मुस्करा देना अचानक कहीं मिल जाने पर और मुझे भूल न जाने का दिखावा करना
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मुद्दतें गुज़र गई 'हिसाब' नहीं किया न जाने अब किस के कितने रह गए हम
Kumar Vishwas
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कोई इतना प्यारा कैसे हो सकता है फिर सारे का सारा कैसे हो सकता है तुझ सेे जब मिल कर भी उदासी कम नहीं होती तेरे बग़ैर गुज़ारा कैसे हो सकता है
Jawwad Sheikh
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मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्किय्यत का दावा नइँ वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ
Ali Zaryoun
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किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा
Ahmad Faraz
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ज़रा ठहरो कि शब फीकी बहुत है तुम्हें घर जाने की जल्दी बहुत है ज़रा नज़दीक आ कर बैठ जाओ तुम्हारे शहर में सर्दी बहुत है
Zubair Ali Tabish
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तू ने सोचा भी है जानाँ कि तेरे वादे ने कितनी सदियों से नहीं पहना अमल का पैकर
Subhan Asad
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जब बुलंदी का गुमाँ था तो नहीं याद आई अपनी परवाज़ से टूटे तो ज़मीं याद आई वही आँखें कि जो ईमान-शिकन आँखें हैं उन्हीं आँखों की हमें दावत-ए-दीं याद आई
Subhan Asad
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ये मेरी ज़िद ही ग़लत थी कि तुझ सेा बन जाऊँ मैं अब न अपनी तरह हूँ न तेरे जैसा हूँ हमारे बीच ज़माने की बद-गुमानी है मैं ज़िंदगी से ज़रा कम ही बात करता हूँ
Subhan Asad
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जब भी उस कूचे में जाना पड़ता है ज़ख़्मों पर तेज़ाब लगाना पड़ता है उस के घर से दूर नहीं है मेरा घर रस्ते में पर एक ज़माना पड़ता है
Subhan Asad
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ये सानिहा भी शब-ए-हिज्र आ पड़ा हम पर तेरा ख़याल तो आया तेरी तलब न हुई
Subhan Asad
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