muddat ke ba'd us ne jo ki lutf ki nigah ji khush to ho gaya magar aansu nikal pade
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वो ज़माना गुज़र गया कब का था जो दीवाना मर गया कब का
Javed Akhtar
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हम को दिल से भी निकाला गया फिर शहर से भी हम को पत्थर से भी मारा गया फिर ज़हरस भी
Azm Shakri
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ख़ुशी से काँप रही थीं ये उँगलियाँ इतनी डिलीट हो गया इक शख़्स सेव करने में
Fahmi Badayuni
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ज़मीं पे घर बनाया है मगर जन्नत में रहते हैं हमारी ख़ुश-नसीबी है कि हम भारत में रहते हैं
Mehshar Afridi
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हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है वो हर इक बात पर कहना कि यूँँ होता तो क्या होता
Mirza Ghalib
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इतना तो ज़िंदगी में किसी के ख़लल पड़े हँसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े
Kaifi Azmi
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अपना पता मिले न ख़बर यार की मिले दुश्मन को भी न ऐसी सज़ा प्यार की मिले उन को ख़ुदा मिले, है ख़ुदा की जिन्हें तलाश मुझ को बस इक झलक मेरे दिलदार की मिले
Kaifi Azmi
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जो इक ख़ुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्यूँँ यहाँ तो कोई मिरा हम-ज़बाँ नहीं मिलता
Kaifi Azmi
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इतना तो ज़िन्दगी में किसी के ख़लल पड़े हँसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े जिस तरह हँस रहा हूँ मैं पी पी के गर्म अश्क यूँँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े
Kaifi Azmi
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एक ज़ख़्म ऐसा न खाया कि बहार आ जाती दार तक ले के गया शौक़-ए-शहादत मुझ को
Kaifi Azmi
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