लाशों में एक लाश मिरी भी न हो कहीं तकता हूँ एक एक को चादर उठा के मैं
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शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे
Rahat Indori
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तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
Faiz Ahmad Faiz
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हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा
Allama Iqbal
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ज़रा ठहरो कि शब फीकी बहुत है तुम्हें घर जाने की जल्दी बहुत है ज़रा नज़दीक आ कर बैठ जाओ तुम्हारे शहर में सर्दी बहुत है
Zubair Ali Tabish
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यूँँ जो तकता है आसमान को तू कोई रहता है आसमान में क्या
Jaun Elia
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वो ना-समझ मुझे पत्थर समझ के छोड़ गया वो चाहता तो सितारे तराशता मुझ से
Shahid Zaki
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मैं तो ख़ुद बिकने को बाज़ार में आया हुआ हूँ और दुकाँ-दार ख़रीदार समझते हैं मुझे
Shahid Zaki
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हो न हो एक ही तस्वीर के दो पहलू हैं रक़्स करता हुआ तू आग में जलता हुआ मैं
Shahid Zaki
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ये मुझे नींद में चलने की जो बीमारी है मुझ को इक ख़्वाब-सरा अपनी तरफ़ खींचती है
Shahid Zaki
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मैं बिखर गया तो सँवर गया मेरे मुंसिफ़ो को ये दुख रहा वही फ़ैसला मेरे हक़ में था जो मेरे ख़िलाफ़ किया गया
Shahid Zaki
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