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मैं मोहब्बत को अगर दोस्त से बढ़कर कहता हाल यूँँ होता कि मैं मय-कदे को घर कहता फिरता रह जाता मैं यूँँ उस के ही आगे पीछे देखता कोई अगर मुझ को तो नौकर कहता

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वो एक लड़की मुझे लोरियाँ सुनाती थी मुझे भी उस की ही बाहों में नींद आती थी मैं अर्सों पहले बस उस के लिए धड़कता था वो अर्सों पहले मुझे अपना दिल बुलाती थी

Bhuwan Singh

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ज़िंदगी ही नहीं चलती किसी आदत के बिना इस लिए हम नहीं रह पाते मोहब्बत के बिना दुनिया से भी परे लगता है हमें उस का नूर या'नी रब मिल गया है हम को इबादत के बिना

Bhuwan Singh

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रूह को अंदर से पहले ख़ूब झिंझोड़ा गया फिर मिरा हर ख़्वाब मेरे सामने तोड़ा गया हश्र कुछ ऐसा हुआ है मेरे इस किरदार का क़िस्तों में तोड़ा गया फिर रिश्तों में छोड़ा गया

Bhuwan Singh

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मुझ पे तेरी नज़र उठेगी कब और तू इस तरफ़ बढ़ेगी कब ओ गुलाबों को चूमने वाली इन लबों पर धियान देगी कब

Bhuwan Singh

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इस कहानी को अब अंजाम दिया जाएगा मेरे किरदार को आराम दिया जाएगा एक दूजे से कभी होगी नहीं शादी पर मेरी बेटी को तिरा नाम दिया जाएगा

Bhuwan Singh

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