भी उस की ही बाहों में नींद आती थी मैं अर्सों पहले बस उस के लिए धड़कता था वो अर्सों पहले मुझे अपना दिल बुलाती थी

Bhuwan Singh

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मेरी इन आँखों से हर अश्क उतारने के लिए बस इक ही ग़म लगा 'उम्रें गुज़ारने के लिए कई लिबास मेरे पास हैं सँवरने को मगर मिला नहीं कुछ मन सँवारने के लिए

Bhuwan Singh

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हर इक मुआमले में तू मुझे कमाल लगा तो तुझ सेे मिल के मुझे अच्छा अपना हाल लगा यूँँ छोड़ दे तेरा एहसास इश्क़ से मुझ पर तू अपने हाथों से इन गालों पे गुलाल लगा

Bhuwan Singh

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