लक्ष्मण-रेखा भी आख़िर क्या कर लेगी सारे रावण घर के अंदर निकलेंगे
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परों को खोल ज़माना उड़ान देखता है ज़मीं पे बैठ के क्या आसमान देखता है
Shakeel Azmi
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तुम्हें हुस्न पर दस्तरस है मोहब्बत वोहब्बत बड़ा जानते हो तो फिर ये बताओ कि तुम उस की आँखों के बारे में क्या जानते हो ये जुग़राफ़िया फ़ल्सफ़ा साईकॉलोजी साइंस रियाज़ी वग़ैरा ये सब जानना भी अहम है मगर उस के घर का पता जानते हो
Tehzeeb Hafi
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कुछ न रह सका जहाँ विरानियाँ तो रह गईं तुम चले गए तो क्या कहानियाँ तो रह गईं
Khalil Ur Rehman Qamar
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कोई इतना प्यारा कैसे हो सकता है फिर सारे का सारा कैसे हो सकता है तुझ सेे जब मिल कर भी उदासी कम नहीं होती तेरे बग़ैर गुज़ारा कैसे हो सकता है
Jawwad Sheikh
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पूछते हैं वो कि ग़ालिब कौन है कोई बतलाओ कि हम बतलाएँ क्या
Mirza Ghalib
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जो बुजुर्गों की दु'आओं के दीयों से रौशन रोज़ उस घर में दीवाली का जश्न होता है
Pratap Somvanshi
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आ जाए कौन कब कहाँ कैसी ख़बर के साथ अपने ही घर में बैठा हुआ हूँ मैं डर के साथ
Pratap Somvanshi
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ज़ेहनियत को साफ़ रखना सीखिए लड़कियाँ यूँँ भी तो हँसती-बोलती हैं
Pratap Somvanshi
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राम तुम्हारे युग का रावन अच्छा था दस के दस चेहरे सब बाहर रखता था
Pratap Somvanshi
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सफ़र में जब निकल आए हो तो इतनी शिकायत क्यूँ सड़क थोड़ी बहुत तो बीच में तिरछी निकलती है
Pratap Somvanshi
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