नाज़ है यूँँ अजीब कहलाऊॅं यार अपना रक़ीब कहलाऊॅं थूक दूँ कुछ यहाँ वहाँ वहशत और मैं भी अदीब कहलाऊॅं
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हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है वो हर इक बात पर कहना कि यूँँ होता तो क्या होता
Mirza Ghalib
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बात करो रूठे यारों से सन्नाटों से डर जाते हैं प्यार अकेला जी लेता है दोस्त अकेले मर जाते हैं
Kumar Vishwas
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हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा
Bashir Badr
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जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है
Shabeena Adeeb
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तुम्हें इक मश्वरा दूँ सादगी से कह दो दिल की बात बहुत तैयारियाँ करने में गाड़ी छूट जाती है
Zubair Ali Tabish
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दर्द भी गुल बदन हुआ उस पे इस क़दर है निहाल इक लड़की
Kunu
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ज़िंदगानी हुई अदा ऐसे पीठ-पीछे यक़ीं नहीं थे हम मुफ़्लिसी सब उड़ा गई मंज़िल यार हासिल कहीं नहीं थे हम
Kunu
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नीमजाँ तक छुटा नहीं दामन वो रही गुल-बदन क़ज़ा कामिल
Kunu
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सब जुनूँ बूद सक़ाफ़त तक ही कुछ नहीं नाज़ वफ़ा वहशत में
Kunu
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गुफ़्तगू और नहीं वहमन से सब वफ़ा पीर दवा परवर में
Kunu
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