कितनों की नींदें ले गई पाज़ेब ये जी आप की मख़मल पे चाँदी की ज़री पाज़ेब ये जी आप की पल पल खनकती बातें करती है लगे जैसे कि हो चंचल सी बातूनी सखी पाज़ेब ये जी आप की
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उदासी बाल खोले आ रही है और मज़ा ये है उदासी मुझ सेे गुज़री तो यक़ीनन भीग जाएगी
Rakesh Mahadiuree
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ज़िंदगी अपनी जब इस शक्ल से गुज़री 'ग़ालिब' हम भी क्या याद करेंगे कि ख़ुदा रखते थे
Mirza Ghalib
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आदमी देश छोड़े तो छोड़े 'अली' दिल में बसता हुआ घर नहीं छोड़ता एक मैं हूँ कि नींदें नहीं आ रही एक तू है कि बिस्तर नहीं छोड़ता
Ali Zaryoun
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क्या वाक़ई वो तेरी पाज़ेब की खनक थी ऐसा सुकून तो बस नुसरत के गाने में है
Neeraj Neer
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अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तेरे शहर में आते जाते
Rahat Indori
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ज़ीस्त की आभा मरम्मत में कई ख़ुशनुमा लम्हे जिए बिन बह गए
Abha sethi
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यूँँ तो है दफ़्तर में काम बहुत फिर भी निकाल लेते वक़्त तसव्वुर का तेरे
Abha sethi
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नहीं करता तिरा भी दिल कभी तू हँस ज़रा घुल-मिल
Abha sethi
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नाम तेरे ज़िंदगी अपनी यूँँ लिखते बन हँसी ता-उम्र तेरे लब पे दिखते
Abha sethi
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ये इश्क़ ज़िंदा रखने को हैं टूट जाते गुल कई
Abha sethi
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